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केरलः थामस चांडी का इस्तीफा

केरल के परिवहन मन्त्री थामस चांडी ने भूमि अधिग्रहण घोटाले में फंस जाने के बाद राज्य की वामपंथी मोर्चे की सरकार से इस्तीफा दे दिया है अथवा यह कहा जा सकता है कि उन्हें मुख्यमंत्री पी. विजयन ने त्यागपत्र देने के लिए मजबूर कर दिया। यह केरल की राजनीतिक विशेषता शुरू से ही रही है कि यहां वित्तीय घोटालों या नैतिकता के विरुद्ध आचरण करने पर राजनीतिज्ञों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इस मामले में दक्षिण के इस तटवर्ती राज्य की राजनीति का भारत के किसी अन्य राज्य की राजनीति से मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यहां की राजनीति को पारदर्शी बनाने में राज्य के लोगों का अभूतपूर्व योगदान है जिनकी सियासी समझ हमेशा वैज्ञानिक सोच की पर्याय रही है। बिना शक यह राज्य ‘हिन्दू संस्कृति’ का ध्वज वाहक भी माना जा सकता है और यहां के लोग व्यवहार और प्रयोग में पूरे कर्मकांडी भी हैं मगर राजनीति को धर्म से अलग रखने की इनकी समझ अभूतपूर्व कही जा सकती है। यह केवल इसी राज्य में संभव था कि श्री पिनयारी विजयन की सरकार पिछले चुनावों में बनने से पूर्व राज्य में कांग्रेस नीत संयुक्त मोर्चे की सरकार का गठन केवल इसलिए हो गया था कि उन चुनावों में तब सत्तारूढ़ वामपंथी मोर्चे की श्री अच्युतानन्दन के नेतृत्व में चल रही सरकार को विधानसभा में मात्र दो सीटें कम मिली थीं मगर 88 वर्षीय श्री अच्युतानन्दन और उनकी मार्क्सवादी पार्टी ने साफ इंकार कर दिया था कि वह जोड़-तोड़ से सरकार किसी कीमत पर नहीं बनाएंगे और तब संयुक्त मोर्चे के नेता के रूप में श्री ओमन चांडी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।

बेशक आजकल यह राज्य संघ व मार्क्सवादियों के बीच चल रही राजनीतिक हिंसा की वजह से सुर्खियों में आता रहता हो मगर इसकी इस राजनी​ि​तक ईमानदारी को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए। यह नैतिकता का एक ही उदाहरण हो एेसा भी नहीं है। सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्व. के. करुणाकरण को तब इस्तीफा देना पड़ा था जब देश भर में लगी हुई इमरजैंसी के दौरान इंजीनियरिंग कालेज के एक छात्र ‘राजेन्द्रन’ की मृत्यु हो गई थी। यह मामला इमरजैंसी हटने के बाद प्रकाश में आया था और जब इमरजैंसी हटाने के बाद स्व. इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराये थे तो दक्षिण के सभी राज्यों में (केरल समेत) कांग्रेस पार्टी को 98 प्रतिशत सीटें मिली थीं मगर राजेन्द्रन के मामले पर राज्य के लोगों ने करुणाकरण को मजबूर कर दिया था कि वह अपने पद से इस्तीफा दें। इसके बाद भी राज्य में ‘पाम आयल’ आयात घोटाले से राजनीतिक तूफान खड़ा हुआ था और उसमें भी राजनीतिज्ञों की बलि पूरे ढोल-नगाड़ों के साथ ली गई थी। कहने का मतलब यह है कि केरल राज्य को हमें आजकल चल रही अवसरवादी और स्वार्थी राजनीति के दायरे से बाहर रख कर देखना होगा।

क्योंकि यह ऐसा राज्य है जहां के भूतपूर्व मुख्यमन्त्री श्री ए.के. एंटनी ने इस पद पर रहते हुए कभी भी अपने परिवार के किसी सदस्य की कोई मदद नहीं की और अपनी पत्नी तक को एक स्कूल की अध्यापिका पद पाने तक के लिए कोई सहायता नहीं की बल्कि उनका पुत्र उनके रक्षामन्त्री बन जाने के बावजूद कई वर्षों तक बेकार घूमता रहा। सवाल कांग्रेस या भाजपा अथवा मार्क्सवादी पार्टी का नहीं है बल्कि राजनीतिक नैतिकता का है आैर इस मामले में केरल का कोई सानी नहीं है। राजनीतिक घटाटोप में यहां के राजनीतिज्ञ एक रोशनी की खिड़की खोले रहे हैं। इस खिड़की को किसी भी तौर पर बन्द नहीं होने देना चाहिए। अतः राष्ट्रवादी कांग्रेस के कोटे से वामपंथी मोर्चे में मन्त्री बने थामस चांडी के इस्तीफे को ‘कृपा रूप’ में नहीं बल्कि ‘फर्ज’ के तौर पर देखा जाना चाहिए और अन्य राज्यों की सरकारों को भी इसका अनुसरण करना चाहिए। चांडी ने अपने राजनीतिक संस्कारों की वजह से ही अलेप्पी (अलफुजा) में अपने पर्यटन गृह के लिए उस जमीन का अधिग्रहण करने में कोई शर्म नहीं दिखाई जो कि पर्यावरण संरक्षण नियमों के तहत सुरक्षित घोषित की गई थी। यह भी इस राज्य की खूबसूरती कही जाएगी कि उसी सरकार ने इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जिसमें चांडी स्वयं परिवहन मन्त्री थे। इस जांच में सरकारी अफसरों ने ही पाया कि चांडी ने अवैध कब्जा किया है और नियमों का उल्लंघन करके अपने पर्यटन गृह तक जाने के लिए धान के खेतों से सड़क निकाली है और वाहनों की पार्किंग के लिए अवैध तरीके से जमीन कब्जाई है। दरअसल यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून की नजर में सबके एक बराबर होने का उदाहरण है। कानून किसी ‘मन्त्री’ और ‘सन्तरी’ में कोई अन्तर नहीं जानता।

चांडी अपनी ही सरकार के अफसरों की रिपोर्ट के खिलाफ उच्च न्यायालय भी गये मगर वहां से भी उन्हें कस कर झाड़ पड़ी। इसके बाद लगातार यह मांग हो रही थी कि चांडी को इस्तीफा दे देना चाहिए मगर वह अपने मन्त्री होने की गफलत में जी रहे थे लेकिन लोकतन्त्र की मर्यादा ऐसा नियम होता है जिसका सीधा सम्बन्ध नैतिकता से होता है। इसके साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि गठबंधन की मजबूरी जैसा कोई बहाना लोकतन्त्र में नहीं हो सकता क्यों​िक यह बहाना वे लोग बनाते हैं जो सत्ता से चिपके रहना ही राजनीतिक लक्ष्य मानते हैं। लोकतन्त्र में हम राजनीति को राज और नीति के परस्पर समानुरूपी दायरे में ही रखकर देखेंगे क्योंकि बिना स्वच्छ व पवित्र नीति के राज का कोई अर्थ नहीं होता। महात्मा गांधी ने साधन और साध्य की जिस शुचिता के बारे में सन्देश दिया था उसका मतलब यही निकलता है कि शुचितापूर्ण नीतियों से ही ‘राज’ चलना चाहिए।

राम राज्य का अर्थ भी इसके अलावा और कुछ नहीं है मगर मेरे तर्कों से कुछ विद्वान असहमत हो सकते हैं और कह सकते हैं कि राजनीतिक सैद्धान्तिक दर्शन ही राजनीति को स्वच्छ रख सकता है मगर इसके लिए भी व्यक्तियों का स्वच्छ होना बहुत जरूरी होता है। व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी ही किसी भी राजनीतिक दर्शन की सफलता की गारंटी होती है। अतः यह बेवजह नहीं था कि जब केरल की राजनीति के महास्तम्भ मार्क्सवादी पुरोधा श्री ई.एम.एस. नम्बूदिपाद की मृत्यु हुई थी तो केन्द्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अपने एक मन्त्री को विशेष रूप से शोक में शामिल होने के लिए भेजा था और स्व. नम्बूदिपाद को पहली बार मार्क्सवाद का पाठ प्रख्यात स्वतन्त्रता सेनानी और समाजवाद के पुरोधा स्व. आचार्य नरेन्द्र देव ने पढ़ाया था। अतः भारत की विविधता केवल सांस्कृतिक छटा में ही नहीं विराजती है बल्कि यह राजनीतिक क्षेत्र में भी अपना ‘आलोक’ बिखेरती रही है।