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भारत का ताज ‘ताजमहल’

यह मुल्क किस दरवाजे पर जाकर अपना माथा फोड़े जब इसकी अजीम विरासत की बुलन्दियों के निशानों को कुछ सिरफिरे लोग पूरी कौम के लिए धब्बा और दाग बताकर अपनी सियासत गर्माने की कोशिशें करने लगें, मगर यह वह मुल्क है जिसकी शानदार विरासत को हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर बनाया है और इसका सिर शान से ऊंचा रखा है। सियासत की तिजारत करने वाले लोग इस हकीकत से अंजान बने रहना चाहते हैं कि मुगल काल में हिन्दुस्तान का दुनिया के कारोबार में हिस्सा किसी भी दूसरे मुल्क से सबसे ज्यादा था और यह कुल कारोबार के 50 फीसदी से भी ज्यादा था। अपनी विरासत को कोसने वाले सिवाय जाहिलों के अलावा और कुछ नहीं कहे जा सकते जिन्हें यह तक पता नहीं है कि ताजमहल बनवाने वाला मुगल बादशाह ‘शाहजहां’ एेसी खुली तबीयत का शहंशाह था जिसके राज में दीवाली का त्यौहार शाही जश्नों की फेहरिस्त में शामिल था और उसका बेटा ‘दारा शिकोह’ भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का गंभीर अध्येता था।

जम्मू-कश्मीर राज्य की मूल संस्कृति को पूरी तरह संरक्षित रखते हुए उसने यहां की कुदरती खूबसूरती में बिना कोई दखल दिये हिन्दुओं के पवित्र धार्मिक स्थलों की पूरी हिफाजत करने का हुक्म जारी किया था। वह भारत की शान में हर नजरिये से बढ़ौतरी चाहता था इसी वजह से उसने दिल्ली में लालकिले को तामीर किया था और उसके ठीक सामने जामा मस्जिद बनवाने के साथ ही दिल्ली में उस समय स्थित हिन्दू मन्दिरों के लिए ‘जकात’ का इंतजाम किया था। अपनी सबसे प्रिय बेगम ‘मुमताज महल’ की याद में आगरे में ‘ताजमहल’ बनवा कर उसने भारतवासियों को एेसी सौगात दी जिसकी मिसाल पूरी दुनिया के इतिहास में दूसरी मिलनी मुश्किल है। यह एक बादशाह का ‘स्थापत्य कला’ की शास्त्रीयता के लिए समर्पण भी था क्योंकि वह इस इमारत को सारे संसार के सामने ‘बेनजीर’ बनाना चाहता था। एेसे शहंशाह को कोस कर हम पूरे भारत का कद छोटा कर रहे हैं और ताजमहल को विरासत का हिस्सा न मान कर अपने वजूद की ही तौहीन कर रहे हैं।

मुगलिया सल्तनत के दौर को जो लोग हिन्दू–मुसलमान की नजर से देखने की गफलत करते हैं वे भूल जाते हैं कि एक संयुक्त देश के रूप में पूरी दुनिया में भारत की ताकत की धाक जमाने में इस दौर की महत्वपूर्ण भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके साथ यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि मुगल शासक भारत की सम्पत्ति देश से बाहर नहीं ले गये बल्कि इसी मुल्क में रहकर उन्होंने इस देश की शासकीय व्यवस्था में सुधार किया और इसके विकास को अपना लक्ष्य बनाया। भारत में पहला भूमि सुधार ‘अकबर महान’ के शासनकाल में हुआ था जिसे उसने ‘राजा टोडरमल’ की मार्फत कराया था। बेशक उन्होंने हिन्दू राजाओं से लड़ाइयां अपने शासन के विस्तार हेतु लड़ीं मगर उनका सम्बन्ध उस समय व्याप्त विजय प्रतीकों से था जिनमें धार्मिक पुट भी प्रभावी तौर पर था मगर औरंगजेब को छोड़कर शेष सभी मुगल शासक हिन्दू संस्कृति के उस प्रभाव में आये बिना नहीं रह सके जिसमें धार्मिक मतभिन्नता और सहिष्णुता को समुचित सम्मान दिया गया था। अतः शाहजहां द्वारा बनाई गई इमारतों में हिन्दू स्थापत्य कला का प्रभाव साफ नजर आता है। इनकी कलात्मकता भी अन्य इमारतों के मुकाबले अनूठी है विशेषरूप से राजस्थान की कला की इन पर विशिष्ट छाप है।

ताजमहल भी इससे अलग रखकर नहीं देखा जा सकता मगर विचारणीय विषय यह है कि राजनीतिक दलों के पास जब कोई जनता के विकास से सम्बन्धित नजरिया नहीं होता तो वे इस प्रकार के गड़े मुर्दे उखाड़कर ऊल–जुलूल मुद्दों को राजनीति के केन्द्र में क्यों लाना चाहते हैं ? इसका एकमात्र कारण होता है संस्कृति के नाम पर आमजन को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काना। इस कार्य में अंग्रेज पूरी तरह माहिर थे और इसी को अपनी नीति बनाकर उन्होंने भारत पर दो सौ वर्षों तक राज किया और भारत की ताकत न केवल समाप्त की बल्कि इसे आधुनिक विकास के क्रम से भी बाहर कर दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 1757 के करीब जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को ईस्ट इंडिया कम्पनी के लार्ड क्लाइव ने हराया था तो भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा 25 प्रतिशत के लगभग था, मगर इसके बाद जैसे-जैसे ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारत में विस्तार होता रहा वैसे-वैसे ही भारत उस समय की आधुनिक टैक्नोलोजी आदि से महरूम होता गया और हालत यह हो गई कि जब 1947 में अंग्रेज भारत को छोड़कर गये तो भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम रह गया।

अंग्रेजों ने यह कार्य भारतीयों को आपस में लड़ाकर ही किया मगर स्वतन्त्र और लोकतान्त्रिक भारत में इस प्रकार की राजनीति का सीधा अर्थ होता है राजनीति का ‘नीति शून्य’ होना। यह नीति शून्य राजनीति ही लोकतन्त्र में वोट बैंक की राजनीति का आधार होती है क्योंकि इसके तहत जाति या धर्म को आसानी से मतपत्रों की संख्या में बदला जा सकता है, मगर यह लोकतन्त्र में आम जनता के विकास के स्थान पर केवल सत्ता में बैठे लोगों का विकास जनता के विकास की कीमत पर करती है। क्या यह संयोग कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था की नाजुक स्थिति के बारे में सार्थक बहस करता देश अचानक ताजमहल पर बहस में उलझ गया और वह भी तब जबकि ताजमहल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ‘नायाब’ माना जाता है। सवाल किसी राजनीतिक पार्टी का नहीं है बल्कि राजनीति का है। संगीत सोम या डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे लोग हर पार्टी में हैं। इनके कहे को एक कान से सुनकर दूसरे से निकालने की जरूरत है। डा. स्वामी तो उस शै का नाम है जिसने इमरजेंसी में स्व. इंदिरा गांधी द्वारा लालकिले में ही गाड़े गये काल इतिहास (कैप्सूल) को जनता पार्टी के शासन में आने पर जमीन से खुदवाया था मगर उसमें जब कुछ भी आपत्तिजनक नहीं निकला तो उसे पुनः गाड़ दिया गया।

अब यह महाशय फरमा रहे हैं कि ताजमहल के तहखाने के हिस्से में बन्द पड़े 12 कमरों को खुलवाओ। सबसे पहले इन्हें अपने दिमाग के तहखाने को खोलना चाहिए, क्योंकि यह विवाद अब कोई विवाद नहीं रहा है कि ताजमहल पहले मन्दिर था या कुतुब मीनार पहले विष्णु ध्वज थी। इस बारे में साठ के दशक में इतिहासकार डा. पी.एन. ओक ने लिखा था मगर यह एेतिहासिक साक्ष्यों काे घुमा–फिरा कर पेश करने के अलावा और कुछ नहीं निकला। इसमें राष्ट्रवाद जैसी कोई अवधारणा भी नहीं है क्योंकि इतिहास अपने समय की हकीकत से खड़ा होता है और भारत की हकीकत यह है कि अकबर के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले हिन्दू राजा महाराणा प्रताप का सिपहसालार मुसलमान पठान हाकिम खां सूर था और अकबर का सिपहसालार राजा मानसिंह था। इतिहास यह है कि मुगल बादशाह शाह आलम-द्वितीय की आंखं निकाल कर अंधा बनाने वाला उसका सरदार नजीबुद्दौला था और अन्धे शाह आलम को पुनः दिल्ली की गद्दी पर बिठाने वाला ग्वालियर रियासत का राजा महादजी सिन्धिया था।