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संपादकीय

पुलिस का अमानवीय चेहरा

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राजधानी दिल्ली के मुखर्जी नगर में सिख चालक और उसके बेटे की पुलिस द्वारा की गई बर्बर पिटाई के मामले में सिख समुदाय में काफी रोष व्याप्त है। इस मामले की आग न केवल पंजाब बल्कि देशभर में रह रहे सिख समुदाय तक जा पहुंची है। जो वीडियो लगातार वायरल हो रहा है उसमें यद्यपि तलवार लेकर पुलिसकर्मियों के पीछे भाग रहा सिख चालक भी कम दोषी नहीं लेकिन अगर पुलिसकर्मियों ने समझदारी से काम लिया होता तो उस पर नियंत्रण पाया जा सकता था लेकिन बाद में पुलिस ने सिख चालक की पिटाई तो की ही बल्कि उसके बेटे की भी बर्बरतापूर्वक पिटाई की। इसमें पुलिस का अमानवीय चेहरा एक बार फिर सामने आ गया। 

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस मामले में गृह मन्त्रालय और दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजकर स्थिति रिपोर्ट तलब की है। दिल्ली हाई कोर्ट ने फटकार लगाते हुये यह भी कहा है कि दिल्ली पुलिस में कई अच्छे अधिकारी हैं, अगर कुछ ऐसे हैं जो खुद को नियंत्रित नहीं कर सकते तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने की जरूरत है। जिन्होंने पिता पर हमला किया वे अलग हैं लेकिन जिन्होंने बच्चे को मारा उनकी पहचान की जानी चाहिये। कोर्ट ने यह भी कहा है कि नागरिकों को इस बात को लेकर आश्वस्त किया जाना चाहिये कि पुलिस बल उनके साथ है।

लोकतन्त्र में विधि द्वारा स्थापित भारतीय संविधान को लागू करने और समाज को रोकने एवं कानून व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी पुलिस और सुरक्षा बलों पर होती है लेकिन इन जिम्मेदारियों को अक्सर एक तरफ रखकर पुलिसकर्मी अपनी कर्त्त​व्य विमुखता एवं अमानवीय कृत्यों से समूचे पुलिस तन्त्र पर बदनुमा दाग लगा रहे हैं। कानून एवं राज्य व्यवस्था का सही ढंग से संचालन तभी संभव है जब पुलिस विभाग का हर कर्मचारी और अधिकारी अपने कर्त्तव्यों तथा अधिकारों को अच्छी तरह समझकर उचित ढंग से निर्वहन करें लेकिन पुलिस में निर्दोष लोगों को बिना कारण प्रताड़ित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते आम जनता में पुलिस की साख लगातार गिर रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली पुलिस में 

घूसखोरी की प्रवृत्ति बढ़ी है। मारपीट की घटना के बाद जब आक्रोश बढ़ता गया तो पुलिस के आला अधिकारी भी मौके पर नहीं पहुंचे। किसी ने भी स्थानीय लोगों से बातचीत कर उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की। लोगों में गुस्सा इतना बढ़ गया कि पुलिस भीड़ का सामना ही नहीं कर सकी। केवल राजधानी ही नहीं बल्कि पूरे देश में खाकी वर्दी वालों की कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यह सवाल बार-बार सामने आता है कि उसकी कार्यशैली में सुधार कब आयेगा?पुलिस पर निर्दोष लोगों को थाने में बंद कर पीटने और छोड़ने की एवज में रिश्वत वसूलने के मामले तो आम हैं। फर्जी मुठभेड़ों की कई कहानियां भी सामने आ चुकी हैं कि आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के चक्कर में पुलिस अधिकारी फर्जी मुठभेड़ें करते हैं। अनेक पुलिस अफसरों और जवानों को फर्जी मुठभेड़ों के लिये दंडित भी किया गया है। 

पुलिसकर्मियों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि मानो वे भारतीय कानून से ऊपर हों। उन्हें बल प्रयोग करने का अधिकार हासिल है लेकिन यह कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये है। इसकी स्थितियां भी परिभाषित हैं, फिर भी अगर कोई पुलिस अधिकारी या सिपाही खुद को कानून से ऊपर समझने की मानसिकता खत्म नहीं करते तो उन्हें सजा मिलनी ही चाहिये। आजादी के बाद से ही देश की पुलिस न तो अपनी छवि सुधार पाई और न ही वह स्वयं को औपनिवे​िशक काल की प्रेतछाया से मुक्त हो पाई। इसमें भी कोई शक नहीं कि पुलिस की राजनीतिज्ञों और अपराधियों से सांठगांठ रहती है। पुलिस उनके एजेंटों के तौर पर काम करती दिखाई पड़ती है। 

लोकतन्त्र में पुलिस विभाग का राजनीतिकरण काफी खतरनाक होता है। सत्ता के इशारों पर काम करना उसकी फितरत बन चुकी है। नशे में धुत कोई बड़ा स्टार अगर पटरी पर सो रहे लोगों के ऊपर गाड़ी चढ़ा कर किसी को मार भी दे तो उसकी जमानत भी हो जाती है। अदालत से भी वह बरी हो जाता है। अगर कोई साधारण ड्राइवर किसी को मामूली टक्कर भी मार दे तो उसकी हालत खराब कर दी जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि बड़े आदमी क्यों छूट जाते हैं? इसका जवाब अब कौन दे? उत्तर प्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ने एक बार टिप्पणी की थी कि ‘‘भारत में पुलिस तन्त्र (चंद अफसरों को छोड़कर) अपराधियों का सबसे बड़ा संगठित गिरोह है’’ तो हमें इस प्रश्न का उत्तर कहां ढूंढने जाना होगा। 1977 में राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन कर भारत सरकार ने पुलिस सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया था। 

पुलिस के मानवीयकरण ने जोर पकड़ा। समितियों और आयोगों के गठन की लाइनें लग गईं। इनकी सिफारिशों का उद्देश्य पुलिस का चेहरा चमकाना था मगर नतीजा कुछ नहीं निकला। बार-बार न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। जरूरत इस बात की है कि ऐसे सुधार किये जायें जिससे पुलिस की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़े और वह देश के कानून और संविधान के प्रति जिम्मेदार बने। अगर ऐसे ही चलता रहा तो क्रूर और अमानवीय पुलिस के पास कौन जायेगा और समाज सड़कों पर ही इन्साफ करने लगेगा।