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करतारपुर साहिब यात्रियों से ‘जजिया’

पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब उपमार्ग (कारीडोर) के रास्ते सीमा पार स्थित दरबार साहिब गुरुद्वारे में जाने वाले भारतीय सिख व हिन्दू श्रद्धालुओं पर 20 डालर प्रति व्यक्ति का जो सेवा शुल्क लगाने की शर्त रखी है उसका भारत में कड़ा विरोध हो रहा है। 21वीं सदी के इस दौर में पाकिस्तानी हुकूमत का यह फैसला धार्मिक यात्रा पर ‘जजिया’ कर लगाने जैसा ही है। मध्य युगीन भारत में 16वीं शताब्दी में कट्टरपंथी मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं की धार्मिक स्थलों की यात्रा पर जजिया नाम से कर लगाया था।

जिसे मुगल बादशाह अकबर ने अपने शासनकाल में समाप्त कर दिया था, परन्तु पाकिस्तान की मौजूदा सरकार जिस तरह करतारपुर साहिब कारीडोर पर भारत के साथ समझौता करने की राह पर बढ़ना चाहती है वह मानवीय मूल्यों के विरुद्ध है। पाकिस्तान को मालूम होना चाहिए कि दोनों देशों के बीच एक-दूसरे के अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा करने का समझौता 1947 में पाकिस्तान निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही 1950 में ‘नेहरू-लियाकत समझौते’ की शक्ल में हो गया था। 

करतारपुर साहिब कारीडोर निर्माण का फैसला बेशक इमरान खान के हुकूमत में आने के बाद हुआ है परन्तु इसके ‘धागे’ 1950 के समझौते से ही निकलते हैं। अतः भारतीय नागरिकों से करतारपुर कारीडोर के रास्ते गुरुद्वारे जाने पर सेवा शुल्क वसूलना पाकिस्तानी सरकार का वह चेहरा है जिसमें धर्म को भी कमाई का साधन बनाने की ललक छिपी हुई है। इस कारीडोर का निर्माण दोनों देश मिलकर कर रहे हैं। भारतीय हिस्से के कारीडोर का नि​र्माण भारत कर रहा है और पाकिस्तानी हिस्से का निर्णाण वहां की सरकार कर रही है। इसलिए कर लगाकर ‘जजिया’ वसूलने का अधिकार पाकिस्तान को किस तरह मिल सकता है। 

आगामी 12 नवम्बर को गुरुपर्व (देव दीपावली) पर गुरु नानक देव जी महाराज का 550वां जन्म दिवस है, जिस दिन से यह कारीडोर भारतीय यात्रियों के लिए खुलेगा। इस बारे में दोनों देशों की सरकारों के मध्य औपचारिक समझौता होना है जिस पर दस्तखत करने के लिए भारत सरकार तैयार है। समझौते की विभिन्न शर्तें तय करते समय ही भारत ने कह दिया था कि वह कारीडोर का प्रयोग करने वाले श्रद्धालुओं से किसी भी प्रकार का सेवा शुल्क वसूलने के पक्ष में नहीं है, परन्तु पाकिस्तान की सरकार ने समझौते पर दस्तखत की तारीख तय होने के बावजूद फिर से अड़ंगा लगा दिया है कि वह यह फीस वसूलना चाहती है। 

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की सरकार भारतीय सेनाओं द्वारा इसी सोमवार को पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादियों के तीन शिविर नेस्तनाबूद करने की कार्रवाई से झुंझलाहट में है और रंग में भंग डालना चाहती है। इस्लामाबाद का यह कहना कि फिलहाल 20 डालर प्रति व्यक्ति प्रति फेरा शुल्क लागू कर दिया जाये जिसमें बाद में भारत की सरकार संशोधन कर सकती है, बताता है कि पाकिस्तान की सरकार भी स्वयं इस शुल्क के जायजपन पर दुविधा में है मगर केवल भारत से रंजिश निकालने के लिए यह शर्त रख रही है। ऐसा करके पाकिस्तान स्वयं को और अधिक अकेलेपन में धकेल रहा है जिसका समर्थन कोई इस्लामी मुल्क भी नहीं कर सकता है। 

करतारपुर साहिब कारीडोर दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी सौहार्द व प्रेम बढ़ाने का कारगर जरिया हो सकता है क्योंकि पाकिस्तान का न अपना  कोई इतिहास है और न संस्कृति। पूरा पाकिस्तान भारतीय उपमहाद्वीप की उस सांस्कृतिक  धरोहर के अवशेषों से लबरेज है जिसे बहुयुग्मी या सांझा अथवा बहुरंगी (कम्पोजिट कल्चर) संस्कृति कहा जाता है। पाकिस्तान के हुक्मरानों को अपने ही देश की उस रवायत का भी ध्यान रखना चाहिए जिसे बलूचिस्तान के ‘दादी की हज’ के नाम से पुकारते हैं। बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज देवी के मन्दिर में इस राज्य के गैर हिन्दू वर्ष में एक बार सिर नवाने जाते हैं और इसे दादी की हज के नाम से नवाजते हैं। 

पाकिस्तान का दोमुहांपन इसी तथ्य से प्रकट हो जाता है कि एक तरफ तो वह अपनी सरहदों में स्थित सिखों के पवित्र तीर्थ स्थलों को उनके दर्शनार्थ खोलने के लिए आवश्यक सुविधाओं के निर्माण का भारत से समझौता करता है और दूसरी तरफ उन पर सेवा शुल्क के नाम पर ‘जजिया’ लगाने की वकालत भी करता है। जाहिर है कि भारत से करतारपुर कारीडोर से जाने वाले भारतीय यात्रियों को कुछ ऐसी शर्तों का पालन करना होगा जिससे उनकी आवाजाही का नियमन हो सके। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान की नीयत का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए दोनों देशों के विदेश मन्त्रालयों ने इस बारे में जरूरी नियम तन्त्र तैयार किया होगा जिस पर दोनों देशों की सहमति के बाद ही यात्रा शुरू हो सकेगी। 

भारत प्रारम्भ से ही पाकिस्तानी अधिकारियों को साफ कर चुका है कि वह श्रद्धालुओं से किसी भी प्रकार का सेवा शुल्क वसूलने को गैर वाजिब और इंसानी उसूलों के खिलाफ मानता है तो पाकिस्तान बार-बार इस पर इसरार क्यों कर रहा है ? कश्मीर में धारा 370 को समाप्त किये जाने के फैसले के बाद पाकिस्तान जिस तरह बौखला रहा है, संभवतः जजिया वसूलने की जिद भी उसी का हिस्सा है। गौर से देखा जाये तो पाकिस्तान ने दोनों देशों की सीमाओं के निकट बसे दरबार साहिब गुरुद्वारे तक कारीडोर बनाने में सहयोग करके किसी प्रकार का अहसान नहीं किया है बल्कि भारतीय सिखों व महान गुरुओं के उपदेशों पर विश्वास रखने वाले लोगों का यह हक था। हक पर भी टैक्स वसूलने की कारगुजारी को सिर्फ बदनीयती ही कहेंगे, इसके अलावा और कुछ नहीं। अपने धार्मिक स्थलों के दर्शन करने वाले लोगों से किसी भी मुल्क की सरकार किस तरह ‘टोल’ वसूल कर सकती है। भला इस जजिया वसूली से क्या बदहाल पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था सुधर जायेगी?