कर्नाटक में चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है और अब 12 मई शनिवार को मतदान होगा। इस दिन मतदाता अपने मन की बात कहेंगे और तय करेंगे कि कौन-सी पार्टी सत्ता की हकदार बनेगी मगर इससे पहले राज्य में ‘नामदार और ईमानदार’ की बहस छिड़ गई है। पूरे चुनाव प्रचार के अन्तिम दिन इस मुद्दे का उछलना इस मायने में सन्तोषजनक है कि कम से कम राजनीति ने उस तरफ तो देखने की कोशिश की जिसका कर्नाटक की जनता के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो सकता है वरना अभी तक पूरे चुनावी घमासान में एेसे बे सिर-पैर के मुद्दे उछल रहे थे जिनका न तो राज्य की सरकार से कोई लेना-देना था न ही प्रशासन की शुचिता या स्वच्छता से।

कांग्रेस नेता श्री राहुल गांधी को प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नामदार बताते हुए खुद को कामदार बताया था। गांधी नेहरू परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने वाले राहुल गांधी को इस उपाधि से विभूषित करते हुए प्रधानमंत्री ने यही संकेत दिया था कि वह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से ही राजनीति के शिखर पर विराजे हैं। यह सत्य भी है जिसे स्वयं राहुल गांधी भी स्वीकार कर चुके हैं। उन्हें लेकर भाजपा अक्सर वंशवाद की राजनीति को पनपाने का आरोप लगाती रही है मगर निःसन्देह यह कांग्रेस पार्टी का अन्दरूनी मामला है जिससे भाजपा का कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। दूसरी तरफ श्री राहुल गांधी ने श्री मोदी के इस कटाक्ष का उत्तर यह कहकर दिया है कि उनके साथ ईमानदार लोग हैं क्योंकि भाजपा उन बी.एस. येदियुरप्पा को कर्नाटक का अगला मुख्यमन्त्री बनाने के लिए चुनाव लड़ रही है जो राज्य के शासन का मुखिया रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल तक गये थे।

यह भी अपनी जगह सत्य है क्योंकि ​ये​िदयुरप्पा एेसे मुख्यमंत्री रहे जिन पर भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लग गई थी मगर भाजपा ने येिदयुरप्पा के दागदार चेहरे को साफ दिखाने के लिए कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री श्री सिद्धारमैया की कलाई में बन्धी लाखों रु. की घड़ी से बराबर करना चाहा और इसे चुनावी मुद्दा बनाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। इसके साथ ही श्री सिद्धारमैया की सरकार को 10 प्रतिशत कमीशन की सरकार के उपनाम से भी नवाजा गया जिसे लेकर सिद्धारमैया ने कानूनी नोटिस भी दे दिया है।

इसके साथ ही उनकी सरकार को ‘सीधा रुपैया’ सरकार के नाम से भी नवाजा गया। पूरे चुनाव प्रचार में हमें व्यक्तिगत छींटाकशी के वे नजारे देखने को मिले जिनका कर्नाटक के विकास या इसके लोगों के उत्थान से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। इसी बीच यह मुद्दा भी उछल गया कि श्री राहुल गांधी 2019 में प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। सवाल यह है कि जब राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी ने अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है तो वह अपनी पार्टी की तरफ से अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के संभावित परिणामों का आकलन अपनी दृष्टि से कर सकते हैं और इसके बाद नेतृत्व के मुद्दे पर अपने विचार भी अपने नजरिये से रख सकते हैं।

इसमें भाजपा के खफा होने का क्या तुक है। अन्त में तो देश की जनता ही तय करेगी कि देश का चुनावों के बाद राजनीतिक नक्शा क्या बनेगा और किस पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बनेगा। कर्नाटक के चुनावों से इसका क्या लेना-देना है। लोकतन्त्र में प्रधानमन्त्री बनना किसी का विशेषाधिकार किस प्रकार हो सकता है। यह विशेषाधिकार केवल देश की जनता का है जो अपने एक वोट के अधिकार का इस्तेमाल करके राजनीतिक दलों को बहुमत देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी स्वीकार करते हैं कि देश की सवा अरब जनता ही प्रधानमंत्री का फैसला करती है। अतः राहुल गांधी के नामदार होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

फर्क उनके ईमानदार होने या न होने से जरूर पड़ता है मगर कर्नाटक के चुनावों के सन्दर्भ में सिद्धारमैया के नामदार या ईमानदार होने और येदियुरप्पा के बेइमान या ईमानदार होने का ही अन्ततः फर्क पड़ेगा अतः मतदाताओं के लिए फिलहाल यही मुद्दा महत्वपूर्ण है। यदि कर्नाटक के चुनावी माहौल का आकलन किया जाए तो यह राज्य के केन्द्रीय मन्त्रियों से लेकर विभिन्न मुख्यमन्त्रियों का जमावड़ा बना रहा। जाहिर है ये सभी भाजपा की ओर से जोर आजमाइश कर रहे थे मगर इनमें से कोई भी कोई एक एेसा मुद्दा नहीं उठा पाया जिससे कर्नाटक के विकास के कार्यक्रमों का सीधा सम्बन्ध बैठ सके।

टीपू सुल्तान से लेकर मुहम्मद अली जिन्ना और वोकालिंग्गा से लेकर लिंगायत व कुरबा व दामिगा जातियों का दबदबा सुनाई देता रहा और यहां के धर्म गुरुओं की चर्चा होती रही मगर बेरोजगारी के मुद्दे पर राजनीतिज्ञ जुबान सिले रहे। राज्य के खनन माफिया की दादागिरी हमें चुनावी जलसों तक में देखने को मिली, ये साधू बने हुए जनता की पीड़ा हरने के वादे करते सुनाई पड़े। सवाल तो यह है कि राजनीति में ईमानदारी को किस खूंटी पर टांग कर मनसबदारी बांटी जा रही है। आपराधिक छवि के प्रत्याशियों की न भाजपा में कमी है और न कांग्रेस में मगर एेसे लोगों को राजनीति वैधता प्रदान करने के लिए शीर्षासन करती दिखाई पड़ रही है।

यह लोकतन्त्र के लोकपक्ष पर पक्षाघात से कम करके नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दलों के एेसे कारनामों से ही देश की युवा पीढ़ी राजनीतिज्ञों को फरेबियों का जमघट मानने को मजबूर हो रही है। लोकतन्त्र में राजनीतिज्ञों के प्रति सम्मान और सद्भावना जरूरी शर्त होती है। यह काम राजनैतिक दलों का ही होता है कि वे हर दृष्टि से ईमानदार लोगों का चुनाव करके उन्हें जनता के सामने उनका वोट लेने के लिये आगे करें मगर यहां तो उल्टी गंगा बहाई जा रही है और लोगों से कहा जा रहा है कि वे काली अंधेरी रात को कहें कि क्या खूबसूरत सुबह है।

खुदाया खैर करे मेरे गांधी के उस भारत की जिसने कहा था कि राजनीति में केवल वे ही लोग आयें जिन्हें अपनी नहीं बल्कि सबसे गरीब आदमी की परवाह हो। अपने मुँह में निवाला डालने से पहले वे उस आदमी के बारे में सोचें जिसे भूखे पेट ही सोना पड़ रहा है ।