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संपादकीय

जेटली : राजनीति का ध्रुव चला गया

श्री अरुण जेटली के निधन से स्वतन्त्रता के बाद पैदा हुई राजनीतिज्ञों की पीढ़ी का वह ‘ध्रुव तारा’ विलुप्त हो गया है जिसने नये दौर के भारत में सैकड़ों नक्षत्रोंं को अपने प्रकाश से दीप्तमान रखा। संभवतः जेटली ऐसे एकमात्र राजनीतिज्ञ कहे जा सकते हैं जो भारतीय जनता पार्टी के ज्ञानमार्गी प्रणेता थे और हर राजनैतिक चुनौती का मुकाबला इसी रास्ते से निकाल कर अपनी पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं के हाथ में धारदार हथियार पकड़ा देते थे। राष्ट्रवादी सोच के भीतर जनतांत्रिक मूल्यों के उदार विस्तार के संयोजन को जनमूलक सोच से अभिमन्त्रित करके प्रस्तुत करने की प्रतिभा उनमें विलक्षण थी और इसका प्रदर्शन वह संसद से लेकर विभिन्न जनसभाओं में पूरे शास्त्रीय अन्दाज सेे किया करते थे। 

संसद में दुरूह विषयों को सरलता के साथ प्रस्तुत करने में उन्हें विशेष महारथ हांसिल था और तक्नीकी मुद्दों का जवाब उसी तर्ज से तक्नीकी शब्दावली में देना भी उनका विशिष्ट गुण था। उनके निधन से भारत ने एक महान ‘संसदविद्’ खो दिया है जिसकी भरपाई होना आसान नहीं कहा जा सकता। संसद में दिये गये उनके वक्तव्य इसकी ग्रन्थशाला की अमूल्य थाती हैं जिन्हें आने वाली पीढि़यां पढ़-पढ़ कर प्रेरणा लेती रहेंगी। विशेषकर राष्ट्रवादी सोच के लोगों को उनके भाषणों से अपने विचारों में परिपूर्णता लाने में मदद मिलेगी। असाध्य से असाध्य कार्य को सिद्ध करने की उनकी कला तब प्रकट हुई जब उन्होंने देश के वित्तमन्त्री के तौर पर माल व सेवाकर (जीएसटी) को लागू करने की प्रक्रिया को अंजाम दिया। विभिन्न गैर भाजपाई राज्य सरकारों का इस मुद्दे पर समर्थन हासिल किया। 

मगर इसे लागू करना आसान काम नहीं था। श्री जेटली जानते थे कि यह प्रयोग करने पर विभिन्न अड़चनें आयेंगी और उन्हें कटु आलोचना का शिकार भी बनना पड़ेगा। इसमें उनकी छवि के धूमिल होने का सबसे बड़ा खतरा था परन्तु उन्हें अपने ऊपर विश्वास था कि अन्ततः इसका लाभ देशवासियों को अवश्य मिलेगा और व्यापार व वाणिज्य जगत में इसकी मार्फत सरलता आयेगी। जब उनकी बार-बार जीएसटी नियमों में सुधार करने के लिए आलोचना हुई तो उन्होंने केवल एक बात कही कि सही काम करने के लिए जितने भी संशोधन किये जायें उन्हें करने से पीछे नहीं हटा जाना चाहिए वरना कभी कोई नया काम हो ही नहीं सकता। संविधान के महान ज्ञाता और समीक्षक अरुण जेटली समय-समय पर जरूरी संशोधनों को करने से कभी नहीं घबराये मगर साथ ही साथ इसमें दिये गये मानवाधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता के भी महान योद्धा रहे। इस मामले में वह बहुत सावधानी के साथ अपने विचार रखते थे और राष्ट्रवाद की पोषक विचारधारा के समानान्तर उसकी पुष्टि भी करते हुए चलते थे। 

यही वजह थी कि उनके मित्र धुर विरोधी मार्क्सवादी पार्टी तक में थे और कांग्रेस के बारे मे‘ तो कहना ही क्या। वह केवल वैचारिक विरोध की राजनीति करते थे औऱ व्यक्तिगत जीवन में उनकी मित्रता सभी से थी। इसका प्रमाण यह है कि इमरजेंसी के बाद मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार के दौरान जनता पार्टी के अध्यक्ष स्व. चन्द्रशेखर थे। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता स्व. मधु लिमये ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का मसला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर उठाया था। जनता पार्टी में समाहित जनसंघ के सदस्यों के बारे में ही यह विषय था। उस समय श्री जेटली युवा थे और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के नेता के रूप में इमरजेंसी में जेल काट कर आये थे। श्री लालकृष्ण अडवानी तब उन्हें जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनवाने की जिद पर अड़ गये थे। श्री जेटली की प्रतिभा का संज्ञान तभी उनकी पार्टी के नेताओं ने ले लिया था। दोहरी सदस्यता का मुद्दा श्री जेटली से भी जाकर जुड़ गया और बाद में बहुत तूल पकड़ता चला गया मगर तभी जनता सरकार स्व. चरण सिंह के विद्रोह की वजह से गिर गई और जनता पार्टी का विघटन पुन: विभिन्न घटक दलों में हो गया। 

जनसंघ के भाजपा रूपान्तरण के साथ ही श्री जेटली को इस पार्टी का बहुमूल्य रत्न समझा गया और बाद में 90 के दशक में राज्यसभा में पहुंच कर उन्होंने अपनी पार्टी के विचारपक्ष को समय-काल- परिस्थिति के अनुरूप ढालते हुए आधुनिक बनाये रखा। संसद पहुंचने पर स्व. चन्द्रशेखर ने उन्हें गले से लगा कर उनकी प्रतिभा को खूब सराहा। राज्यसभा में विपक्ष के नेता का पद जब श्री जेटली को मिला तो उन्होंने तुरन्त ऐलान किया कि वह एक वकील के तौर पर अब अपना काम नहीं करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के वकील के रूप में उनकी प्रतिष्ठा असाधरण थी और उनकी आय का साधन भी यही था परन्तु इससे पहले वह सबसे ज्यादा आयकर कटवाने वाले वकील भी रहे और एेसे वकील रहे जो अपने कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों को अपने पैतृक निवास के मकान की मरम्मत कराने के लिए बिना किसी ब्याज के ऋण देते थे। 

यह उनका मानवीय पक्ष था जो बताता था कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों में उनका गहरा विश्वास था। वह अपने माता–पिता को साथ रखने वाले कर्मचारियों के लिए भी विशेष मदद दिया करते थे। बेशक चुनावी राजनीति में उनका हाथ थोड़ा कसा हुआ कहा जा सकता है क्योंकि 2014 में उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से लड़ा और उसमें वह पराजित हो गये थे परन्तु उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हुए उन्हें श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन्त्रिमंडल में वित्त मन्त्री बनाया था जो कि उस समय एक चुनौती थी। संसदीय नियमावली और परंपराओं के माहिर स्व. जेटली ने अपनी सरकार को न जाने कितनी बार मुसीबत से बाहर निकाला। इससे पूर्व वह जब वाजपेयी सरकार में मन्त्री बने थे तो उनके इस गुण का पता चल चुका था। उनके निधन से भारत माता का प्रतिभावान सुयोग्य सपूत हमारे बीच से उठ गया। राजनीति में उनका योगदान हमेशा याद रखा जायेगा। सचमुच अरुण जेटली के निधन से मैंने एक दोस्त खोया। मेरी पत्नी किरण ने भाई खोया और मेरे बेटों आदित्य, अर्जुन और आकाश ने अपने एक मामा को खो दिया।