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भारत की अनूठी न्यायप्रणाली

भारत के लोकतन्त्र की यह विशेषता शुरू से ही रही है कि जब इस व्यवस्था की राजनीतिक प्रणाली में किसी भी प्रकार की खड़खड़ाहट होने लगती है तो इसकी न्यायप्रणाली उठ कर इसे इस प्रकार दुरुस्त करती है कि इसमें ‘खराश’ तक का इलाज कर दिया जाये। विगत 5 जनवरी को पंजाब की ‘हुसैनीवाला’ सरहद से मात्र 20 कि.मी. दूर फिरोजपुर जिले में प्रधानमन्त्री की सुरक्षा व्यवस्था में जो सेन्ध लगी उसे लेकर केन्द्र व राज्य सरकार परस्पर इस तरह उलझ रही थीं कि भारत की संघीय प्रणाली की प्रतिष्ठा के दागदार होने का खतरा पैदा होने लगा था। मगर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने बीच में पड़ कर इसका हल जिस तरह निकाला वह भारत के लोकतन्त्र की ताकत का परिचायक कहा जायेगा जिसके अनुसार विधि द्वारा स्थापित किसी भी सत्ता को केवल संविधान के दायरे और इसकी विश्वसनीयता के घेरे में ही रह कर काम करना पड़ेगा। 

सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि भारत के प्रधानमन्त्री की सुरक्षा व्यवस्था के साथ किसी भी पार्टी राज्य सरकार अंश मात्र भी समझौता नहीं कर सकती है क्योंकि प्रधानमन्त्री बेशक भारत के राजनीतिक ढांचे के प्रशासनिक तन्त्र के भीतर लोकसभा में बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल के प्रतिनिधि होते हैं मगर इस पद पर आशीन होते ही वह पूरे देश के प्रधानमन्त्री हो जाते हैं और इसी वजह से  विभिन्न दलों के सांसदों की संरचना से बनी लोकसभा के भी वह नेता होते हैं (उनके राज्यसभा सदस्य होने पर यह समीकरण बदल जाता है)। अतः इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पंजाब में कांग्रेस पार्टी की सरकार है और केन्द्र में भाजपा सत्तारूढ़ है। प्रधानमन्त्री की सुरक्षा इन सब राजनीतिक विभेदों से ऊपर सर्वमान्य होती है। लेकिन 5 जनवरी के बाद इस मुद्दे पर जिस तरह की राजनीति चली उससे भारत की संघीय ढांचे की एकात्म व्यवस्था को ठेस लगनी स्वाभाविक थी क्योंकि कांग्रेस व भाजपा एक-दूसरे की आलोचना राजनीतिक आग्रहों के चलते करने लगीं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि पंजाब में अब विधानसभा चुनाव जल्दी होने हैं। इस सुरक्षा चूक के मुद्दे पर केन्द्र व राज्य सरकार दोनों ने ही अपनी जांच समितियां बना डालीं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जब इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई तो न्यायमूर्तियों ने दोनों ही जांच समितियों पर रोक लगाते हुए अपनी ही निगरानी में एक स्वतन्त्र जांच समिति गठित करने के फैसले का विचार व्यक्त किया। यह जांच समिति देश की सबसे बड़ी अदालत के एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश के नेतृत्व में ही गठित होगी और इसमें ऐसा  कोई पुलिस या सरकारी उच्च अफसर शामिल नहीं होगा जिसका वास्ता परोक्ष रूप से भी घटना के तारों से जुड़ा हुआ हो। 

मगर सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को भी गंभीरता से लिया है कि उसके केन्द्र व राज्य को जांच के मामले में आगे न बढ़ने के पूर्व निर्देशों के बावजूद पंजाब के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक को कारण बताओ नोटिस जारी किये गये। इस बात को भी समझा जाना चाहिए कि प्रधानमन्त्री की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए  ही 1988 में भारतीय संसद में स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) कानून बना कर विशेष कमांडो पुलिस की स्थापना की गई थी जिसे उनकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार बनाया गया था। परन्तु भारत की संघीय व्यवस्था में यह कार्य एसपीजी तभी कर सकती है जब किसी भी राज्य में प्रधानमन्त्री की यात्रा के समय उस प्रदेश की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदार राज्य सरकार एसपीजी के साथ पूरा सहयोग करे और उसे रणनीतिक सहयोग दे।

 विगत 5 जनवरी को प्रधानमन्त्री भारत-पाकिस्तान सीमा के बहुत निकट थे अतः उनकी सुरक्षा के लिए और मजबूत किलेबन्दी की जरूरत स्वाभाविक थी। मगर उनका काफिला बीच में ही अवरोध की वजह से 20 मिनट तक रुका रहा जहां से उन्होंने वापस जाने का फैसला किया और हुसैनीवाला व फिरोजपुर के अपने कार्यक्रमों को रद्द कर दिया। कांग्रेस की तरफ से इसकी वजह राजनीतिक बताई गई जबकि भाजपा ने इसे एक साजिश तक का हिस्सा बताया। दोनों में जमकर दोषारोपण होने लगा तो सर्वोच्च न्यायालय में सुरक्षा सेंध पर याचिका दायर हुई और देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एन.वी. रमण ने इस सुनवाई पीठ की अध्यक्षता स्वयं करते हुए दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी जांच कार्रवाइयां करने से रोकते हुए जांच की न्यायपूर्ण व निष्पक्ष विधी का गठन करने का आदेश दिया। निश्चित रूप से यह भारत की न्यायप्रणाली की पारदर्शिता और न्यायप्रियता का ही नमूना है जो सामने आया है। प्रधानमन्त्री की सुरक्षा में किसी भी स्तर पर खामी पैदा होना बहुत गंभीर मामला होता है क्योंकि प्रधानमन्त्री इस देश के लोकतन्त्र के प्रथम प्रहरी होते हैं और देश की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह एक राजनीतिक व्यक्ति होने के बावजूद देश के प्रत्येक नागरिक के विश्वास के संविधान प्रदत्त अधिकारों के महापुंज्ज होते हैं।