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हिजाब पर जेहादी मानसिकता

हिजाब मुद्दे पर फैसला देने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों को ‘मुस्लिम जेहादी मानसिकता’ वाले कुछ इस्लामी कट्टरपंथी जिस तरह धमकियां देने की हिमाकत कर रहे हैं उन पर इस तरह लगाम कसे जाने की जरूरत है कि पंथ या धर्मनिरपेक्ष भारत में कोई भी व्यक्ति संविधान की सत्ता पर अपने मजहब की रवायतों को लादने की जुर्रत न कर सके। भारत की न्याय प्रणाली दुनिया की ऐसी  न्याय प्रणाली है जिसके समक्ष केवल संविधान का शासन लागू करने का ध्येय ही आजादी के बाद से रहा है और इस क्रम में उसके आगे कभी भी किसी व्यक्ति का मजहब आड़े नहीं आया है। भारत के हर मुसलमान को सबसे पहले यह समझना होगा कि इस देश की अदालतों की केवल एक ही किताब है जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। यह संविधान प्रत्येक नागरिक को मजहब की आजादी तो देता है परन्तु ‘लोक व्यवस्था’ या समाज में ‘बद अमनी’ फैलाने की छूट के साथ नहीं।

किसी भी शिक्षण संस्थान में मात्र इस वजह से विद्यार्थियों में भेदभाव पैदा नहीं किया जा सकता कि उनके पंथ अलग-अलग हैं। मगर बहुत बेशर्मी के साथ कुछ मुस्लिम उलेमा और कथित उदारवादी चिन्तक कहे जाने वाले लोग सिख विद्यार्थियों का उदाहरण देकर मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब पहनने की पैरवी कर रहे हैं। इन ‘अक्ल के बादशाहों’ को यह पता होना चाहिए कि ‘सिख’ उसे ही कहते हैं जो केश धारी हो और सिर पर पगड़ी पहनता हो। पंजाब से लेकर भारत भर के पंजाबी मूल के हिन्दुओं में यह परंपरा आज भी जारी है कि बहुत से ‘मां- बाप’ निःसन्तान रहने पर गुरुद्वारों में जाकर यह मन्नत मांगते हैं कि वे अपने पहले पुत्र को ‘सिख’ बनायेंगे। अतः सिख पहचान ही ‘वेशभूषा’ परक है जो सिख मत की मूल मांग होती है परन्तु मुस्लिम उलेमाओं ने जिस तरह भारतीय मुसलमानों की जहनियत में अलगाव भरने के लिए जिन इस्लामी तरीकों का इस्तेमाल किया उसका उद्देश्य उनके जहन में अलग राष्ट्रीयता का जहर भरना था जिसका परिणाम हमने 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के रूप में देखा। इस काम में भारत को दो हिस्साें में बांटने वाले मुहम्मद अली जिन्ना ने मुल्ला-मौलवियों का जमकर उपयोग किया और मुसलमानों के जहन में भर दिया कि उनका उस भारत की भूमि से कोई लेना-देना नहीं है जिसकी मिट्टी में खेल कर वे बड़े हुए हैं और जिसकी संस्कृति में बढ़ कर उनकी जिन्दगी में वह रवानी आयी है कि वे जीवन के हर क्षेत्र में ‘भारतीय’ या ‘हिन्दी’ कहलाये हैं। मगर भारत में जिस तरह मुस्लिम कट्टरपंथी मुल्ला ब्रिगेड आम मुसलमान को मजहब के उलझावे में रख कर पूरी कौम को पिछड़ा बनाये रख कर सातवीं सदी में जीने की तालीम देते रहते हैं उससे आम मुसलमान अपने मूल नागरिक अधिकारों को स्वयं ही इन मुल्ला-मौलवियों के आगे ‘रहन’ रखने को मजबूर होता रहा है और इसका सबसे बड़ा खामियाजा मुस्लिम औरतों को ही भुगतना पड़ा है।

भारत के मुसलमानों के साथ यह षड्यन्त्र 19वीं सदी से ही चल रहा है वरना यह वही भारत है जब 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेज ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ से बगावत करने वाले तमाम हिन्दू राजाओं ने तत्कालीन मुगल शासक ‘बहादुर शाह जफर’ को ही अपना बादशाह घोषित किया था परन्तु यह 21वीं सदी चल रही है और मजहब की बुनियाद पर तामीर किये गये पाकिस्तान का हश्र हमारे सामने है कि किस तरह वहां ‘अहमदिया मुसलमानों’ को ही ‘काफिर’ घोषित कर दिया गया है। स्वतन्त्र भारत में यदि कुछ कट्टरपंथी पाकिस्तानी मुल्ला ब्रिगेड की मानसिकता पर आचरण करना चाहते हैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता क्योंकि इसकी बुनियाद ही मानवतावाद पर पड़ी हुई है और इसे वास्तविकता में तभी लिखा गया था जब पाकिस्तान का निर्माण भी हो चुका था।

भारतीयता से खुद को अलग दिखाने की किसी भी मजहबी मानसिकता को बढ़ावा देने की इजाजत स्वतन्त्र भारत में इसलिए नहीं दी जा सकती क्योंकि इसकी पूरी धरती पर रहने वाले सभी प्रकार और पंथों को मानने वाले लोग सबसे पहले भारतीय या हिन्दोस्तानी हैं। किसी को हिन्दू या मुसलमान बनाने का काम सरकार का नहीं है बल्कि उसका काम हर इंसान को सच्चा भारतीय नागरिक बनाने का है और इस तरह बनाने का है कि वह हर समाजी या धार्मिक मंच पर खड़ा होकर सबसे पहले यह कहे कि वह सबसे पहले भारतीय है उसके बाद हिन्दू या मुसलमान। जो लोग साम्प्रदायिकता के खिलाफ तकरीरें झाड़ते फिरते हैं मगर मुस्लिम कट्टरता और अलग पहचान की जहनियत का विरोध करने से घबराते हैं, उनसे बड़ा साम्प्रदायिक कोई और नहीं है क्योंकि वे इस कट्टरता को ‘सहनशीलता’ के छलावे से ढकना चाहते हैं। बेशक हरिद्वार जैसी हिन्दू कट्टरता का भी जबर्दस्त विरोध होना चाहिए मगर इसकी एवज में हम मुस्लिम कट्टरता पर मुंह सिलकर नहीं बैठ सकते।

यह कोई छोटी बात नहीं है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन तीनों न्यायाधीशों को कर्नाटक सरकार की तरफ से वाई श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई गई है जिससे कोई भी जेहादी उन्हें नुकसान न पहुंचा सके। मगर खुशी की बात यह भी है कि तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने ‘तमिलनाडु तौहीद जमात’  के उन दोनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया है जिन्होंने मदुरै जिले के ‘गौरी पल्लयम’ व तंजावुर शहर में हिजाब फैसला आने के दो दिन बाद विरोध सभाओं को सम्बोधित किया था और कहा था कि कर्नाटक के जजों को धनबाद अदालत के जज के उस हश्र को याद रखना चाहिए जब सुबह सैर पर जाते वक्त उसकी मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी। इस घटना को किसी भी भारतीय को कमतर करके नहीं देखना चाहिए और केवल ‘जुबानी-जमा खर्च’ नहीं समझना चाहिए बल्कि यह महसूस करना चाहिए कि तौहीद जमात के ये दोनों नेता सीधे भारत की सत्ता को चुनौती देने की जुर्रत ही नहीं कर रहे बल्कि भारत की न्यायप्रणाली को भी इस्लामी जेहादी मानसिकता से खौफ जदा करना चाहते हैं। यह सीधे-सीधे राष्ट्रद्रोह का मामला है। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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