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केरल : अब देव रुष्ठ नहीं होंगे

केरल जो इस समय राजनीतिक हिंसा की चपेट में है और देशभर में केरल की हिंसा को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं, उसी राज्य में एक मन्दिर का द्वार एक दलित पुजारी ने खोलकर इतिहास रच डाला। केरल के मन्दिर तिरुवल्ला स्थित मनप्पुरम भगवान शिव के मन्दिर में 22 वर्षीय दलित येदु कृष्णन की नियुक्ति की गई है। दलितों में प्रलाया समुदाय से आने वाले कृष्णन ने 10 वर्ष तक तंत्र शास्त्र का प्रशिक्षण लिया है। कृष्णन संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन के अन्तिम वर्ष के छात्र हैं। उन्होंने पहली बार 15 वर्ष की उम्र में ही घर के निकटवर्ती मन्दिर में पूजा शुरू की थी। केरल के मन्दिरों के संचालन के लिए त्रावणकोर देवासोम बोर्ड है। इसकी स्थापना 1949 में हुई थी। यह बोर्ड 1248 के लगभग मन्दिरों का संचालन करता है। इन मन्दिरों में विश्व प्रसिद्ध सबरीमाला मन्दिर है। बोर्ड ने पिछले दिनों 36 गैर-ब्राह्मïणों को मन्दिरों के लिए चुना था, जिनमें 6 दलित हैं, जिनमें कृष्णन भी शामिल हैं। यह पहला मौका है जब मन्दिर में पुजारियों की नियुक्ति में आरक्षण की प्रक्रिया को अपनाया गया है।

वर्षों पहले दलितों को मन्दिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता था। यहां तक कि हिन्दुओं की नीची जातियों के लोगों का प्रवेश भी वर्जित था। 1936 में तब वायकोम आन्दोलन हुआ था। उस आन्दोलन के बाद त्रावणकोर के महाराजा ने निचली जाति के लोगों को प्रवेश की इजाजत दी थी। 1927 में महात्मा गांधी की आवाज पर मैसूर के राजा नलवाड़ी कृष्णराजा वडियर ने ऐसी घोषणा की थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आदिशंकराचार्य ने अद्वैत के सिद्धांत का ज्ञान भी एक अछूत गुरु से प्राप्त किया था। छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है। छुआछूत का विरोध भी शुरू से ही होता आया है। अगर छुआछूत होता तो महर्षि वाल्मीकि और संत रविदास कैसे होते? दलित बुद्धिजीवियों और चिन्तकों ने भी सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए लम्बा संघर्ष किया है। महर्षि दयानन्द और राजाराम मोहन राय ने भी छुआछूत का जमकर विरोध किया था।

वैसे सनातन मन्दिर में किसी दलित के पुजारी बनने की यह पहली घटना नहीं है। कभी साम्प्रदायिक वैमनस्य के लिए चर्चित हुए गुजरात के अहमदाबाद जिला के झंझारपुर कस्बे में स्थित श्रीकृष्ण मन्दिर के पुजारी दलित हैं। मन्दिर में आने वाले श्रद्धालु उन्हें सम्मान से महाराज बलदेव दास जी कहकर पुकारते हैं। आजादी के 70 वर्ष बाद भी जब देशभर में दलितों से भेदभाव, उनसे मारपीट की खबरें आ रही हों, इनके बीच केरल में दलित को पुजारी बनाए जाने से नई परिपाटी की शुरूआत हुई है। इस पहल से दलितों के साथ मन्दिर प्रवेश में हो रहे भेदभाव के खत्म होने की उम्मीद बंधी है। सहारनपुर में दलितों और ठाकुरों के बीच हुए दंगों को याद कीजिए जिसे समाज में घटती समरसता और बढ़ते जातिगत द्वेष के तौर पर देखा गया था। ऐसे में दलित येदु कृष्णन का मन्दिर में पूजा-पाठ कराना उम्मीद भरा संदेश है। हालांकि दलित पुजारियों की नियुक्ति भी संविधान के कारण ही हुई है जिसमें सरकारी नौकरियों में दलितों और पिछड़ों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। यद्यपि इस बात की आशंका थी कि मन्दिर में दलित पुजारियों की नियुक्ति का कुछ विरोध तो होगा लेकिन देवासोम बोर्ड को उम्मीद है कि भक्तों के बीच दलित पुजारी की स्वीकृति को लेकर सर्वसम्मति बना ली जाएगी। यह कोई कम आश्चर्यजनक नहीं है कि केरल के मन्दिर में दलित पुजारी की उपस्थिति मन्दिर प्रवेश की अधिसूचना जारी होने के 81 वर्ष बाद हुई है।

सबरीमाला अयप्पा मन्दिर में ब्राह्मण पुजारी की ही नियुक्ति होती है। यह हमेशा से होता आया है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है और गैर-ब्राह्मïण जातियों के लोगों की नियुक्ति के लिए आदेश देने को कहा गया है। विडम्बना यह भी है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक सम्बन्धी गैर-बराबरी के खिलाफ राज्य में आन्दोलन अब भी चल रहा है। इस हक को पाने के लिए महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में मुकद्दमा भी दायर कर रखा है। यह मामला अब संविधान पीठ के हवाले कर दिया गया है जो इस पर विचार करेगी कि क्या कोई मन्दिर महिलाओं का प्रवेश रोक सकता है? शनि ङ्क्षशगणापुर और हाजी अली दरगाह पर प्रवेश पाने की लड़ाई महिलाएं जीत चुकी हैं।

केरल हाईकोर्ट 1990 में परम्परा का हवाला देकर महिलाओं के प्रवेश सम्बन्धी याचिका को ठुकरा चुका है। अब अन्तिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट ही देगा। केरल में दलित पुजारियों की नियुक्ति का स्वागत किया गया है। केरल की सनातनी संस्था केरल हिन्दू ऐक्य वेदी के महासचिव ई.एस. बिजू ने भी इसका स्वागत किया है। उनका कहना है कि अब लोगों की मानसिकता बदल रही है। पुजारी को पूजा-पाठ के रिवाज का भली-भांति ज्ञान होना चाहिए और उनका जीवन मर्यादित होना चाहिए। मामला जाति से ज्यादा आचार-व्यवहार से जुड़ा है। हिन्दू धर्म में पूजा को ज्यादा महत्व दिया जाता है, चाहे पुजारी किसी की जाति का क्यों न हो। इस मामले पर सियासत नहीं होनी चाहिए लेकिन इस पर सियासत तो होगी ही। सामाजिक समरसता के लिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि दलित के आने से अब देवता रुष्ठ नहीं होंगे?