लालू का नया ‘परिवारवाद’


राजद नेता लालू प्रसाद जिस प्रकार भ्रष्टाचार के आरोपों से चारों तरफ से घिरते जा रहे हैं, उससे यह तो स्पष्ट हो गया है कि उनकी ‘सामाजिक-न्याय’ की राजनीति पूरी तरह ‘अन्यायपूर्ण’ रही है। उसके प्रमाण में यह तथ्य रखा जा सकता है कि उन्होंने ‘जनता’ की कीमत पर अपने परिवार की गरीबी दूर करने का उपाय सोचा और बिहार की सियासत में खानदानी राजनीति की नई बिसात अपने दोनों पुत्रों को मंत्री बनाकर व पुत्री को राज्यसभा सदस्य बनाकर बिछाई। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि लालू जी के पुत्र-पुत्रियों के विरुद्ध जो सी.बी.आई. जांच चल रही है वही अंतिम सत्य है, बल्कि यह कह रहा हूं कि इससे कम से कम लालू जी की ‘राजनीति’ का सत्य तो प्रकट होता ही है। बेशक सीबीआई के आरोपपत्रों की तसदीक न्यायालय में होगी और वहीं सच-झूठ का अंतिम फैसला होगा, मगर यह तो हकीकत है कि लालू जी के सत्ता में रहने का लाभ उनके परिवार के लोगों को मिला। जिस प्रकार बेनामी सम्पत्ति की खरीद-फरोख्त को अंजाम दिया गया, उसका अंतिम लाभ लालू जी के परिवार को ही क्यों मिला? मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि बिहार में लालू जी का ‘जनाधार’ है।

वह एक बहुत बड़े वर्ग के नेता हैं मगर इसका मतलब यह कदापि नहीं हो सकता कि इसका लाभ निजी तौर पर लालू जी अपने परिवार की सम्पत्ति में इजाफा करने के लिए करें। बेहतर होता लालू जी अपनी लोकप्रियता का लाभ उसी लोक अर्थात् जन सामान्य को देने की कोशिश करते जिसने उन्हें नेता बनाया है। उन्होंने ऐसा न करके अपने कर्तव्य को ठोकर मारने का काम किया है और उसी जनता को मूर्ख बनाने का काम किया है। इस तथ्य का विश्लेषण स्वयं लालू जी करें कि बिहार की जनता ने उनके चारा घोटाला में अदालत द्वारा मुजरिम करार दिए जाने पर उन पर यकीन किया और उनकी पार्टी राजद को बिहार विधानसभा में सर्वाधिक सदस्य दिए। यह प्रमाण था कि लालू जी बेशक न्यायिक अदालत द्वारा दोषी करार दे दिए गए हों मगर ‘जन अदालत उन पर पूरा यकीन करती थी और उसी वजह से उन पर विश्वास करके उसने 2015 के विधानसभा चुनावों में ‘राजद’ को भारी जीत दी थी मगर भ्रष्टाचार के ताजा आरोप उनके परिवार के सदस्यों पर जिस तरह लग रहे हैं उससे बिहार की जनता का विश्वास न डगमगाए इसका कोई कारण नहीं है।

लालू जी को यह सिद्ध करना होगा कि उनके पुत्र-पुत्रियों के पास जो भी जमा धन-सम्पत्ति है, वह पूरी तरह सफेद कमाई की है। केवल यह कहने से काम नहीं चलेगा कि भाजपा बदले की भावना से उनके विरुद्ध काम कर रही है। राजनीति में राज-द्वेष से इन्कार नहीं किया जा सकता। स्वयं लालू जी भी इससे प्रभावित रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो रेल मंत्री रहते वह ‘ट्रेन’ में आग लगने की उस घटना की जांच करने का पुन: आदेश न देते जिसकी जांच पहले ही हो चुकी थी परन्तु लालू जी पर निजी तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगना गंभीर बात है। उनके आपराधिक प्रवृत्ति के राजनीतिक माफिया डान शहाबुद्धीन के साथ घनिष्ठ संबंधों का होना भी कम गंभीर नहीं है। राजनीतिक स्वच्छता में ‘पाप’ के कारोबारियों का होना स्वयं में कई प्रकार के संदेहों को जन्म देता है।

वर्गगत या जातिगत लाभांश को राजनीति में भुनाने की परंपरा भी बिहार से शुरू हुई जिसका सामाजिक न्याय से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है बल्कि हकीकत तो यह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को ध्वस्त करने के लिए ‘जातिगत’ युद्ध को बिहार मैं अमलीजामा पहनाया गया। 80 के दशक में जिस तरह बिहार में जातिमूलक ‘सेनाओं’ का गठन किया गया उसने ‘सामाजिक न्याय’ के संघर्ष को जमींदोज करके नए ‘जाति संघर्ष’ को जन्म दिया और लालू प्रसाद जैसे नेता इतिहास की इसी विकृत मानसिकता की उपज माने जा सकते हैं। जातिगत वोट बैंकों का उभरना इसी ‘जातिगत द्वंद्व’ का विकराल स्वरूप है। दुर्भाग्य यह है कि इस विकृति का उत्तर हमें ‘राष्ट्रवाद’ में भी संकुचित दायरे में सुविधाजनक रास्ते के तौर पर मिला। अत: हमें डा. राम मनोहर लोहिया के ‘सामाजिक न्याय’ के सिद्धांतों को फिर से पढ़कर उन पर अमल करना होगा।