जम्मू-कश्मीर राज्य के युवा आईएएस अधिकारी शाह फैसल के सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आने के फैसले ने एक बार फिर इस राज्य की आजादी मिलने के वक्त से चली आ रही समस्या को सतह पर ला दिया है मगर इसमें फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह मसला उस शख्स ने उठाया है जिसने कश्मीर की खूबसूरत वादियों में घोले गये जहर से बेअसर रहते हुए पूरी दुनिया के सामने इस राज्य की युवा पीढ़ी के शान्ति और अमन की राह पर चलने के जज्बे को आवाज देकर सियासत की जंगी चालों को ढेर करने का ऐलान किया था मगर 2010 में पूरे मुल्क में आईएएस इम्तिहान में अव्वल आने वाले इस शख्स के सब्र का बांध भी टूट गया और उसने हारकर उसी सियासत में हाथ आजमाने का ऐलान कर दिया जिसे पटखनी देते हुए उसने अपनी तालीम के बूते पर कश्मीर का खुशनुमा चेहरा रोशन किया था।

सवाल पक्के तौर पर यही बनता है कि ऐसा फैसला उस शाह फैसल ने क्यों लिया जिसकी नजीरें देकर कश्मीर की नौजवान पीढ़ी को गलत रास्ते पर न भटकने की ताकीद की जाती थी। जाहिर है कि यह सवाल छोटा नहीं है और इसका जवाब हर हिन्दोस्तानी को अपनी छाती पर हाथ रखकर सोचना चाहिए। यह सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि लोकतन्त्र में किसी भी मसले का हल फौजी रास्तों से नहीं निकाला जा सकता है। फौज का इस्तेमाल सिर्फ नागरिक प्रशासन को फौरी तौर पर मदद के लिए उस सूरत में किया जा सकता है ज​ब​िक हालात यह मांग कर रहे हों कि अराजक तत्वों ने संविधान की रूह से काबिज हुकूमत को बेअख्तियार करने के लिए हिंसक बगावत के तेवर अख्तियार कर लिये हैं। ऐसे माहौल में फौज सिर्फ संविधान की सत्ता कायम करने के लिए ही नागरिक प्रशासन द्वारा प्रयोग में लाई जाती है और उसे इसी प्रशासन के दिये गये हुक्म के दायरे में काम करना पड़ता है।

यह काम पूरा होते ही फौज वापस अपनी बैरकों में चली जाती है मगर जम्मू-कश्मीर की सियासत ने 1989 से जिस तरह बदरंगी अख्तियार की है उसकी वजह से इस राज्य में हालात लगातार बदतर होते गये और कश्मीर की खूबसूरत वादियों में हिन्दू-मुसलमान का जहर घुलना शुरू हो गया। इस काम में पड़ौसी पाकिस्तान की शिरकत इस तरह रही कि इसने अपनी दहशतगर्दी से पूरे सूबे को ही तबाह करने के लिए ऐसी तंजीमों को तरजीह देनी शुरू कर दी जो इस राज्य की युवा पीढ़ी को भटका सकें मगर सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यह काम 1989 के लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली की कुर्सी पर वी.पी. सिंह के बैठने के बाद ही इस तरह शुरू हुआ कि फिर से कश्मीर समस्या अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बनने लगी। फर्क सिर्फ यह आया कि इस बार आतंकवाद के साये में यह काम शुरू हुआ क्योंकि वी.पी. सिंह सरकार के गृहमन्त्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी को ही कुछ आतंकवादियों ने अगवा करके बदले में अपने कुछ साथियों की रिहाई कराने में सफलता हासिल कर ली थी।

इसके बाद जब नरसिम्हा राव की सरकार गद्दी पर बैठी तो उसने इस सूबे में चलने वाली राजनैतिक प्रक्रिया को मुल्तवी करके लगातार छह साल तक राज्यपाल शासन लगाकर आम लोगों को उन ताकतों के भरोसे छोड़ दिया जो पाकिस्तान की खुली शिरकत के सबूतों के होने के बावजूद हिन्दोस्तान के खिलाफ बरगलाने में लगे हुए थे। यह काम उन कश्मीरियों की जहनियत को बदलने के लिए हो रहा था, जिन्होंने एक आवाज में खड़े होकर कहा था कि भारत से अलग करके मजहब की बुनियाद पर पाकिस्तान किसी सूरत में तामीर नहीं किया जाना चाहिए मगर क्या कयामत बरपा हो रही थी कि नरसिम्हा राव के शासनकाल में ही कश्मीर घाटी से हिन्दू पंडितों को खाली कराने की वहशी करतूत को अंजाम दे दिया गया। इसके समानान्तर नरसिम्हा राव के ही गद्दीनशीं रहते हुए अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया और इसके बाद नरसिम्हा राव सरकार ने फरमान जारी कर दिया कि देश में हर धर्म स्थान का वजूद वही रहेगा जो 15 अगस्त 1947 के दिन तक था।

कश्मीर समस्या को अलग-थलग करके देखेंगे तो ऐतिहासिक गलती करेंगे क्योंकि इसका ताल्लुक सीधे तौर पर 1989 के बाद मुल्क के बने सियासी हालात से है। बिना शक 1996 के बाद से इस राज्य में राजनैतिक प्रक्रिया शुरू हुई मगर वह पाकिस्तान द्वारा शुरू किये गये आतंकवाद के साये में ही हुई और यहां की मुकामी सियासी पार्टियां इसके बहाने एक-दूसरे से आगे निकलने की तजवीजें भी ढूंढती रहीं। इसलिये यह बेवजह नहीं है कि 1998 में जब भाजपा नीत एनडीए की वाजपेयी सरकार दिल्ली में काबिज हुई तो 1972 में शिमला समझौता होने के बाद पहली बार किसी अंतर्राष्ट्रीय मंच से दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला ने निर्गुट देशों के सम्मेलन में कश्मीर समस्या का जिक्र किया। नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के गांधी के नाम से जाने जाते थे मगर इसके बाद भी हमने कोई सबक लिया हो, इसका सबूत नहीं मिलता।

हां, यह जरूर मिलता है कि स्व. वाजपेयी ने कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद को रोकने के लिए 1999 में लाहौर तक बस यात्रा की मगर उसके बाद कारगिल युद्ध हो गया और पाकिस्तान में फिर से फौजी हुकूमत कायम हो गई और 2004 जनवरी में स्व. वाजपेयी ने फिर से लाहौर जाकर शिमला समझौते की शर्तों से पाकिस्तान को बांधते हुए यह अहद ले लिया कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ दहशतगर्दी फैलाने में नहीं होने देगा। इसके बाद मनमोहन सरकार ने जम्मू-कश्मीर में राजनैतिक प्रक्रिया को तेज किया और पाकिस्तान को बरतरफ करते हुए सूबे की राजनीतिक तंजीमों वगैरा से बातचीत चलाई मगर 2008 नवम्बर के मुम्बई के पाकिस्तानी दहशतगर्द हमले ने फिर से कश्मीर समस्या को वहीं लाकर पटक दिया जहां यह पहले थी। पूरे अर्से में सूबे के भीतर फौज की भूमिका में कोई खास बदलाव नहीं आया क्योंकि मुकामी सियासी पार्टियां पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस लगातार फौज की मौजूदगी पर भी सियासत करती रहीं।

हालांकि दोनों ही बारी-बारी से कांग्रेस पार्टी के साथ हुकूमत में रहीं और आखिर में तो भाजपा भी पीडीपी के साथ हुकूमत में आ गई मगर फौज की भूमिका में कोई परिवर्तन नहीं आया। जाहिर तौर पर यह सियासत की नाकामी का ही सबूत कहा जायेगा। अब इस सियासत को बदलने के लिए कश्मीर का एक युवक आगे आया है। पूरे देश को यह जरूर मालूम होना चाहिए कि कश्मीर की असली समस्या है क्या ? यह समस्या मूल रूप से इस राज्य की कुदरती सुन्दरता को कायम रखते हुए इस राज्य के लोगों की सांस्कृतिक पहचान की है जिसे पाकिस्तान दहशतगर्दी की मार्फत भारत के खिलाफ फिजां बनाकर नेस्तनाबूद कर देना चाहता है और कोशिश कर रहा है कि हिन्दोस्तानी फौज के माथे पर इसका जुर्म गढ़ दिया जाये। दूसरी तरफ ऐसी ताकतें भी हैं जो कश्मीर में भारत के किये गये विलय की शर्तों को बहाना बनाकर इसकी विशिष्टता को समाप्त कर देना चाहती हैं। ये लोग भूल जाते हैं कि कश्मीर भारत का ताज तभी कहलायेगा जब इसकी चमक से पूरा हिन्दोस्तान रौशन होगा।