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केरल सरकार की ‘बदगुमानी’

आज ईद के उपलक्ष्य में मैं सभी पाठकों को मुबारकबाद देता हूं और खुदा से दुआ मांगता हूं कि वह पूरे मुल्क को नई ताकत बख्शे। भारत के संविधान में जिस धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था की स्थापना की गई है उसमें धर्म या मजहब को मानने की प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्तर पर छूट दी गई है। इसका अर्थ यही निकलता है कि स्वतन्त्र भारत में धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है अर्थात निजी स्तर पर उसे अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने और उसका प्रचार-प्रसार करने की छूट है परन्तु इसका मतलब यह भी निकलता है कि धर्म के नाम पर वह समाज के दूसरे नागरिकों की जीवन पद्धति को प्रभावित नहीं कर सकता है और संविधान प्रदत्त प्रत्येक नागरिक के जीवन जीने के अधिकार को धर्म के दायरे में नहीं ला सकता है। परन्तु केरल की सरकार ने बकरीद के अवसर पर राज्य में कोरोना नियमावली में तीन दिन की छूट देकर सामान्य नागरिकों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने की धृष्टता की जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि यदि इस वजह से कोई भी दुष्परिणाम आते हैं तो तो वह कड़ी कार्रवाई करेगा क्योंकि जीवन की सुरक्षा सर्वप्रथम आती है और इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने बकरीद के दौरान राज्य सरकार को उसके उन निर्देशों का ध्यान रखना चाहिए जो उसने उत्तर प्रदेश में कावड़ यात्रा के सन्दर्भ में दिये थे। 

सर्वोच्च न्यायालय ने कोरोना संक्रण को देखते हुए कांवड़ यात्रा को रद्द करने के निर्देश दिये थे और साफ कहा था कि धार्मिक रीतियां जीवन की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकतीं। बहुत साफ है कि जब मनुष्य जिन्दा रहेगा तभी वह अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन कर सकेगा अतः सबसे पहले उसकी जिन्दगी की खैर मांगी जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि केरल सरकार ने कुछ समूहों के दबाव में आकर एेसा फैसला किया जिसके दुष्परिणाम राज्य के समस्त समाज को भुगतने पड़ सकते हैं। यहां सरकार पर दबाव बनाने वाले समूहों का विशेष महत्व है। केरल में यह फैसला यहां के मुख्यमन्त्री पी. विजयन ने मुस्लिम समाज के लोगों की फौरी प्रसन्नता अर्जित करने के लिए किया जबकि उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा निकालने की अनुमति देकर मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ हिन्दू समाज को खुश करना चाहते थे। दोनों ही मामलों में उन्हीं लोगों का जीवन खतरे में डाला गया जिन्हें खुश करने का ‘जतन’ किया गया। अतः बहुत स्पष्ट है कि राजनीतिज्ञ जब अपने स्वार्थ में अन्धे होकर फैसले करते हैं तो उन्हीं लोगों के जीवन की बलि चढ़ाने से नहीं हिचकते जो उनकी राजनीति चमकाते हैं। बकरीद का त्यौहार अकेले केरल राज्य में नहीं होगा बल्कि भारत के लगभग हर राज्य होगा और उनमें रहने वाले मुस्लिम नागरिक उसे मनायेंगे। मगर ईद को मनाते समय उन्हें अपने-अपने राज्यों में लागू कोरोना नियमों का ध्यान भी रखना पड़ेगा। 

मगर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने इस त्यौहार से पहले तीन दिन के लिए इन नियमों में छूट देकर यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि उसके बनाये गये नियम धर्म सापेक्ष हैं। इसका सन्देश पूरे देश में यही गया कि धार्मिक रीति-रिवाजों के आगे जीवन जीने के अधिकार को गिरवी रखा जा सकता है। आश्चर्यजनक रूप से यह सन्देश मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा दिया गया। जबकि इससे पहले ही कांवड़ यात्रा के बारे में सर्वोच्च न्यायलय ने बहुत सख्त रुख अख्तियार करके साफ कर दिया था कि कोरोना काल में कोई भी राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिश न करे। यह संयोग नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कांवड़ यात्रा व बकरीद पर विशेष छूट दिये जाने का स्वतः ही संज्ञान लिया। इसका तात्पर्य यही निकलता है कि देश में कानून का राज देखने का निगेहबान सर्वोच्च न्यायालय किसी भी सूरत में किसी भी राजनीतिक दल की किसी भी राज्य सरकार को एेसी रियायत नहीं देगा जिससे नागरिकों के जीवन जीने के मूल अधिकार को किसी भी प्रकार का खतरा हो सके। इसके साथ यह भी समझने की जरूरत होती है कि धार्मिक रूढि़यां व रीति-रिवाज समय सापेक्ष होते हैं क्योंकि इन रूढि़यों का सम्बन्ध धर्म के मूल तत्व से न होकर उसके आडम्बर से होता है। इन्हीं धार्मिक आडम्बरों को तोड़ने के लिए विभिन्न धर्मों में संशोधन वाद की लहरें चलती हैं। 

पंजाब में इसी धार्मिक पाखंड को खत्म करने के लिए सिख धर्म की स्थापना हुई थी। इसी प्रकार आर्य समाज का उद्देश्य भी पाखंड को समाप्त करना था। पाखंड को जब तोड़ा जाता है तो समाज में वैज्ञानिक विचारों का विस्तार होता है क्योंकि पाखंड अंधविश्वास का जन्मदाता होता है। यह अन्धविश्वास रूढि़यों की डोर पकड़ कर ही समाज को बजाये आगे जाने के पीछे धकेलता है। इसका सबसे ज्यादा प्रमाण भारत में फैला जातिवाद है जिसकी वजह से किसी दलित के घर ऊंची जाति के व्यक्ति का भोजन करना आज भी अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बन जाता है। इसका मन्तव्य यही निकल सकता है कि हम बजाये आगे जाने के पीछे की तरफ जा रहे हैं क्योंकि भारत को जब आजादी मिली थी तो भी सामाजिक व्यवस्था एेसी ही थी। बेशक लोकतन्त्र में इसकी जिम्मेदार राजनीति ही होती है क्योंकि यह व्यक्ति के जीवन के हर क्षेत्र को निर्देशित करती है। इसी वजह से संविधान में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि सरकारें नागरिकों में वैज्ञानिक सोच उत्पन्न करने का प्रयास करेंगी। कोरोना की दूसरी लहर के कहर ने अपनी चपेट में भारत के हर परिवार को कमोबेश लेकर साफ कर दिया कि लोगों का जीवन धार्मिक रूढि़यां नहीं बल्कि वैज्ञानिक रीतियां ही बचा सकती हैं। इसी वजह से तो आज हर हिन्दू-मुसलमान नागरिक चिन्तित है कि उन्हें जल्दी से जल्दी कोरोना वैक्सीन के दो टीके लगें। केरल में तो कोरोना का प्रबन्धन बहुत करीने से किया गया मगर बकरीद पर कुछ लोगों की सुविधा के लिए इसे  कुर्बान कर दिया गया। 

 ‘‘कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग

 हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।’’