कश्मीर : कब बहेगी मंद समीर


जम्मू-कश्मीर की 70 साल पुरानी समस्या की असली जड़ निश्चित रूप से भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू रहे हैं मगर अब देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को इसका पुख्ता हल ढूंढना चाहिए। पिछले 70 सालों में पूरी दुनिया में बहुत बदलाव आ चुका है। आपस में जंग करते हुए मुल्क मिलकर एक हो चुके हैं जिनमें वियतनाम और जर्मनी प्रमुख हैं। दूसरी तरफ सोवियत संघ जैसा देश बिखर कर 13 देशों में तब्दील हो चुका है जबकि युगोस्लाविया भी बिखर चुका है। यह इतिहास का जबर्दस्त विरोधाभास है जो आर्थिक भूमंडलीकरण के साथ प्रकट हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदली हुई दुनिया की यह अजीबोगरीब तस्वीर है जिसमें कभी आधी से ज्यादा दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन की हालत आज जर्जर हो चुकी है और पीढिय़ों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए अफ्रीकी लोग आजादी की सांसें ले रहे हैं। पूरी दुनिया में भारत के महात्मा गांधी के आदर्श और सिद्धान्त मानवीय स्वतन्त्रता के लिए प्रेरणा बने हुए हैं जबकि कम्युनिस्टों के पितामह कार्ल माक्र्स की मानवीय भौतिक द्वन्दवाद की सैद्धान्तिक विवेचना समाप्ति के कगार पर है मगर दूसरी तरफ इस नई शताब्दी की शुरूआत से एक नया मजहबी जेहाद का जहाज पूरी दुनिया को अपने जबड़ों में लेने के लिए कसमसा रहा है। यह भी कम विरोधाभास नहीं है कि एक तरफ अरब के मुस्लिम देशों में इस दौरान लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष बुलन्दियों पर पहुंचा और दूसरी तरफ इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के लिए जेहादियों की कथित लड़ाकू फौज ने जन्म लिया जिसे आईएस कहा जाता है। इस अजीबोगरीब द्वन्द में भारत ने फंसने से इन्कार किया और अपने महान लोकतन्त्र को विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत एहतियात से संजोकर रखा मगर 70 साल पहले इसी से अलग हुए पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने वक्त की बदलती नब्ज को नहीं पहचाना और वह इसके जंजाल में अपनी मजहबी हरकतों की जिद पर फंस गया जिसके नतीजे में आज यह आतंकवादी देश घोषित होने के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि इस मुल्क में लोकतान्त्रिक ताकतों को वह अख्तियार और कूव्वत कभी हासिल नहीं हो पाई जिससे वहां की अवाम की आवाज को हुकूमत बोलने की हिम्मत कर सके। इसकी असली वजह इस मुल्क की वह फिरकावाराना फौज रही जिसका मकसद सिर्फ हिन्दोस्तान के नाम पर हिन्दुओं का विरोध रहा। अपने इसी नजरिये की वजह से पाकिस्तान की फौज को दहशतगर्दों की हथियारों से लैस तंजीम के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता है। कितने दूरदर्शी थे भारतीय फौज के ब्रिगेडियर स्व. उस्मान जिन्होंने 1947 में मुहम्मद अली जिन्ना की उस पेशकश को ठोकर पर रख दिया था कि वह पाकिस्तान की फौज के जनरल बन जायें। 1947 में ही यह तय हो चुका था कि जिन अंग्रेजों की साजिश में फंस कर जिन्ना ने इस्लामी मुल्क पाकिस्तान भारत के मुसलमानों को बरगला कर बनवाया है उसका मुस्तकबिल दहशतगर्दी के अलावा और कुछ नहीं हो सकता क्योंकि इस मुल्क को वजूद में लाने के पीछे हिन्दोस्तान की सदियों से चली आ रही एकमुश्त ताकत को पामाल करने के अलावा और कुछ नहीं था। जरा गौर कीजिये पं. नेहरू जब राष्ट्र संघ में कश्मीर का मसला लेकर गये थे तो उन्होंने इस बारे में सिवाय लार्ड माऊंटबेटन से सलाह करने के अलावा अपने मन्त्रिमंडल के किसी दूसरे साथी से सलाह नहीं की थी जबकि अंग्रेजों ने भारत को आजादी पूरे देश को एक संघीय ढांचा न मानते हुए जातिगत व क्षेत्रीय समूहों के समुच्य रूप को स्वीकार करते हुए प्रदान की थी। इसकी वजह यह थी कि 1945 में जब अंग्रेजों के शासनकाल में ही प्रान्तीय असैम्बलियों के चुनाव कराये गये थे तो वे ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत सरकार कानून 1919 के तहत कराये गये थे।

यह शतरंजी चाल तब भारत के वायसराय लार्ड वेवेल ने चली थी क्योंकि इससे पूर्व जब 1936 में प्रान्तीय असैम्बलियों के चुनाव हुए थे तो वे पं. मोती लाल नेहरू द्वारा तैयार उस संवैधानिक प्रारूप के तहत चुनीन्दा मताधिकार के तहत हुए थे जिसमें सम्पूर्ण हिन्दोस्तान को एक संघीय देश स्वीकार किया गया था। यही वजह थी कि आजादी देते हुए अंग्रेजों ने भारत को दो स्वायत्तशासी स्वतन्त्र देशों ( डोमिनियन स्टेट) में बांट डाला था। जिनके भीतर इस बात की छूट थी कि जो रियासत चाहे वह अपना वजूद आजाद रख सकती है मगर पं. नेहरू ऐतिहासिक गलती कर चुके थे जिसे 1972 में शिमला समझौता करते हुए स्व. इन्दिरा गांधी ने बहुत चतुराई से ठीक किया और पाकिस्तान से लिखवा कर ले लिया कि कश्मीर समेत दोनों देशों के सभी मसले सिर्फ आपसी बातचीत से हल होंगे मगर 1998 में भारत के बाद पाकिस्तान द्वारा भी परमाणु परीक्षण करने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति पूरी तरह बदल गई और पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम उसी तरह आ गया जिस तरह बन्दर के हाथ में आइना। इसकी आड़ में पाकिस्तान ने कश्मीर को फिर से अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाना शुरू कर दिया और दहशतगर्दों की हिमायती उसकी फौज ने 1999 में कारगिल में जंग छेड़कर इसका बाकायदा आगाज किया। इसके बाद से ही कश्मीर को आतंकी ठिकाना बनाने की साजिशें शुरू हुईं और अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबानी ताकतों ने इसे अपने फंदे में लेने की कोशिशें शुरू कीं और उस घाटी में मजहबी तास्सुब के जरिये जहर भरना शुरू किया जहां कभी शंकराचार्य के मन्दिर और पीर-औलियाओं की मजारों से अमन की पुर सुकून हवाएं चला करती थीं। आज मंजर यह है कि जम्मू-कश्मीर के छह पुलिसकर्मियों की हत्या दर्दनाक तरीके से रमजान के महीने में ही कर दी जाती है। इस वहशत का कुछ तो इलाज होना चाहिए?

”हो गई है ‘पीर’ पर्वत सी ‘पिघलनी’ चाहिए
इस हिमालय से कोई ‘गंगा’ निकलनी चाहिए।”