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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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जयशंकर की खरी कूटनीति

विदेशमन्त्री श्री एस. जयशंकर ने प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आगामी सप्ताह के अन्त में राष्ट्रसंघ की साधारण सभा को किये जाने वाले सम्बोधन से पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान के कब्जे में पड़ा हुआ कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा है और  एक न एक दिन भारत इसे अपने कब्जे में लेकर ही चैन लेगा। श्री जयशंकर अत्यन्त मृदुभाषी पेशेवर कूटनीतिज्ञ हैं और उनके मुंह से निकले या कलम से लिखे किसी भी शब्द का अर्थ स्वयं में गूढ़ भेदों से परिपूर्ण माना जाता है किन्तु उनका ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ के बारे में यह बेबाक और खुला बयान भारत के वर्तमान सत्ता समूह की दृढ़ इच्छा शक्ति और  कूटनीतिक दिशा को बिना किसी लाग-लपेट के पेश करने वाला है।

 अतः पाकिस्तान के हुक्मरान कान खोलकर सुन लें कि दोनों मुल्कों के बीच असली मुद्दा अब वह कश्मीर है जिसे 1947 में आक्रमणकारी पाकिस्तान ने अपने कब्जे में नाजायज तौर पर दबाया हुआ है। श्री जयशंकर ने साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की हैसियत एक हमलावर की है जिसके कब्जे में पड़े अपने भूभाग को छुड़ाना भारत का लक्ष्य है। 1972 के बाद कश्मीर के सम्बन्ध में भारत सरकार की नीति में यह मूलभूत परिवर्तन है क्योंकि अभी तक दिल्ली में बैठी विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें कूटनीति के उस सिद्धान्त से चिपकी रही हैं जिसमें ‘चाशनी में लपेट कड़वा बादाम’ परोसा जाता है।

 वैसे जब मोदी सरकार के गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने संसद के समाप्त हुए सत्र में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को समाप्त कराने का प्रस्ताव पारित कराया था तो स्पष्ट कर दिया था कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का मतलब  पाक अधिकृत कश्मीरी इलाका भी है और अक्साई​चिन का इलाका भी है। हम कश्मीर के लिए अपनी जान दे देंगे, इसे कोई भी ताकत भारत से अलग नहीं कर सकती। जाहिर है कि जब गृहमन्त्री ने संसद में यह बात कही थी तो जम्मू-कश्मीर का मामला भारत का विशुद्ध रूप से आन्तरिक मामला ही था और किसी अन्य देश को इसके बारे में किसी भी प्रकार की नुक्ताचीनी का अधिकार नहीं दिया सकता था। 

जम्मू-कश्मीर को भारतीय शासन व्यवस्था में समूचे तौर पर समाहित करने हेतु जिन कदमों का उठाया जाना आवश्यक था वे उठाये गये हैं, इस तथ्य को भी श्री जयशंकर ने रेखांकित करते हुए कहा है कि दुनिया का कौन सा ऐसा  देश होगा जो यह नहीं चाहेगा कि उसके कानून पूरे देश के लोगों पर एक समान रूप से लागू हों? कौन देश यह नहीं चाहेगा कि उसके पड़ोस के देश से उसकी सीमाओं में आतंकवाद न फैलाया जाये ? ऐसा  कौन सा देश होगा जो यह देखते हुए भी कि उसका पड़ाेसी देश आतंकवाद की फैक्टरी बन चुका है और वह उससे बातचीत ही करता रहे ? पाकिस्तान को बातचीत करने के लिए पहले अपने साये में पल रहे आतंकवाद को मिटाना होगा। श्री जयशंकर ने पाकिस्तान की असलियत को जिस बेबाकी से उधेड़ा है, उस पर दुनिया की उन ताकतों को ध्यान देना ही होगा जो यदा-कदा धारा 370 के समाप्त हो जाने के बाद मानवीय अधिकारों को लेकर बेसुरे बोल अलापने लगती हैं।

धारा 370 के जरिये जम्मू-कश्मीर के कुछ राजनीतिज्ञों ने जिस तरह अपना सियासी कारोबार फैलाकर अलगाववाद के फिकरे कसने से भी गुरेज नहीं किया उसका सबसे बड़ा नुकसान आम कश्मीरी अवाम को ही हुआ और वह विकास की प्रबल धारा से अलग-थलग पड़ी रही। क्या यह हकीकत नहीं है कि धारा 370 के लागू रहने की वजह से ही पूर्व की सभी केन्द्र सरकारें कश्मीर की समस्या को लगातार उलझते और पेचीदा होते देखती रहीं और अलगाववादी ताकतें इस राज्य में इस हद तक पनप गईं कि उनके सरपरस्त खुद को भारतीय नागरिक कहने के बजाय ‘कश्मीरी नागरिक’ इस तरह कहते थे जैसे यह कोई अलग देश हो जबकि जम्मू-कश्मीर का संविधान भी रियासत के प्रत्येक वाशिन्दे को भारतीय नागरिक ही मानता था। अतः इस धारा की उपयोगिता भारत के खिलाफ ही होने लगी थी और हर बात पर यह जुमला कह दिया जाता था कि जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है। 

आखिरकार असली समस्या तो वह धारा 370 ही थी जो इस राज्य में अलगावादियों को हौंसले बख्श रही थी और इसका फायदा पाकिस्तान की आतंकवादी तंजीमें भी उठा रही थीं। इसीलिए पाकिस्तान के वजीरे आजम इमरान खान इतने फड़फड़ा रहे हैं और लगातार आपे से बाहर होकर ऊल-जुलूल बयान दे रहे हैं। अतः विदेशमन्त्री जयशंकर ने जो आइना पाकिस्तान को दिखाया है उसमें अपना चेहरा देखकर कहीं वह गश खाकर न गिर पड़े? मगर इतना साफ है कि अब पाकिस्तान के बचकर निकलने के सभी दरवाजे और खिड़कियां बन्द हो चुके हैं। पाकिस्तान  हिन्दोस्तान से रंजिश की तमन्ना में जिस तरह दर-दर ठोकरें खाता फिर रहा है, अगर वह अपनी चौखट को ही निगाह भरकर देख लेता तो उसके दिल का मैल धुल जाता।