विश्व बैंक ने वर्ष 2021 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का पुर्वानुमान जारी किया है, हालांकि उसने कहा है कि भारत की विकास दर बढ़कर 7.5 फीसदी तक पहुंच जाएगी और वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनॉमिक प्रोस्पैक्टस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 के 6.7 फीसदी से बढ़कर 2018 में 7.3 फीसदी रहने का अनुमान है। 2019, 2020 और 2021 में 7.5 फीसदी बने रहने का पूर्वानुमान जारी किया गया है। वास्तव में किसी और बड़ी अर्थव्यवस्था की विकास दर 7 फीसदी को भी पार नहीं कर पाएगी। मोदी सरकार के लिए चुनावी वर्ष में यह एक अच्छी खबर है। रिपोर्ट में मोदी सरकार की ओर से किए गए ढांचागत सुधारों की सराहना भी की गई है। सरकार द्वारा नीतिगत सुधारों के लाभ अब दिखने लगे हैं आैर ऋण उठाव बढ़ा है। इससे निजी उपभोग मजबूत रहने और निवेश में तेजी जारी रहने की उम्मीद है।

इससे पहले केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने कृषि आैर विनिर्माण क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार की बदौलत चालू वित्त वर्ष 2018-19 में भारतीय अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया था। सीएसओ के अनुमान के अनुसार 2018-19 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 11.1 फीसदी वृद्धि के साथ 1,25,397 रुपए पर पहुंच जाएगी जो 2017-18 में 1,12,835 रुपए थी। आर्थिक मोर्चे पर विशेष रूप से बैंकिंग क्षेत्र में भी जहां सुधार के संकेत सामने आए, वहीं राजकोषीय घाटे के संदर्भ में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेतली ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार राजकोषीय घाटा पाटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के कोष का इस्तेमाल नहीं करेगी। वित्त मंत्री अरुण जेतली ने हाल ही में सम्पन्न हुए संसद के शीतकालीन सत्र में लोकसभा की अनुपूरक मांगों पर चर्चा के दौरान यह वक्तव्य विपक्ष के उन आरोपों के जवाब में दिया, जिसमें कहा गया है कि सरकार की नज़र रिजर्व बैंक के कोष पर इसलिए है कि वह राजकोषीय घाटा पाटना चाहती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि राजकोषीय घाटा पाटने की दिशा में मोदी सरकार का रिकार्ड पूर्व की सरकारों से कहीं बेहतर रहा है। तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर गुलाबी बन रही है। सरकार रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष का उपयोग जन-कल्याण नीतियों के लिए करना चाहती है। इसका निर्णय विमल जालान की अध्यक्षता में गठित उपसमिति की संस्तुतियों के आधार पर किया जाएगा। समिति का गठन पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल ने ही किया था। रिजर्व बैंक के कोष का उपयोग बैंकों की सहायता अथवा गरीबी निवारण के कार्यक्रमों पर किया जा सकता है, ऐसा संकेत स्वयं जेतली ने किया है। रिजर्व कोष के उपयोग के पक्ष में जेतली का एक मजबूत तर्क भी है। उनका कहना है कि जब विश्व के केन्द्रीय बैंक कुल परिसम्पत्तियों का आठ प्रतिशत रिजर्व रखते हैं तो फिर भारत में 27-28 प्रतिशत रखने का क्या औचित्य है। वैसे जालान समिति की रिपोर्ट आने वाली है, रिपोर्ट में क्या संस्तुतियां की जाएंगी, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन रिजर्व कोष का पर्याप्त स्तर होना भी आवश्यक है।

संकट के दिनों में इसकी अत्यधिक उपयोगिता रहती है। जो भी निर्णय किए जाएं, वह राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में होने चाहिएं। जहां तक बैंकों की स्थिति का प्रश्न है, उस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का कहना है कि बैंकों का एनपीए निरन्तर घट रहा है। तीन लाख करोड़ रुपए की वसूली की जा चुकी है, इसके बावजूद सरकारी बैंकों में सुधार करने की जरूरत है। एनपीए के लिए जिम्मेदार छह हजार से अधिक बैंक अधिकारी और कर्मचारी दंडित किए जा चुके हैं। जाे भी हो, एनपीए की वसूली में अभी और सख्ती होनी ही चाहिए। अगर एनपीए की और वसूली होती है तो बैंकों की स्थिति में सुधार होगा। जीएसटी की शुरूआत आैर नोटबंदी के कदमों ने कई अनौपचारिक क्षेत्रों को औपचारिक क्षेत्र में बदला है। बढ़ रही खपत और निवेश का परिणाम है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण अस्थाई मंदी के बाद अर्थव्यवस्था में फिर से तेजी आ रही है।

2017 में चीन की विकास दर 6.9 प्रतिशत रही थी जबकि भारत की जीडीपी वृद्धि 6.7 प्रतिशत थी। भारत अब आने वाले वर्षों में चीन को पछाड़ सकता है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत जैसी उभरती आैर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सचेत करते हुए कहा है कि उन्हें भविष्य में कुछ मुश्किलें झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। इन देशों की सरकारों को अपना कर्ज प्रबंधन मजबूत बनाने के साथ सुधारों को तेजी से लागू करना होगा। भारत 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार होगा, उसके आगे केवल चीन और अमेरिका होंगे। सरकार को रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।