भारत-वियतनाम रिश्ते : चीन को संदेश


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भारत सन् 1947 में आजाद हुआ और वियतनाम इससे दो वर्ष पूर्व 1945 में आजाद हुआ था। उस समय में भी दोनों देश काफी करीब रहे। इस करीबी की जड़ें दोनों देशों के विदेशी शासन से स्वतंत्रता के संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। फ्रांसीसी शासन से आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहले नेताओं में से एक थे जिन्होंने वियतनाम का 1954 में दौरा किया था। इन संबंधों की नींव जवाहरलाल नेहरू और हो चि मिन्ह ने रखी थी। दोनों देशों के बीच 1972 में आधिकारिक तौर पर कूटनीतिक संबंध कायम हुए थे, तब से लेकर आज तक मित्रता गहरी होती गई। यह संबंध चीन से वियतनाम के बीच चले सीमा युद्ध और भारत-चीन के विवाद की वजह से भी मजबूत होते गए।वियतनाम दुनिया के इतिहास में दर्ज एक ऐसा देश है जिसने दर्दनाक युद्धों का सामना किया। पहले उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच लड़ा गया। उत्तरी वियतनाम को रूस और चीन की मदद थी तो दक्षिणी वियतनाम को अमेरिका और दक्षिण कोरिया का साथ मिला था। चीन को भी मुंह की खानी पड़ी, फिर फ्रांस को भी मजबूर होकर शांति वार्ता का रास्ता अपनाना पड़ा। इस वार्ता को जिनेवा समझौता का नाम दिया गया। अमेरिका की पांच लाख सैनिकों वाली सेना भी वियतनाम में अपने इरादों में सफल नहीं हो सकी। इस युद्ध में 30 लाख लोग मारे गए जिसमें 58 हजार अमेरिकी सैनिक शामिल थे। वियतनाम के देशभक्त लोग सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह आंदोलन देखने को मिले अंततः 1973 में अमेरिका को भी अपनी सेना वापिस बुलानी पड़ी। विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली अमेरिका भी युद्ध जीत नहीं सका।

20 वर्ष चले युद्ध के बाद वियतनाम कम्युनिस्ट सरकार द्वारा सोशलिस्ट रिपब्लिक आफ वियतनाम बनाया गया। कहा जाता है कि वियतनाम योद्धाओं ने छत्रपति शिवाजी महाराज को आदर्श मान कर उनकी युद्ध नीति का आलंबन किया था। इसी कारण अमेरिका को युद्ध में झुकने को मजबूर होना पड़ा। वियतनाम के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष ने यह भी कहा था कि अगर छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व में राज किया होता। ऐसे देश से भारत के संबंध गौरव की ही बात है। भारत ने भी अमेरिका की परवाह न करते हुए वियतनाम का साथ दिया था। वियतनाम के राष्ट्रपति त्रान दाई क्वांग भारत दौरे पर हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बातचीत के बाद दोनों देशों ने एक सक्षम और नियम आधारित क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के साथ मुक्त और समृद्ध हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के लिए काम करने का संकल्प जताया है।

इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य विस्तार के लिए अह्म संदेश के रूप में देखा जा रहा है। दोनों देशों ने परमाणु ऊर्जा, व्यापार आैर कृषि क्षेत्र में तीन समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए। दक्षिण चीन सागर को लेकर चल रहे विवाद के कारण वियतनाम आसियान देशों के साथ भारत के बहुआयामी संपर्क का समर्थन करते हैं। भारत और वियतनाम का स्टैंड यही रहा है कि क्षेत्र में नौवहन और आकाश में उड़ान की आजादी होनी चाहिए। संसाधन सम्पन्न दक्षिण चीन सागर को लेकर वियतनाम और कई अन्य अभियान सदस्य देशों का चीन के साथ क्षेत्रीय विवाद है। इस मामले में जहां एक तरफ भारत और अमेरिका सहित दुनिया की अन्य ताकतें मामले को अंतर्राष्ट्रीय कानून के आधार पर सुलझाने पर जोर दे रहे हैं वहीं चीन इस मामले में अलग-अलग देशों के साथ द्विपक्षीय रूपरेखा चाहता है और बार-बार दादागिरी दिखाता है। चीन हिन्द महासागर आैर प्रशांत क्षेत्र में अपना दबदबा कायम करना चाहता है। दक्षिण चीन सागर को वह अपना क्षेत्र बताता है। प्रशांत क्षेत्र में भारत के साथ अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया पहले ही मिलकर काम करने की इच्छा जता चुके हैं। वियतनाम भारत की एक्ट ईस्ट नीति का महत्वपूर्ण सांझेदार है। वह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान में भारत के लिए समन्वयक की भूमिका निभा रहा है।

चीन के पुराने दुश्मन के साथ भारत की दोस्ती को वह कैसे सहन कर सकता है। जब भारतीय कंपनी आेएनजीसी ने समुद्र में तेल की खोज शुरू की थी तब भी चीन ने भारत को धमकाना शुरू कर दिया था। चीन भारत को धमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ता। जब भारत ने वियतनाम को सतह से मार करने वाली आकाश मिसाइल बेचने की योजना बनाई तो चीन ने धमकी दी थी अगर भारत वियतनाम के साथ सैन्य संबंधों को मजबूत करता है तो वह चुपचाप नहीं बैठेगा। चीन की दा​दागिरी का जवाब आसियान सदस्य देशों की एकजुटता से ही दिया जा सकता है। चीन के विरोधी रवैये से परेशान देश एकजुट होकर काम करेंगे तो चीन अपनी दादागिरी नहीं दिखा सकेगा। वियतनाम, फिलीपीन्स, ताइवान, मलेशिया आैैर ब्रूनेई, चीन सागर में मुफ्त परिवहन के सवाल पर भारत के रवैये से खुश हैं। भारत का चीन के पड़ोसियों के साथ संबंध बढ़ाने से ही चीन की चुनौती का मुकाबला किया जा सकता है।