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संपादकीय

भारत में ‘भारत’ विरोध का जुर्म

कश्मीर मुद्दे पर जिस तरह भारत को अंतर्राष्ट्रीय जगत का समर्थन मिला है उससे भी कांग्रेस के नेताओं की आंखें नहीं खुल रही हैं और वे परोक्ष रूप से पाकिस्तान के पक्ष को ही हवा देने की भयंकर भूल कर रहे हैं। इसके लिए इतिहास उनको कभी माफ नहीं करेगा और इसका खामियाजा पूरी पार्टी को ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के परिणाम में मिल सकता है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि इस्लामी देशों से लेकर रूस, चीन व अमेरिका समेत राष्ट्रसंघ की राय भारत के हक में है। विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर आजकल चीन की यात्रा पर हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भारत में जम्मू-कश्मीर का रुतबा बदले जाने से अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। 

इसका मतलब यही है कि पाक के कब्जे में जो कश्मीर वादी का भू-भाग है वही भारत और पाक के बीच का मसला है। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद के वर्तमान अध्यक्ष पोलैंड ने भी साफ कर दिया है कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मामला है मगर हैरत है कि लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने 1948 के राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव का हवाला दे दिया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपने ही मृत्युपत्र पर हस्ताक्षर करने की मुद्रा में है तभी तो इसके एक से एक बड़े नेता कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाये जाने पर इस तरह बौखला गये हैं कि मोदी सरकार ने कोई भारत के विरोध में काम कर दिया है। 

यह सरासर गुस्ताखी है जिसे उत्तर से लेकर दक्षिण भारत की जनता किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकती। बड़े अदब के साथ कांग्रेस के नेताओं से दर्ख्वास्त करना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर कभी भी ‘हिन्दू-मुसलमान’ के तंग नजरिये की गिरफ्त में नहीं रहा है। इसकी गवाही इस राज्य का पूरा इतिहास इस तरह देता है कि फिरकापरस्ती की सियासत करने वालों के माथे पर पसीना बह जाये। सबूत के तौर पर भारत के बंटवारे के समय साम्प्रदायिक आग में झुलस रहे देश की हालत पर नजर मारते हुए जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जम्मू-कश्मीर की तरफ देखा तो उन्होंने कहा था कि ‘एक उम्मीद की किरण कश्मीर से निकली है जिसमें पूरे भारत को रोशनी से भर देने की कूव्वत है।’  

वजह यह थी कि इस राज्य के किसी भी हिस्से में एक भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ था और सभी हिन्दू-मुसलमान पूरे भाईचारे के साथ रह रहे थे। इतना ही नहीं इस सूबे के लोगों ने मजहब की बुनियाद पर तामीर हुए पाकिस्तान को भी दरकिनार करते हुए इसकी पुरजोर मुखालफत की थी। इसलिए कांग्रेस के नेता पी. चिदम्बरम और मणिशंकर अय्यर को समझना चाहिए कि वे आज जिस अनुच्छेद 370 को हटाने के नाम पर मोदी सरकार के कदम की मुखालफत कर रहे हैं उसका कश्मीरियत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। कश्मीरियत में मुस्लिम ‘सूफियों’ को भी ‘ऋषि’ कहा जाता है इसलिए श्री चिदम्बरम का यह कहना कि भाजपा की मोदी सरकार ने 370 को इसलिए हटाया है क्योंकि कश्मीर मंे मुसलमान बहुसंख्या में हैं, पूरी तरह इस खूबसूरत वादी की संस्कृति के खिलाफ है। 

दूसरी तरफ अय्यर साहब अपना ही राग अलापे जा रहे हैं और कश्मीर को ‘फलस्तीन’ बनाये जाने जैसी बात कहकर भारत के उस लोकतन्त्र का खुला अपमान कर रहे हैं जो केवल संविधान से चलता है। क्या अय्यर साहब को याद दिलाना पड़ेगा कि अनुच्छेद 370 को भारत के संविधान में ही जोड़ कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया था और 35(ए) लागू करके इसके नागरिकों को विशेष अधिकार दिये गये थे। यह कार्य संविधान की मार्फत ही हुआ था। जाहिर है इन शर्तों को हटाने का काम भी संविधान के अनुसार ही होना चाहिए था और मोदी सरकार ने यही रास्ता संसद और संविधान के जरिये अपनाया है।

 

जहां तक कश्मीर में फौज भेजने का सवाल है तो यह आज ही नहीं भेजी गई है बल्कि 1990 के बाद से ही वहां फौज को तैनात रखा गया है जिससे पाकिस्तान की तरफ से फैलाये जाने वाले आतंकवाद का मुकाबला किया जा सके। श्री अय्यर की जानकारी के लिए यह भी बताना जरूरी है कि इसका फैसला उन्हीं की पार्टी की सरकार के प्रधानमन्त्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने 1991 में लिया था और वहां पूरे छह साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रखा था। असली सवाल यह है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा है और इसी संघ के संविधान के तहत इस रियासत का निजाम चलता है तो बदलते समय के अनुसार इसी संविधान में किये जाने वाले परिवर्तनों को किस तरह स्थिर बनाये रखा जा सकता है। 

पड़ोसी पाकिस्तान की लगातार कश्मीर को लेकर जिस तरह की नाजायज हरकतें हदें पार करती रही हैं उन्हें क्या आजादी के सत्तर साल बाद भी बदस्तूर जारी रहने दिया जाये और कश्मीरी जनता के बीच पाकिस्तानी गुर्गों को अपना खेल जारी रखने की छूट दे दी जाये? सवाल राष्ट्रवाद का नहीं बल्कि ‘राष्ट्रभक्ति’ का है और देशभक्ति कहती है कि सम्पूर्ण भारत को एकाकार रखने के लिए उन संवैधानिक अड़चनों को दूर किया जाये जो इस मार्ग में अवरोधक का काम करती हैं और जिसका फायदा शुरू से ही पाकिस्तान उठाता रहा है। 

कश्मीर का प्रश्न दलगत राजनीति का किस प्रकार हो सकता है क्योंकि इसका सम्बन्ध भारत की सार्वभौमिकता और संप्रभुता से जुड़ा हुआ है। यदि ऐसा न होता तो क्यों खुद जम्मू-कश्मीर विधानसभा ही प्रस्ताव पारित करके अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हल्का करती जाती? 1965 के भारत-पाक युद्ध से कुछ पहले से ही तो इस राज्य के प्रधानमन्त्री और सदरे रियासत को मुख्यमन्त्री और राज्यपाल कहना शुरू हुआ था। अतः जो राजनैतिक दल अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर कश्मीरी जनता में ‘हीन’ भावना भरने की कोशिश कर रहे हैं वे शेष भारत के लोगों के साथ ही अन्याय नहीं कर रहे हैं बल्कि कश्मीरियों के साथ भी अन्याय कर रहे हैं क्योंकि 370 का ‘झुनझुना’ पकड़ा कर उन्हें अभी तक मुफलिसी और दकियानूसी माहौल में रखा गया है। 

इसके पीछे इस सूबे के दो-तीन सियासी खानदानों की ऐसी कारगुजारी रही जिससे वे बारी-बारी से हुकूमत मंे आकर कश्मीरी जनता को फटेहाल ही रख सकें और पाकिस्तान के साथ बातचीत करने का राग अलाप कर आम लोगों के बीच घुसे हुए अलगाववादियों से सांठगांठ कर सकें। पाकिस्तान की मंशा कश्मीर को शुरू से ही फलस्तीन बनाने की रही है जिसकी मुखालफत कश्मीरी देशभक्त जनता ने ही शुरू से की है मगर चिदम्बरम साहब की सोच समझ से परे इसलिए है क्योंकि वह अनुच्छेद 370 को मुसलमानों से जोड़कर देखने की हिमाकत कर रहे हैं। उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि वह देश के गृहमन्त्री रह चुके हैं और उनसे बेहतर कश्मीर समस्या के बारे में कोई और नहीं जान सकता। 

क्या वह यकीन के साथ कह सकते हैं कि इसी सूबे के ‘लद्दाख’ क्षेत्र के लोगों के साथ पिछले सत्तर साल से न्याय हो रहा था?  क्या यह हकीकत नहीं है कि कश्मीर घाटी से जिस तरह हिन्दू पंडितों को निकाला गया था उसके पीछे पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी संगठनों का हाथ था और ये संगठन कश्मीर की महान और दिलखुश संस्कृति को जेहादी तेवरों में ढालने की हरचन्द कोशिश कर रहे थे और मुल्क पर जां निसार करने वाले कश्मीरियों को मजहबी तास्सुब में रंग देना चाहते थे। वक्त की मांग तो यह है कि भारत को अब सिर्फ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बारे में ही बात करनी चाहिए और पाकिस्तान से पूछना चाहिए कि 1947 में कश्मीर पर आक्रमण करके जो हिस्सा उसने कब्जाया था वहां रहने वाले कश्मीरियों की हालत उसने क्या बना कर रखी हुई है? 

क्या कयामत है कि कश्मीर में ईद का त्याैहार पूरी तरह शान्ति और अमन-चैन से मनाया जाना भी पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा है और वह झूठी अफवाहें फैलाकर घाटी के लोगों को भड़काना चाहता है मगर इससे भी बड़ा अफसोस यह है कि भारत की ही कुछ सियासी पार्टियां ऐसी ही अफवाहों को हवा देने का काम कर रही हैं। इस समय हर भारतवासी का यही ध्येय होना चाहिए कि कश्मीरी हमारे हैं और हम सब एक हैं। जय हिन्द का उद्घोष हमारा कौमी नारा है।