तूतीकोरिन में ‘जलियांवाला बाग’


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आजाद भारत के इतिहास में तमिलनाडु के समुद्री बन्दरगाह के नामी शहर ‘तूतीकोरिन’ के आसपास के इलाके के अहिंसक प्रदर्शनकारी लोगों को पुलिस ने जिस तरह निशाना बनाकर मौत के घाट उतारा है उसकी तुलना सिर्फ गुलाम भारत में पंजाब के अमृतसर शहर में हुए ‘जलियांवाला बाग हत्याकांड’ से की जा सकती है। एक पुलिस अफसर ने बस के ऊपर बैठकर जिस तरह प्रदर्शनकारियों को बन्दूक से निशाना बनाया उससे यही पता चलता है कि राज्य की अन्नाद्रमुक सरकार एेसे दरिन्दों के कब्जे में है जिनके लिए आम आदमी का खून हुकूमत का रुआब गालिब करने की शर्त बन चुका है।

लोकतन्त्र में एेसी सरकारें अन्त में उन्हीं लोगों के पैरों की ठोकरों में धक्के खाती हैं जिनका खून बहाने की जुर्रत की गई थी। यह पूरे भारत के लोगों के सामने एेसी नजीर है जिसमें सरकार के कातिल होने के पुख्ता सबूत मिल रहे हैं। इसलिए तूतीकोरिन को कत्लगाह बनाने वाली तमिलनाडु सरकार को एक क्षण भी सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है। यह सरेआम संविधान के शासन की समाप्ति है जिसका संज्ञान चेन्नई में बैठे राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को लेना ही होगा। तूतीकोरिन में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज के ताम्बा उत्पादन से पैदा हो रहे जल प्रदूषण के खिलाफ इस इलाके के लोग सरकार से अपनी जिन्दगी की हिफाजत किए जाने की मांग कर रहे थे और पिछले एक सौ दिन से उनका यह आन्दोलन शान्तिपूर्ण तरीके से चल रहा था मगर राज्य की ईवीएस पल्लानीसामी सरकार कानों में तेल डाले बैठी थी और समझ रही थी कि ये भूखे-नंगे लोग खुद ही परेशान होकर थक कर अपने-अपने घरों को वापस चले जाएंगे मगर जुल्म की इन्तेहा के भी सिर से गुजर जाने के बाद जब इन्हीं लोगों ने जिलाधीश के दफ्तर जाकर अपना संगठित विरोध प्रदर्शन करना चाहा तो उन्हें रास्ते में ही पुलिस की गोलियों से भुनवा दिया गया जिससे 13 लोग मौत के आगोश में चले गए और सैकड़ों जख्मी हो गए।

यह सब पुलिस ने इसकी आड़ मेें किया कि प्रदर्शनकारियों के हिंसक होने का डर था। जरा दिमाग पर जोर डालिये और सोचिये कि जो लोग पिछले एक सौ दिन से लगातार पूरे अहिंसक तरीके से शान्तिपूर्ण ढंग से अपनी बात सरकार के कानों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी तो आखिरकार क्या उन्हें जिलाधीश के पास जाकर अपना दुखड़ा सुनाने तक का अधिकार भी नहीं था? बजाय इसके कि सरकार उनके पास खुद चलकर आती उसने उन्हें गोलियों से भून डाला। राज्य के मुख्यमंत्री भूल गए कि अंग्रेजों का राज 1947 में ही खत्म हो चुका है और अब इस मुल्क के हर सूबे में लोगों द्वारा चुनी गई सरकार ही हुकूमत में बैठती है और तमिलनाडु में तो एेसी ‘बेनंग-ओ-नाम’ सरकार बैठी हुई है जो पूरी बेशर्मी के साथ ऐसी कम्पनी को अपना संरक्षण दे रही है जिस पर उन्हीं लोगों को तिल-तिल कर मारने का आरोप है जिन्होंने सुश्री जयललिता के जीवित रहते अपना वोट देकर उसे सत्ता में बिठाया था।

मैं इस विवाद में फिलहाल नहीं जा रहा हूं कि न्यायालय का आदेश किस समय क्या आया बल्कि इस सवाल पर जोर दे रहा हूं कि लोकतन्त्र में चुनी हुई सरकार का पहला फर्ज क्या होता है? इसका पहला फर्ज हर नजरिये से लोगों की जान और माल की सुरक्षा करने का होता है और इसी के लिए पुलिस की कमान उसके हाथ में इस तरह भारत का संविधान देता है कि उसमें केन्द्र की सरकार भी दखलंदाजी न कर सके मगर मुख्यमन्त्री पल्लानीसामी ने समझ लिया कि वह अपनी पार्टी के दूसरे धड़े के नेता पनीरसेल्वम को अपने साथ मिलाकर तमिलनाडु के ‘ब्रिटिश मद्रास रेजीडेंसी’ के हुक्मरान हो गए हैं और अब उन्हें कोई भी हुकूमत से बेदखल नहीं कर सकता इसलिए वह ‘कम्पनी बहादुर’ के अन्दाज में हुकूमत चला सकते हैं और उसी तरह लोगों को बन्दूक की गोलियों का निशाना बनाकर करारा सबक सिखा सकते हैं जिस तरह लगभग सौ साल पहले अमृतसर में जलियांवाला बाग में अंग्रेज पुलिस कप्तान सांडर्स ने सिखाया था।

अंग्रेजों ने अपने इस पाप की माफी 90 साल गुजर जाने के बाद पूरे भारत से मांगी मगर पल्लानीसामी बजाए माफी मांगने के राज्य के विपक्षी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करके उलटी तोहमत लगाने की हिमाकत कर रहे हैं कि उन्होंने पूरे मामले को राजनीतिक रंग दिया। क्या 1919 में हुए जलियांवाला कांड के लिए भारत की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले कांग्रेस के नेता जिम्मेदार थे? स्वतन्त्र भारत में इस तरह की चंगेजी राजनीति करने वाले लोग भूल जाते हैं कि उनके कारनामों को मुल्क के 125 करोड़ लोग देख रहे हैं। कोई भी पुलिस अफसर तूतीकोरिन जैसी वहशियाना और शैतानी हरकत करने की हिम्मत नहीं कर सकता जब तक कि उसे ‘ऊपर’ से पूरा संरक्षण प्राप्त न हो।

वरना क्या कभी बस के ऊपर चढ़कर सीना तान कर निहत्थे लोगों को गोलियों से भूना जा सकता है? मगर क्या कयामत है कि प. बंगाल के पंचायत चुनावों में हुई हिंसा पर तो हमारा खून खौलने लगता है और हम फतवे जारी करने लगते हैं मगर सरेआम सरकार द्वारा खुद अपने ही पुलिस के कारिन्दों से लोगों का कत्ल कराये जाते देखकर हमारा खून ठंडा पड़ जाता है? क्या खून को भी सियासी पार्टियों में बांट देने की कसम हम खाकर बैठ गए हैं? इसलिए जरूरी है कि केन्द्र सरकार भी तमिलनाडु के राज्यपाल से पूरी रिपोर्ट तलब करे और पूछे कि क्या राज्य में संविधान के अनुसार काम हो रहा है? गृहमन्त्री राजनाथ सिंह ने इस बाबत पहल की है, देखिये क्या नतीजा निकलता है?