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भारत : संकट मोचन नाम तिहारो!

भारतीय संस्कृति जीवन की विधि है,

संस्कारों से पोषित बहुमूल्य विधि है।

भारत विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने आपको बदलते समय में ढालती भी आई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत अब आत्मनिर्भर भारत की ओर अग्रसर है। जब भी देश संकट की​ स्थिति में आया देश के नागरिकों ने कुर्बानी देकर देश की रक्षा की। इसके लिए क्या सेना, क्या जवान, सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में परिश्रम की गति बढ़ाकर सामूहिक रूप से देश को चुनौतियों से बाहर निकाल लिया। यही राष्ट्रीय धर्म है।

भारतीय संस्कृति समूचे विश्व की संस्कृतियों में सर्वश्रेष्ठ और समृद्ध संस्कृति है। भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व शिष्टाचार, तहजीब, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएं और मूल्य हैं। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम का भाव रखने वाली संस्कृति है। भारत ने न केवल अपने देश को अपितु समूची धरा को सदैव एक परिवार माना है, जबकि अन्य देशों ने भारत को एक बाजार ही माना। कोरोना महामारी का संकट बहुत बड़ा है। कोरोना संक्रमण से पीड़ित देशों की मदद करना भारत का राष्ट्रीय धर्म भी है, परिवार का कोई सदस्य अगर अस्वस्थ है तो उसकी सेवा करना भी हमारा धर्म है। इसीलिए तो भारत ने नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, मारीशस, सेशेल्स, ब्राजील आैर मोरक्को को कोरोना वैक्सीन भेजी। 

कई और देशों को भी सीरम से कोवि​शील्ड और भारत बायोटेक की वैक्सीन को खरीदने की भी इच्छा जताई है। इस वर्ष मार्च से भारत हर महीने दस करोड़ डोज तैयार करने लगेेगा और वैक्सीन निर्यात तेज हो जाएगा। चीन की गोद में बैठकर नेपाल ने भले ही भारत विरोधी रुख अपनाया हो, भले ही के.पी. शर्मा ओली ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए भारत विरोध को पैनी धार दी हो लेकिन भारत ने मानव धर्म अपनाते हुए उसे वैक्सीन दी। चीन से मिले धोखे के बाद जब कोरोना से कराहते ब्राजील के दर्द पर भारत ने जैसी ही वैक्सीन वाला मरहम लगाया, ब्राजील के राष्ट्रपति जैद बोल्सोनारो भावुक हो गए। उन्होंने ट्विटर पर हनुमान जी की तस्वीर पोस्ट करते हुए ना सिर्फ भारत को भगवान बताया बल्कि आपातकाल में मदद के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद भी दिया है। हनुमान जी की तस्वीर उस पल को दर्शाती है जब वह मेघनाद के बाण से घायल लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी बूटी ला रहे हैं। ब्राजील ने भारत को संकट मोचक बताया है। ब्राजील ने अपने लोगों की जिन्दगी बचाने के लिए चीन के साथ वैक्सीन को लेकर करार किया था। चीन ने ब्राजील को झूठा आंकड़ा देकर कहा कि चीन वैक्सीन 95 फीसदी कारगर है। ब्राजील ने चीन से वैक्सीन मंगा लिया लेकिन जब वैक्सीन की टैस्टिंग की गई तो वो 50 फीसदी भी कारगर नहीं पाई गई। चीन से मिले इस धोखे के बाद ब्राजील के वैज्ञानिकों और ब्राजील के राष्ट्रपति ने कड़ा ऐतराज जताया और चीन की कड़ी आलोचना की। इससे पहले राष्ट्रपति बोल्सोनारो ने पिछले वर्ष हनुमान जयंती पर कोरोना महामारी के लिए गेमचेंजर बताई जा रही हाड्रोक्सीकलोेरो क्वीन को संजीवनी बूटी करार दिया था। अब भी कुछ लोग कह सकते हैं कि यह तस्वीर साम्प्रदायिक है। विडम्बना यह है कि कोरोना वैक्सीन में भी राजनीतिक दल ढूंढे गए, धर्म को ढूंढा गया। अगर भारत में किसी दवा के साथ हनुमान जी की तस्वीर लगा दी जाती तो शायद तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग वैक्सीन को लगाने से इंकार कर देते और शोर मचाते कि यह वैक्सीन किसी पार्टी विशेष की है, कोई भी दवा और वैक्सीन का कोई धर्म नहीं  होता, बल्कि उसका एक ही धर्म होता है, मानव की रक्षा करना। हमें आज विचार करना होगा कि दुनिया भारत की संस्कृति का कितना सम्मान करती है, कितनी सराहना करती है। अमेरिका जैसी वैश्विक शक्ति भी भारत को संकटमोचक बता रही है। हमें तो आज अपने वैज्ञानिकों पर गर्व करना चाहिए, जिन्होंने इतने कम समय में कोरोना की कारगर वैक्सीन ढूंढ निकाली। वैक्सीन उत्पादन में भारत पहले ही हब बन चुका है। भारत ने चीन को पछाड़ते हुए पड़ोसियों तक वैक्सीन पहुंचाई है। पड़ोसी देशों को भी इस बात का अहसास हो चुका होगा कि संकट की घड़ी में दोस्त कौन है, दुश्मन कौन है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे वैक्सीन मैत्री का नाम दिया है, कूटनीतिक भाषा में इसे वैक्सीन डिप्लोमैसी कहते हैं। यद्यपि भारत ने वैक्सीन की मदद मानवता के आधार पर की है लेकिन कूटनीतिक क्षेत्रों में इसे दक्षिण एशिया में चीन के दबदबे को भारत द्वारा कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अगर भारत और पड़ोसी देश मतभेद भुलाकर साथ आ जाएं तो चीन जैसा धूर्त देश का वर्चस्व भंग हो जाएगा। वैक्सीन से पड़ोसी देशों की मदद को एक सकारात्मक पहल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। भारत ने हमेशा ही पड़ोसी देशों की मदद की है। चाहे वह नेपाल, बंगलादेश हो या श्रीलंका। पाकिस्तान भी भले ही खुल कर नहीं बोले लेकिन दबी जुबान में तो उसने भी भारत में बनी वैक्सीन को इस्तेमाल की अनुमति दे दी है। चीन ने तो वैक्सीन आने से पहले ही दुनिया भर में मार्केटिंग शुरू कर दी थी लेकिन भारत ने कभी किसी देश को वैक्सीन खरीदने को नहीं कहा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले ही कह दिया था कि भारतीय वैज्ञानिक कारगर वैक्सीन तैयार कर लेते हैं तो उसका फायदा पूरी दुनिया को होगा। जो लोग भारत में वैक्सीन को लेकर भ्रम फैला रहे हैं उन्हें तो भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व करना चाहिए। भारत ने तो पड़ोसियों को वैक्सीन की पहली खेप मुफ्त में दी है। जबकि चीन ने अपने दोस्त पाकिस्तान को भी यह कहकर अपमानित किया और कहा कि अपना विमान लाओ और बीजिंग से वैक्सीन ले जाओ। भारत आज वैक्सीन से दुनिया का सिरमौर बना है, इसकी माटी को शत्-शत् नमन।