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वैक्सीनों की खरीद का मसला !

सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए विश्व बाजार में जो वैक्सीनें उपलब्ध हैं उनमें से ‘फाइजर और माडर्ना’  के भारत में उपयोग की इजाजत अभी तक नहीं दी गई है। हाल ही में पंजाब सरकार ने माडर्ना वैक्सीन के लिए निविदा जारी करके जो खरीद आदेश  दिया था उसे इस वैक्सीन को बनाने वाली कम्पनी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह इस बारे में केवल भारत की केन्द्र सरकार से ही बात करेगी। इसी प्रकार दिल्ली की सरकार को फाइजर और माडर्ना दोनों ने जवाब दे दिया। इसका मूल कारण यह है कि वैक्सीन उपयोग करने हेतु विदेशी कम्पनियों के लिए कुछ नियमाचार होता है और इसमें सबसे ऊपर देनदारी या साधारण समझ में जिम्मेदारी की शर्त होती है। केवल भारत सरकार ही इसकी गारंटी किसी कम्पनी को दे सकती है। बल्कि इसे इस उदाहरण से समझने में सरलता होगी कि विभिन्न राज्य सरकारें विदेशों से जो ऋण या निवेश प्राप्त करती हैं उसकी जमानत या गारंटी भी केन्द्र सरकार की ही होती है। 

यहां तक कि जो कार्पोरेट ऋण होते हैं वे भी भारत सरकार की गारंटी से ही मिलते हैं। तकनीकी भाषा में इसे ‘सावरिन गारंटी’ कहा जाता है। वैक्सीन के मामले में किसी भी प्रकार के जोखिम की गारंटी होती है जो केन्द्र सरकार को लेनी पड़ती है। इसमें बीमा भी शामिल होता है। अभी तक भारत की नौ राज्य सरकारें वैक्सीनों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय निविदाएं जारी कर चुकी हैं। तीसरी अन्तर्राष्ट्रीय  वैक्सीन जानसन एंड जानसन बचती है। इस कम्पनी की कुल उत्पादन क्षमता इतनी है कि जम्मू-कश्मीर राज्य की खपत भी पूरी नहीं हो सकती। भारत की सरकार इस कम्पनी से भारत में अपना उत्पादन केन्द्र स्थापित करने के लिए बातचीत कर रही थी मगर वह अभी तक सिरे नहीं चढ़ सकी है। इसका तात्पर्य यही निकलता है कि राज्यों द्वारा अलग-अलग वैक्सीन खरीदने के बारे में अभी तक गफलत का माहौल बना हुआ है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के सन्दर्भ में यह स्थिति किसी भी रूप में उचित नहीं कही जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर विगत दिनों जिस विशेष कार्यदल का गठन किया गया था उसका भी यह कर्त्तव्य बनता है कि विश्व बाजार से वैक्सीन खरीदने के मुद्दे पर धुंधलका छांटे और निर्देश दे कि वर्तमान  भयावह माहौल को  सहज करने के लिए क्या जरूरी कदम उठाये जायें?  वैसे हकीकत यह है कि विगत 3 जनवरी को भारत के औषध नियन्त्रक की सदारत में बनी विशेषज्ञ समिति ने माडर्ना और फाइजर के भारत में आपातकालीन उपयोग को इजाजत नहीं दी थी। इसके बाद इन कम्पनियों ने अपनी अर्जी वापस ले ली थी। इन दोनों वैक्सीनों का सफल परीक्षण पहले ही अन्य देशों में हो चुका है जिसे दूसरे व तीसरे चरण का चिकित्सीय परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) कहा जाता है। ये कम्पनियां साल भर के लिए ‘बुक’ हो गईं। अब देश की सभी राज्य सरकारें समवेत स्वर में कह रही हैं कि भारत एकमुश्त रूप से समस्त आबादी के लिए वैक्सीनें खरीदे। यह संयोग नहीं है कि विदेशमन्त्री श्री एस. जयशंकर ऐसे संकटकालीन समय में अमेरिका की चार दिनों की यात्रा पर हैं। इस यात्रा का उद्देश्य स्पष्ट है कि भारत में वैक्सीन की कमी को दूर किया जाये। 

सवाल यह नहीं है कि गलती किससे और कहां हुई है बल्कि असली सवाल यह है कि मौजूदा मुसीबत से समग्र रूप से भारत किस प्रकार बाहर निकले। हर राज्य का नागरिक सबसे पहले भारतवासी है बाद में वह पंजाबी या कश्मीरी अथवा मलयाली होता है। वैक्सीन पाने का उसका मूलभूत अधिकार है। यदि झारखंड या बिहार जैसे गरीब राज्यों के पास वैक्सीन खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं तो उसकी भरपाई सकल रूप से भारत करने से पीछे कैसे हट सकता है। अब सवाल यह है कि श्री जय शंकर अमेरिका से किसी भी तरह खाली हाथ न लौटें और वहां विभिन्न वैक्सीन कम्पनियों के कर्ताधर्ताओं से बातचीत करके इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करें और जो भी जरूरी औपचारिकताओं इन्हें पाने के लिए आवश्यक हैं उनका आश्वासन देकर आयें तथा भारत में ही इनके उत्पादन संयन्त्र लगाने का मार्ग प्रशस्त करें। यह हम बाद में तय कर लेंगे कि वैक्सीन प्रत्येक व्यक्ति को मुफ्त लगे या न लगे क्योंकि यह भारत का अंदरूनी मामला है मगर पहले वैक्सीन तो भारत में आये । ऐसा नहीं है कि इस बारे में केन्द्र सरकार सचेत नहीं है। यदि ऐसा न होता तो चालू साल के बजट में उसने वैक्सीन खरीदने के लिए 35 हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था क्यों होती ? इसमें से अभी तक बामुश्किल पांच हजार करोड़ रुपए ही खर्च हुए हैं।