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भारत-चीन : टूटना ही चाहिए गतिरोध

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन की वर्चुअल बैठक में आज चीन और पाकिस्तान को दो टूक संदेश दिया कि एक-दूसरे से सम्पर्क बढ़ाते देशों को एक-दूसरे की सम्प्रभुता का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने एससीओ में द्विपक्षीय मुद्दे उठाने के लिए पाकिस्तान को फटकार भी लगाई। इस वर्चुअल बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हुए लेकिन प्रधानमंत्री ने उन्हें भी नजरंदाज ही किया। यह बैठक लद्दाख में तनाव शुरू के बाद पहली बार हुई। बैठक की अध्यक्षता रूस के राष्ट्रपति ब्लादि मीर पुतिन ने की। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी इसमें शामिल हुए।  

चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की भारतीय नीति अटल जी के दौर में भी चली। अटल जी ने कहा था​ कि ‘‘अगर चीन हार्डवेयर में सर्वश्रेष्ठ है तो भारत साफ्टवेयर है। आइये दोनों मिलकर साथ-साथ चलें। बहुत कोशिशें हुईं कि ‘बीति ताहिर बिसार दे’ कर दोनाें देशों के संबंध सामान्य हो जाएं। अटल जी ने चीन की यात्रा भी की थी। 1987 में राजीव गांधी शासनकाल में भी दोनों देशों के बीच समाधान के लिए बातचीत करते हुए नागरिक संबंध, व्यापार और द्विपक्षीय मामलों में सहयोग में प्रगति तो हुई लेकिन सीमा विवाद का कोई हल नहीं निकला। समय-समय पर चीन की निष्ठुर हठधर्मिता धक्का पहुंचाती रही। चीन की विश्व की आर्थिक एवं सामरिक महाशक्ति बनने, अपने  देश को रणनीतिक दृष्टि से शत-प्रतिशत सुरक्षित बनाने तथा इसके लिए अन्य देशों को रणनीतिक दबाव में रखने की अब तक की नीतियां उसके इरादों के प्रति संदेह गहराती रहीं। अगर चीनी नेतृत्व अपने महाशक्ति के मूल लक्ष्यों को पाने के तरीके में बदलाव लाकर रणनीतिक दबाव से बाहर आए तो स्थितियां बदल भी सकती हैं, परन्तु हमारे लिए भी यह जरूरी है कि हम साफ-साफ उनके सामने सीमा पर अपनी सोच का खाका पेश करें। एक बार चीन की तरफ से यह भी कहा गया कि दक्षिण एशिया में शांति हो, इसके लिए यह बात बड़ी जरूरी है कि भारत, रूस आैर चीन तीनों मिलकर एक सुरक्षा कवच की रूपरेखा तैयार करें।’’

भारत और चीन के बीच मित्रता का जो बड़ा व्यवधान है, वह है सीमा विवाद। सीमा ​विवाद अक्साई चिन का भी है, सीमा विवाद काराकोरम पट्टी का भी है, सीमा विवाद अरुणाचल प्रदेश का भी है। जब भारत ने तिब्बत को चीन का स्वशासी क्षेत्र मान लिया तो चीन ने भी सि​क्किम को भारतीय क्षेत्र मान लिया। बेहतर यही होता कि दोनों देश सीमा विवाद सुलझा लेते लेकिन चीनी नेतृत्व की विस्तारवादी नीतियों ने ऐसा नहीं होने दिया। चीन भारत को बड़ी आर्थिक ताकत बनते सहन नहीं कर पाया, भारत का बड़ी सामरिक शक्ति बनते उसे बर्दाश्त नहीं हो पा रहा। उसे लगता है कि शक्तिशाली भारत एशिया में शक्ति संतुलन ही बदल देगा। चीन अपना वर्चस्व कम होता नहीं देखना चाहता। विश्व भी अब पहले की ही तरह ध्रुवीकरण वाला नहीं रह गया। नए संबंध, नए गठजोड़ और नए समीकरण बन रहे हैं।

आज भारत चीन को चुनौती देने में सक्षम है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ विपिन रावत ने हाल ही में कहा है कि सीमाओं पर हो रहे टकराव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने युद्ध की सम्भावनाओं से इंकार नहीं किया है। डोकलाम में चीन को भारत के प्रबल प्रतिरोध की उम्मीद ही नहीं थी और जिस तरह की मजबूती भारत ने लद्दाख में दिखाई है वह भी चीन के लिए हैरानी भरा है। अब उसको समझ आ चुकी है कि न तो भारत 1962 वाला भारत है और न ही दुनिया में 1962 जैसी परिस्थितियां हैं। आज उसके खिलाफ नए समूह उभर रहे हैं। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, भारत, जापान आदि देश एकजुट हो रहे  हैं। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों का जमावड़ा खत्म करने के लिए भारत और चीन के बीच आठवें दौर की बातचीत से जो संकेत मिले हैं, उससे उम्मीद तो बंधी है कि गतिरोध टूटना चाहिए और दोनों देशों को स्थिति सामान्य बनाने की दिशा में बढ़ना चाहिए। आठवें दौर की बातचीत का एक निष्कर्ष यह बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ खास जगहों पर से दोनों देशों के सैनिक पीछे हट सकते हैं। भारत की स्थिति और रुख पहले से ही स्पष्ट है कि जब तक चीन पांच मई से पूर्व की स्थिति बहाल नहीं करता तब तक गतिरोध खत्म नहीं होगा। भारतीय सैनिक तो अपने इलाके में हैं और वापस तो उसके ​सैनिकों को जाना है। 

सितम्बर के पहले हफ्ते में रक्षा मंत्री ने मास्को में चीन के रक्षा मंत्री के साथ मुलाकात की थी और इसके तत्काल बाद दोनों देशों के ​विदेश मंत्री भी मास्को में मिले थे और गतिरोध खत्म करने के ​लिए पांच सूत्री सहमति भी बनी थी, जिसमें जोर बातचीत के जरिये ही समाधान तक पहुंचने को लेकर रहा था। एलएसी पर चीन ने सैनिकों के साथ-साथ भारी मात्रा में हथियार, टैंक आदि भी जमा कर लिए हैं। इससे साफ है कि वह भारत को उकसा रहा है। 17 नवम्बर को 12वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पहली बार वीडियो कांफ्रैंसिंग के जरिये आयोजित किया जाएगा। इसमें भी मोदी और शी जिनपिंग आमने-सामने होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए समाधान का रास्ता ढूंढ निकाला जाएगा।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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