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भारत का बहुमत का लोकतन्त्र

लोकतन्त्र की खूबी यह होती है कि यह सिर्फ बोलता ही नहीं बल्कि खड़कता है और इस तरह प्रश्फुट होता है कि इसमें शामिल सभी पक्ष अपनी-अपनी बात ऊंची आवाज करके कह सकें। निश्चित तौर पर इस व्यवस्था का आधार लोकमत होता है जिसका पैमाना वे चुनाव होते हैं जिनमें जनता अपनी राय व्यक्त करती है। यह राय इस प्रकार गोपनीय रखी जाती है कि प्रत्येक नागरिक मतदाता की विश्वसनीयता और गरिमा को किसी प्रकार से भी ठेस न लगे। इसकी वजह भी बहुत साफ है कि लोकतन्त्र का मालिक अन्ततः आम आदमी ही होता है और उसके एक वोट के अधिकार के प्रयोग से ही सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। ये सरकारें बेशक बहुमत से कायम होती हैं मगर हर मतदाता की सरकारें होती हैं। वोट को गोपनीय बनाये रखने के नियम को इसी बात से भलीभांति समझा जा सकता है कि सत्तारूढ़ सरकार हर हालत में जनता की सरकार बनी रहे और उसका हर कार्य सर्वजन के हित में हो, परन्तु भारत की संसदीय प्रणाली में वैयक्तिक बहुमत का सिद्धांत लागू होता है जिसका अर्थ होता है कि किसी एक सीट पर खड़े दस प्रत्याशियों में से जिस प्रत्याशी के पक्ष में भी एक भी वोट ज्यादा होगा वही जीता हुआ माना जायेगा। इस प्रणाली के अपने फायदे और नुकसान भी हैं। यह फायदा  और नुकसान ‘बहुमत’ और ‘जनमत’ के रूप में समझा जा सकता है।

 सत्तारूढ़ दल वही बनता है जिसे बहुमत मिलता है मगर जरूरी नहीं कि यह जनमत भी हो। चुनाव में खड़े विभिन्न प्रत्याशियों के बीच वोट बंट जाने से बहुमत और जनमत का अन्तर पैदा होता है। स्वतन्त्र भारत में अभी तक इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल और पंजाब राज्य रहे हैं। केरल में एक प्रतिशत वोट के अन्तर से सत्तारूढ़ व विपक्षी गठबन्धन के दलों के बहुमत के बीच खासा अन्तर होता आया है। परन्तु उत्तर भारत में इसका मुजाहिरा पहली बार 2012 के पंजाब विधानसभा चुनावों में हुआ था जब सत्तारूढ़ अकाली दल ने विपक्षी कांग्रेस से मात्र सभी 117 सीटों पर केवल 50 हजार से भी कम मतों की बढ़त लेकर सीटों में भारी अन्तर पैदा करके पुनः सत्ता हथिया ली थी। मगर इसके लिए अकाली दल के रणनीतिकारों ने खासा दिमाग लगाया था और कांग्रेस का टिकट पाने के आतुर अधिसंख्य प्रत्याशियों को निर्दलीय चुनाव लड़ने के लिए उकसा कर सत्ता विरोधी मतों को बांटने की जुगत लगाई थी। परिणाम यह हुआ था कि कांग्रेस के प्रत्याशी पचास से अधिक सीटों पर बहुत कम के अन्तर से पराजित हो गये थे और सत्ता पुनः अकाली दल के हाथ में आ गई थी। वैयक्तिक बहुमत प्रणाली का नुख्स पकड़ कर अकाली दल ने यह चुनावी चौसर बिछाई थी। संयोग से बिहार के विधानसभा चुनावों में भी इस बार कुछ एेसा हुआ है कि 20 से अधिक प्रत्याशियों की हार-जीत का अन्तर एक सौ या दो सौ वोटों के बीच रहा है। 

इस सन्दर्भ में पोस्टल बैलेट या डाक द्वारा प्राप्त मतों की गणना विवादास्पद हो गई है। विपक्ष के नेता श्री तेजस्वी यादव जो कि महागठबन्धन की तरफ से मुख्यमन्त्री पद के दावेदार के तौर पर जनता के बीच पेश किये गये थे, उनका कहना है कि इन पोस्टल मतों की गिनती या इन्हें रद्द करने की प्रक्रिया में धांधली बरती गई। जिसकी वजह से उनके कई प्रत्याशियों को हारा हुआ घोषित कर दिया गया। विशुद्ध रूप से उनकी यह शिकायत चुनाव आयोग से है क्योंकि चुनावी प्रक्रिया को आयोग ही पूरी तरह स्वतन्त्र निष्पक्ष रह कर अंजाम देता है और इनकी शुद्धता व पवित्रता बनाये रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। यह जिम्मेदारी चुनाव आयोग को इस प्रकार निभानी पड़ती है कि प्रत्येक प्रत्याशी उसकी कार्रवाई से सन्तुष्ट हो। मगर श्री तेजस्वी यादव ने पोस्टल मतों को लेकर असन्तोष व्यक्त करते हुए जनता के फैसले और चुनाव आयेग द्वारा घोषित नतीजों को अलग-अलग दर्जे में रखा है।

 दरअसल चुनाव आयोग जो भी नतीजे घोषित करता है वे जनता का आदेश ही होते हैं क्योंकि वह उसके द्वारा दिये गये मतों की गणना करता है परन्तु तेजस्वी यादव ने इस गणना में गड़बड़ी का आरोप लगाया है जो बहुत गंभीर मामला कहा जा सकता है जिसकी तरफ चुनाव आयोग को अपने  द्वारा बनाये गये पारदर्शी नियमों के तहत जांच करनी होगी, परन्तु यह भी हकीकत है कि राज्य में श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की जीत हो चुकी है और उसे बहुमत मिल चुका है क्योंकि 243 सदस्यीय विधानसभा में उसे 125 सीटें मिली हैं जबकि तेजस्वी बाबू के नेतृत्व वाले महागठबन्धन को 110 सीटें ही मिली हैं।  अतः इन नतीजों को न मानने का कोई सवाल पैदा नहीं होता है।  एेसी मंशा तेजस्वी बाबू ने जाहिर की है और कहा है कि वह बिहार की जनता का धन्यवाद देने के लिए यात्रा करेंगे। 

मुख्य बात यह है कि महागठबन्धन को एनडीए के मुकाबले 50 हजार के लगभग कुल मत कम मिले हैं  जो एनडीए के मतों से केवल दशमलव जीरो तीन प्रतिशत (.03 प्रतिशत) कम हैं मगर सीटों में 15 का अन्तर है। जो बहुमत को दिखाता है हालांकि जनमत एेसा नहीं है क्योंकि 25 प्रतिशत के लगभग मत उन उम्मीदवारों को मिले हैं जो महागठबन्धन के अलावा अन्य पार्टियों द्वारा खड़े किये गये थे। क्योंकि महागठबन्धन व एनडीए को 37-37  प्रतिशत के आसपास ही वोट मिले हैं, परन्तु हमारी चुनाव प्रणाली बहुमत का शासन ही प्रदान करती है जो जीती हुई सीटों से ही आंका जाता है। इसी वजह से लोकतन्त्र सिर्फ बोलता नहीं बल्कि खड़कता है।