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संपादकीय

​विषधरों की असलियत समझें कश्मीरी

अब यह बात किसी से छिपी हुई नहीं रही कि जम्मू-कश्मीर की तथाकथित कुलजमाती हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और इसके झंडे तले जितनी भी तंजीमें काम कर रही हैं, वह सारी की सारी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों में लिप्त हैं। जिन राष्ट्र विरोधियों, षड्यंत्रकारियों ने कश्मीर में पैसों से राज भोगा है, उनकी असलियत सामने आ रही है। देश की जनता के सामने उनका असली रूप लाया ही जाना चाहिए था। जो कुछ भी सामने आ रहा है उसे देखकर तो लगता है कि घाटी में नेता कहलवाए जाने वाले ही सबसे बड़े विषधर हैं।
_ घाटी को शर्मनाक स्थिति में पहुंचाने वाले यही विषधर हैं।
_ इन्होंने ही भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाई है।
_ भारत की एकता को विखंडित करने की साजिशें रची हैं।

काश! पूर्व की सरकारों ने इन विषधरों के फन को कुचलने की कोशिश की होती तो घाटी में माहौल बदल सकता था। अफसोस कि पूर्व की सरकारें केवल डेमोक्रेसी-डेमोक्रेसी का खेल खेलती रहीं और विषधर जहर फैलाते रहे। कश्मीर वादी को भारत का स्वर्ग कहा जाता है। प्रकृति ने इस वादी को बर्फीले पहाड़ों से सजाया है और इसके अन्दर बस रहे लोगों को भी काफी सुन्दर बनाया है मगर इस सुन्दर वादी की फिजाओं को बिगाड़ने की योजनाबद्ध साजिशें रची जाती रहीं और आजादी की लड़ाई के नाम पर युवाओं के हाथों में बंदूकें थमा दी गईं। युवाओं के हाथों में बंदूकें थमाने वाले और स्कूली बच्चों तक को दिहाड़ीदार पत्थरबाज बनाने वाले लोग अपना जीवन किस तरह बिता रहे हैं, यह शायद बहुत कम देशवासियों को पता होगा। 

हैरानी की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी कश्मीरी अवाम आज तक गुमराह हो रहा है। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने घाटी के युवाओं को मौत के मुंह में धकेला है। अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाकर उनका भविष्य तो उज्ज्वल बना रहे हैं जबकि घाटी के युुवाओं को आतंकवाद की भट्ठी में झोंक रहे हैं। ये लोग हर जुम्मे की नमाज के वक्त या फिर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर युवाओं को आतंकवाद के लिए उकसाते हैं जबकि अपने बच्चों को इस तरह की गतिविधियों से दूर रखे हुए हैं।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी अलगाववादियों की सूची से पता चलता है कि इनके बच्चे विदेशों में मजे से जिन्दगी काट रहे हैं। अनेक पढ़ रहे हैं और कई नौकरी भी कर रहे हैं लेकिन यहां ये लोग स्कूल बन्द कराते हैं। अलगाववादी नेता एस.एस. गिलानी को कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है। उनका बेटा नईम गिलानी पाकिस्तान में डाक्टर है जबकि उनकी बेटी सऊदी अरब में शिक्षक और दामाद इंजीनियर है। गिलानी की नातिन तुर्की में पत्रकार आैर दूसरी पाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है। अलगाववादी नेता आंद्रिया असाबी का पूरा परिवार ही विदेश में है। यह सूची काफी लम्बी है। कश्मीर में पिछले तीन वर्षों में 240 दिन स्कूल बन्द रहे हैं। 

अलगाववादी नेता नहीं चाहते कि कश्मीरी अवाम के बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हों। आज कश्मीरी युवक डाक्टर भी बन रहे हैं और आईएएस भी। अच्छे संगीतकार भी बन रहे हैं और अच्छे अभिनेता भी। सरकार अब जानकारी जुटा रही है कि इन नेताओं के अपने परिवारों को विदेश में भेजने, उन्हें पढ़ाने के लिए फण्ड कहां से मिल रहा है। आशंका जताई जा रही है कि कहीं इनसे हवाला की कोई कड़ी तो नहीं जुड़ी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि जब गृह मंत्रालय ने इस तरह के आंकड़ों को पेश किया है जो अलगाववादियों की पोल खोल रहे हैं। अधिकांश अलगाववादियों की पत्नियां विदेशी हैं और उन्होंने विदेशों में काफी सम्पत्ति बनाई है।

आतंकवाद भड़काने के नाम पर पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजैंसी इन नेताओं को फंडिंग करती रही हैं। इन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद को भड़काने में किया तो दूसरी तरफ उस धन को अपनी सम्पत्ति बनाकर हड़प लिया। अब शब्बीर शाह समेत कई अलगाववादी नेता जेलों में हैं और मनी लांड्रिंग की पूरी कहानी सामने आ रही है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अनेक अलगाववादी नेताओं की वीआईपी सुरक्षा छीन ली गई है। कश्मीर में सुरक्षा बलों का ऑपरेशन आल आउट भी जारी है। आतंकवाद की रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है। अब आतंकवादियों की उम्र काफी कम हो गई। अब समय आ चुका है कि देश और अपने अवाम से छल करने वाले विषधरों को अपने ही समाज के सामने नग्न किया जाए। कश्मीरी अवाम खुद उनसे पूछे कि कहां है उनकी कश्मीरियत और कहां है इन्सानियत। अमन-चैन का रास्ता ही कश्मीरी अवाम के लिए बेहतर होगा। उन्हें खुद अपने बच्चों को बचाने के लिए आगे आना होगा।