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दलित युवक प्रिंस को न्याय !

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक प्रतिभावान दलित युवक की उच्च शिक्षा के लिए जिजीविषा यह दर्शाती है कि गांधी के भारत में सामाजिक असमानता को समाप्त करने का संवैधानिक संकल्प डा. भीमराव अम्बेडकर ने संजोया था वह आगे इस प्रकार बढ़ रहा है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय सम्पूर्ण न्याय प्रदान करने के लिए पीडि़त व्यक्ति की हर शिकायत को यथार्थ की तराजू पर तोलते हुए व्यावहारिक अड़चनों का भी संज्ञान ले रहा है। बेशक 18 वर्षीय दलित युवक प्रिंस की आईआईटी में प्रवेश के लिए जद्दोजहद 74 वर्ष पूर्व हुए आजाद भारत की यह हकीकत बता रही है कि इन वर्षों में बहुत कुछ तो नहीं बदला है मगर जो बदला है वह भी कोई छोटी उपलबिध नहीं है। प्रिंस का आईआईटी मुम्बई में दाखिला इस वजह से नहीं हो सका था कि वह इसकी फीस नियत अवधि में जमा नहीं करा पाया था मगर इसमें उसका कोई दोष नहीं था क्योंकि वह फीस जमा कराने के लिए जिस क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर रहा था उसमें कोई तकनीकी खामी आ गई थी। उसने जैसे तैसे जुगाड़ करके आवश्यक धनराशि की व्यवस्था की थी मगर जब इंटरनेट पर वह इसे परीक्षा लेने वाली संस्था के नाम जमा करने बैठा तो उसमें ‘तकनीकी दोष’ का सन्देश आने लगा। मगर प्रिंस ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी फरियाद लेकर वह प्रवेश लेने वाली संस्था के द्वार पर पहुंचा मगर वहां से उसे निराशा प्राप्त हुई तो उसने न्यायालय की शरण लेने की योजना बनाई। पहले वह बाम्बे उच्च न्यायालय गया जहां उसकी याचिका खारिज हो गई मगर उसने हिम्मत नहीं हारी और  उसने सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और वहां से उसे न्याय इस प्रकार प्राप्त हुआ कि न्यायमूर्ति डी.वाई. चन्द्रचूड व ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने आदेश दिया कि 48 घंटे के भीतर प्रिंस को आईआईटी में दाखिला दिया जाये क्योंकि वह अपनी प्रतिभा के बूते पर प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ है और दाखिला का वाजिब अधिकारी बना है। दोनों न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में लिखा है कि आईआईटी में उसे सीट न मिलना न्याय का मखौल जैसा होगा क्योंकि वह दाखिले के सभी पैमानों पर खरा उतरा है।

 हो सकता है कि यह खबर बहुत से मीडिया वालों के लिए सामान्य हो मगर इसमें बहुत बड़ा सन्देश छिपा हुआ है कि न्याय के दरवाजे हर अमीर-गरीब के लिए सदैव खुले रहते हैं। प्रिंस के परिवार को देखें तो दो पीढि़यों पहले तक उसके परिवार के लोग दूसरे बड़े किसानों के खेतों पर मजदूरी किया करते थे। उसने अपने पुरखों की कष्टों की कथाएं अपने पिता जहबीर सिंह से सुनी थी। मगर इस युवक पर शिक्षा के महत्व की कथाओं का भारी प्रभाव था और वह शुरू से ही कुशाग्र छात्र था। उसने सुन रखा था कि शिक्षा मनुष्य के दुखों को दूर करने में कारगर औजार का काम करती है। अतः हाई स्कूल व इंटरमीडियेट में वह वजीफा लेकर अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा लेकिन आईआईटी से इंजीनियर बनने की उसकी प्रबल इच्छा थी और उसने जेईई परीक्षा पास करने का निर्णय किया। पहली बार वह असफल रहा मगर इंटरमीडियेट में 95 प्रतिशत से अधिक अंकों के आधार पर उसे इलाहाबाद के मोती लाल नेहरू इंजीनियरिंग संस्थान में दाखिल मिल गया। इसके बावजूद उसने अगले वर्ष पुनः जेईई की परीक्षा दी और वह इसमें सफल रहा। अखिल भारतीय स्तर पर उसका नम्बर 2600 से ऊपर रहा मगर अनुसूचित जाति वर्ग में वह 800 से ऊपर रहा। 

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत की संवैधिक व्यवस्था में स्कूल और उच्च शिक्षा के स्तर से ही प्रतिभा का किसी भी सूरत में शोषण नहीं होना चाहिए। दूसरे शिक्षा प्राप्त करने की जो सुविधाएं संविधानतः समाज के कमजोर वर्गों को मिली हुई हैं उनका उपयोग करने के लिए  इसी समाज के लोगों खास कर नई पीढ़ी को आगे आना चाहिए। दलित या पिछड़े अथवा आदिवासी समाज की युवा पीढ़ी को शिक्षा का वह महत्व जानना होगा जो बाबा साहेब अम्बेडकर उन्हें समझा कर गये हैं। यह कोई संयोग नहीं है कि आजादी आन्दोलन में जितने भी नेता उस समय थे उन सभी में बाबा साहेब सबसे ज्यादा पढे़- लिखे और विद्वान थे जिसकी वजह से महात्मा गांधी ने उनसे ही भारत का संविधान लिखवाना उचित समझा था। ​िप्रंस की कहानी और उसके परिवार का शिक्षा प्रेम हमें यह बताता है कि शिक्षा में वह ताकत होती है कि वह सामाजिक व आर्थिक खाइयों को पाटने की क्षमता रखती है और दबे-कुचले इंसानों में आत्मविश्वास का बीजारोपण करती है। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आजाद भारत को दी गई लोकतान्त्रिक व्यवस्था राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ही सपना था जिसके लिए उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन चलाया था। 2021 के भारत को एक प्रिंस की नहीं बल्कि हजारों लाखों प्रिंस की जरूरत है जिससे सदियों से उत्पीड़न का शिकार रहे दलित समाज में आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास जागृत करके शिक्षा के बूते पर गैर बराबरी को दफन कर सकें।