ईरान मध्य पूर्वी एशिया में स्थित है और यहां मौजूद देशों के साथ संबंध मजबूत करना हमेशा ही जटिल काम रहा है। पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत को जमीनी मार्ग न दिए जाने की वजह से भारत के लिए ईरान स्वा​भाविक विकल्प था। ईरान के साथ संबंधों में मुश्किल यह भी थी कि तेहरान के सुन्नी बहुल अरब देशों के साथ-साथ इस्राइल के साथ संबंध तनाव भरे हैं, जबकि यह देश भारत के कहीं ज्यादा करीब है। वहीं अफगानिस्तान में भले ही नई दिल्ली आैर ईरान परम्परागत रूप से मिलकर काम कर रहे हैं लेकिन यहां ईरान का तालिबान को समर्थन सवालों के घेरे में है। इन सब जटिलताओं के बावजूद भारत-ईरान संबंधों में आई मजबूती का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है।

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए थे। इनमें भारत की मदद से बने चाबहार बंदरगाह को लेकर समझौता अहम था। इसके तहत भारत को डेढ़ वर्ष के लिए बंदरगाह का एक हिस्सा लीज पर दिया गया है। चाबहार के जरिये माल ढुलाई के गलियारे ने इस पूरे क्षेत्र की भौगोलिक, आर्थिक और सामरिक स्थिति को बदल कर रख दिया। हालांकि इसमें काफी लम्बा वक्त लगा। बात 2003 की है जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी भारत के गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे उसी समय चाबहार बंदरगाह के विकास पर सहमति बनी थी। यूपीए सरकार ने चाबहार के विकास में जरूरी तेजी नहीं दिखाई जबकि चीन ने पाकिस्तान के मकरान स्थित ग्वादर बंदरगाह को तेजी से विकसित कर दिया था।

चाबहार बंदरगाह की उपयोगिता तब सामने आई थी जब भारत ने यहां से हजारों टन अनाज अफगानिस्तान भेजा था। चाबहार बंदरगाह मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का स्वर्णिम दरवाजा बना। भारत-ईरान रिश्तों का इतिहास बहुत पुराना है। रिश्तों का यह सिलसिला ईसा पूर्व तक जाता है, तब अमेरिका का वजूद भी नहीं था। जब पाकिस्तान का अस्तित्व नहीं था, तब दोनों देश सीमाओं पर हाथ मिलाते थे। ऐसे में सांस्कृतिक आैर व्यापारिक रिश्ते पनपने ही थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में भारत और ईरान के रिश्तों पर विस्तार से लिखा है-‘‘जितनी भी प्रजातियां बाहर से आए लोगों ने भारतीयों के जीवन और संस्कृति पर प्रभाव डाला। उनमें से ईरानियों का नाम सबसे ऊपर है। वैसे तो संस्कृत और फारसी दो अलग-अलग भाषाएं हैं लेकिन इन धाराओं के बीच कई पुल भी हैं।

ईरान के शाह के समय समाज में खुलापन था। तेहरान और उसके नजदीक लेबनान भारतीयों के लिए पसंदीदा पर्यटन स्थल थे। पिछले कई वर्षों से अमेरिका ईरान के बाजू मरोड़ता रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हुए समझौते से अलग होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रतिबंध लागू कर दिए लेकिन अमेरिका ने भारत और 7 अन्य देशों को प्रतिबंध के बावजूद ईरान से कच्चा तेल खरीदने की छूट दी है। ईरान पर तेल आयात को लेकर नए अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत-ईरान ने एक बड़ा समझौता कर लिया है। इसके जरिए अमेरिकी प्रतिबंधों से बंद हुए पेमैंट चैनल का नया विकल्प मिल गया है। भारतीय रिफाइनरियां यूको बैंक में नेशनल ईरानियन ऑयल कम्पनी के खाते में तेल आयात कर भुगतान रुपए में करेगी।

जितनी राशि का भुगतान ईरान को किया जाएगा उससे अच्छी धनराशि भारतीय सामान की खरीद पर खर्च करेगा। अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत भारत ईरान को अनाज, दवाएं आैर मेडिकल उपकरण निर्यात कर सकता है। अब तक भारत अपने तीसरे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता देश को यूरोपियन बै​ं​किंग चैनलों के जरिये यूरो में भुगतान करता रहा है। इस समझौते से यूरो या डालर की अनिवार्यता नहीं रहेगी। भारी भरकम तेल आयात बिल का भुगतान पहले भारत को विदेशी मुद्रा भंडार से करना पड़ता था। अब विदेशी मुद्रा भंडार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ईरान तेल के बदले रुपए से भुगतान लेने पर सहमति जताने वाला दूसरा देश बन गया है। तीन दिन पहले ही संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत रुपए में भुगतान लेने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर चुका है। इससे पहले 2013 में भी ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के पहले दौर में भी भारत उसे रुपए में भुगतान कर चुका है। तब भारत ने 45 फीसदी भुगतान रुपए से करने के बाद बकाया रकम का भुगतान 2015 में प्रतिबंध खत्म होने के बाद किया था।

अमेरिका ने भारत को तेल आयात के लिए 6 माह दिए हैं और भारत ईरान से 03 लाख बैरल प्रतिदिन ही अधिकतम क्रूड आयल खरीद सकता है। जबकि प्रतिबंधों से पहले भारत 5.6 लाख बैरल रोजाना तेल आयात करता था। रुपए से भुगतान और 60 दिन का क्रेडिट ऑफ परचेज मिलने से भारत लाभ की स्थिति में है। भारत-ईरान के गैस और तेल प्रोजैक्ट में भागीदारी भी करना चाहता है। तेल के खेल में अमेरिका ने धमकी दी थी कि वह ईरान को जब तक निचोड़ नहीं लेगा आैर ईरान एक नए परमाणु समझौते के लिए तैयार नहीं हो जाता जब तक उस पर प्रतिबंध जारी रहेंगे।

यूरोपीय यूनियन भी परमाणु समझौता तोड़ने के ट्रंप के फैसले के साथ नहीं खड़ा है। ईरान का तेल भारत की अर्थव्यवस्था और सामरिक दिनों के लिए बहुत जरूरी है जिसका अंदाजा भारत और ईरान दोनों को है। अमेरिकी प्रतिबंधों को निष्क्रिय करने के लिए जर्मनी और फ्रांस संभावनाओं की तलाश में लगे हैं जिसमें ईरान के साथ बिना डालर के व्यापार शा​िमल है। दोनों देशों के साथ बिना डालर के व्यापार शा​िमल हैं। दोनों देशों की कंपनियों ने ईरान में कई परियोजनाएं शुरू की थीं जो अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ठप्प पड़ी हैं। अगर बिना डालर व्यापार शुरू हो गया तो यूरोपीय यूनियन ईरान के साथ आर्थिक नजदीकियां फिर से बढ़ा लेगा और ट्रंप केवल ध​मकियां देते रहेंगे।