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दूसरे, ब्रिटिश राज में इन ​निजी पब्लिशरों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में 1857 के विद्रोह को ‘‘Mutiny” यानि देशद्रोह विद्रोह के रूप में प्रकट किया गया था, जिसे बदलकर पंजाब के शिक्षा विभाग ने 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया। इन ब्रिटिशकालीन निजी प्रकाशकों की किताबों में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को आतंकवादी लिखा गया था, जिसे बदलकर स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरु लिखा गया।

आज पूरे देश में प्रदेश सरकारें सरकारी किताबांे का प्रकाशन करती हैं। इसकी शुरूआत तो 1952 में पूज्य दादा लालाजी ने पंजाब में की थी जिसका आज केन्द्र आैर प्रदेशाें में अनुसरण हाे रहा है। उधर भोले-भाले लालाजी और पिताजी को यह पता नहीं था कि स. प्रताप सिंह कैरों उनके साथ ‘‘मुंह में राम-राम और बगल में छुरी’’ का खेल खेल रहा था। उसे लगता था कि लालाजी अगर इस कदर कार्य करके प्रसि​द्धि हासिल कर लेंगे तो खुद कैरों कभी भी पंजाब का मुख्यमंत्री नहीं बन सकेगा और भविष्य में लाला जगत नारायण ही मुख्यमंत्री बनेंगे। उधर घर में लालाजी और रमेश जी के साथ कोई विश्वासघात कर रहा था। लालाजी और रमेश जी को बाहर से प्रताप सिंह कैरों और घर में किसी अपने ने ही लालाजी को घेरने का पूरा इंतजाम कर लिया था।

उधर लालाजी के इस कदम से निजी​ प्रकाशकों के धंधे चौपट हो गए। सभी प्रकाशकों ने मिलकर स. प्रताप सिंह कैरों द्वारा मदद प्रदान किए जाने पर, लालाजी के विरुद्ध षड्यंत्र रच दिया। लालाजी पर भ्रष्टाचार के आरोप और निजी प्रकाशकों पर ‘ब्लैकमेलिंग’ के आरोप लगा दिए। लालाजी ने आरोप लगते ही अपने सभी मंत्रिपदों से त्यागपत्र दे दिया। 

उधर पं. नेहरू ने एक ‘स्पैशल’ लोगों की टीम बनाई और लालाजी पर लगे आरोपों की जांच के लिए कमीशन बनाकर पंजाब भेजा। इस कमीशन ने लम्बी जांच पड़ताल के बाद लालाजी को निर्दोष पाया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि लालाजी के विरुद्ध कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप सही नहीं। आरोपमुक्त होते ही लालाजी ने फिर से अपने सभी विभागों के मंत्री पद सम्भाल लिया। 

अब बात करें लालाजी के स्वास्थ्य मंत्रालय की तो ब्रिटिश शासन के दौरान गरीब और अमीर का ईलाज ‘प्राइवेट डाक्टर’ और ‘प्राइवेट अस्पतालों’ में ही होता था। मरीजों से लम्बे-चौड़े पैसे निजी डॉक्टर और निजी ‘हैल्थ क्लीनिक’ बटोरते थे। पंजाब के प्रथम स्वास्थ्य मंत्री लाला जगत नारायण ने कहा अब ऐसा नहीं होगा। पंजाब सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय अपने सरकारी अस्पताल यानि ‘सिविल अस्पताल’ बनाएगा जहां प्रदेश के अमीर और गरीब लोगों का ‘फ्री’ में ईलाज होगा। इसके बाद पूरे प्रदेश में लालाजी ने धड़ाधड़ ‘सिविल अस्पतालों’ का उद्घाटन शुरू कर दिया।

आज जो देश में बड़े-बड़े सरकारी अस्पताल आपको देखने को मिल रहे हैं इनकी शुरूआत लालाजी ने बतौर स्वास्थ्य मंत्री पंजाब से ही की थी। यह उनकी दूरदृष्टि का ही नतीजा है जो देश के गरीबों को सरकारी स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है लेकिन लालाजी के इस कदम ने ‘प्राइवेट अस्पतालों’ और ‘प्राइवेट डाक्टरों’ की नाजायज आमदनी को धराशायी कर दिया। ‘प्राइवेट डाक्टर’ और ‘प्राइवेट हैल्थ अस्पतालों केे धनाढ्य मालिक तथा डाक्टर’ लालाजी के विरुद्ध प्रदेश मेंे विद्रोह पर उतर आए।

प्रताप सिंह कैरों ने इन प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों और डाक्टरों को लालाजी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के लिए प्रोत्साहित किया। नतीजा यह हुआ कि  ‘प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों और डाक्टरों’ ने लालाजी के विरुद्ध गम्भीर भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए। लालाजी ने फिर से दुबारा अपने सभी मंत्री पदों से त्यागपत्र दे दिया। दुबारा केन्द्र से पं. नेहरू ने नए लोगों का ‘कमीशन’ लालाजी के विरुद्ध लगे आरोपों की जांच के लिए दिल्ली से भेजा। इस जांच कमीशन ने लालाजी को अन्त में दोषमुक्त करार दिया। लालाजी ने दुबारा अपने मंत्रालय सम्भाल लिए। लालाजी को सभी साथियों ने समझाया कि आप इतने बड़े-बड़े फैसले मत लो लेकिन लालाजी कहां मानने वाले थे।

एक ट्रांसपोर्ट मंत्री के तौर पर लालाजी ने देखा कि ब्रिटिश काल से पूरे देश में ‘प्राइवेट बस आपरेटर’ अपनी ‘प्राइवेट’ बसें चला रहे थे। मनमाने ढंग से यात्रियों से यात्रा करने पर पैसे लिए जाते थे। गरीबों के साथ अन्याय हो रहा था। पंजाब के परिवहन मंत्री लाला जगत नारायण को यह बहुत नागवार गुजरा। उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला लिया और एक झटके में यह घोषणा कर दी कि अब पंजाब सरकार खुद की परिवहन सर्विस यानी लालाजी ने ‘पंजाब रोडवेज’ का उद्घाटन कर डाला। पंजाब के परिवहन मंत्रालय ने प्रदेश में धड़ाधड़ बसें खरीदकर सरकारी नियंत्रण के अधीन परिवहन के ‘सिस्टम’ को ही बदल दिया।

अन्त में ‘प्राइवेट’ बस आपरेटर लालाजी के विरुद्ध खड़े हो गए। क्योंकि पंजाब रोडवेज में बेहद सस्ते यात्रा भत्ते यानी यात्रा टिकट दिए जाते थे। प्राइवेट आपरेटरों का तो ‘ब्लैकमेलिंग’ का धन्धा ही लालाजी ने एक झटके में चौपट कर दिया। फिर से लालाजी के मुंह लगे भाई स. प्रताप सिंह कैरों ने लालाजी के विरुद्ध षड्यंत्र रचा और प्राइवेट बस आपरेटरों के साथ मिलकर फिर से लालाजी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए। लालाजी की एक बेटी और रमेश जी की एक छोटी बहन का उन दिनों अमृतसर के एक निजी ट्रांसपोर्ट आप्रेटर, सूरज ट्रांसपोर्ट के मालिक के बेटे से प्रेम प्रसंग चल रहा ​था। लालाजी की इस बेटी के सूरज ट्रांसपोर्टर के इस बेटे को लिखे प्रेम पत्रों के इश्तेहार लालाजी के विरुद्ध पूरे पंजाब में कैरों के षड्यंत्र के तहत लगवा दिए गए। 

लालाजी और रमेश जी को इससे बहुत आघात लगा। उधर विजय उर्फ बिल्लू खुश नजर आने लगा लेकिन लालाजी और रमेश जी ने षड्यंत्र का भी मुकाबला किया और लालाजी ने अपना आदेश बनाए रखा। क्योंकि बिल्लू उर्फ विजय हर हालत में अपने पिता और बड़े भाई का बुरा ही सोचता था, उनके खिलाफ अन्दर ही अन्दर घर में भीतरघात करता रहता था। आज 89 वर्ष की आयु में भी उसकी यह आदत नहीं बदली और अब अपने भतीजे के खिलाफ लड़कों कालू और छोटू के साथ षड्यंत्र रचता रहता है।

कहां से आए यह लोग, कहां जाएंगे ये लोग!