पटाखों पर ‘बारूदी’राजनीति


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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दीपावली पर बम-पटाखे छोड़ने पर प्रतिबन्ध लगाने के आदेश से आश्चर्यजनक रूप से राजनीति गर्मा गई है और इसके विरुद्ध विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता बयानबाजी में लग गये हैं मगर सबसे अचम्भे में डालने वाली प्रतिक्रिया संवैधानिक पद पर आसीन त्रिपुरा के राज्यपाल श्री तथागत राय की आई है जिन्होंने बम-पटाखे छोड़ने को दीवाली की सांस्कृतिक पहचान बताया है। यह दीपावली के सांस्कृतिक स्वरूप को देखने का सबसे ज्यादा फूहड़ और भारतीयता के विरुद्ध नजरिया है। दीपावली का सम्बन्ध यदि सांस्कृतिक रूप से किसी प्रतीक से है तो वह केवल और केवल प्रकाश व गृहस्थ जीवन में खुशियां लाने वाली गृहलक्ष्मी अर्थात गृ​हणी से है। गृहिणी को लक्ष्मी रूप में सम्मान देने के साथ ही यह पर्व भगवान राम के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक से जुड़ा हुआ है।

दीपमालिका अर्थात दीपावली कार्तिक की अमावस्या के अंधेरे दिन मनाने की परंपरा का उस क्षणिक रोशनी से दूर–दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है जो पटाखों या आतिशबाजी से पैदा होती है। भारतीय संस्कृति में दीपावली पर प्रकाश को स्थायी भाव में प्रत्येक गृहस्थ के घर में विराजित रहने का संकल्प इस शर्त के साथ होता है कि गृहिणी अपने बुद्धि कौशल से अपने परिवार को जगमग बनाये रखे परन्तु अफसोस यह है कि आज के राजनीतिज्ञ अक्ल से इस कदर पैदल हो चुके हैं कि वे इस पर्व पर पटाखों को साम्प्रदायिक रूप देने तक से बाज नहीं आ रहे और इसे हिन्दू पर्वों के प्रति उपेक्षा भाव तक के खांचे में रख कर देख रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि दीपावली पर पटाखेबाजी की परंपरा मध्यकाल में ही देशी राजे–रजवाड़ों की आपसी लड़ाई के बाद विजयोत्सव के रूप में उभरी है। इससे पहले पूरे भारत में दीपावली केवल प्रकाश के विभिन्न शास्त्रीय आकारों को मूर्त रूप देने का त्यौहार होता था।

मुगलकाल में भी आतिशबाजी को एक कला के रूप में निखारा गया और आतिशगरों को हैरतंगेज हुनर दिखाने के लिए पुरस्कृत तक करने की रवायत शुरू हुई। अंग्रेजी शासनकाल में ब्रिटिश शासकों ने आतिशबाजी को अपने शासन का रूआब गालिब करने के रूप में किया मगर दीपावली पर आतिशबाजी करने का शौक सबसे पहले सामन्ती परिवारों में अपनी रियाया पर अपनी शान-ओ- शौकत के प्रदर्शन के लिए किया गया। सबसे पहले दीपावली पर पटाखे चलाने की संस्कृति पंजाब राज्य में शुरू हुई और फिर वहां से यह दूसरे राज्यों तक फैली। इसकी प्रमुख वजह यह थी कि पंजाब ही सबसे ज्यादा आक्रमणों के केन्द्र में रहा था। इसके साथ ही पंजाब की संस्कृति में रोमांच का भाव सर्वाधिक रहता है। अतः यहां के लोगों ने दीपावली के प्रकाश पर्व पर रोमांचकारी प्रयोग करने शुरू किये। धीरे – धीरे दीपावली का प्रमुख सांस्कृतिक स्वरूप गायब होता चला गया और पटाखों के रोमांच से भारत के दूसरे राज्यों के लोग भी रोमांचित होने लगे मगर पटाखेबाजी किसी भी कीमत पर दीपावली का सांस्कृतिक अंग नहीं रही बल्कि यह परिवार के साथ पूरे समाज में खुशियों के समान बंटवारे का प्रतीक रही।

यही वजह रही कि इस दिन समाज के प्रत्येक गरीब व्यक्ति के घर सम्पन्न व्यक्ति द्वारा मिठाई आदि उपहार देने की परंपरा विकसित हुई। गरीब से गरीब व्यक्ति के घर भी इस दिन रोशनी व खुशियों का प्रबन्ध करना सम्पन्न व्यक्ति का स्वतःस्फूर्त कर्तव्य बन गया। भारतीय संस्कृति के इस समाजवादी स्वरूप को पहचानने में जो लोग भूल करते हैं वे संस्कृति का किस आधार पर विश्लेषण कर सकते हैं बल्कि राजनेताओं ने इस मुद्दे पर जिस प्रकार दिमागी दिवालियेपन का नजारा पेश किया है उससे यही सिद्ध हुआ है कि राष्ट्रीय हितों से इनका सरोकार केवल अपने वोट बैंक को ऊल–जुलूल बहस में उलझाये रखना है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सख्ती के साथ पालन होना ​चाहिए और राजनीति को दरकिनार करते हुए आज की पीढ़ी में वैज्ञानिक सोच के प्रति रुझान बढ़ाना चाहिए और भारतीय संस्कृति के मूल अर्थ को समझने का विचार पैदा करना चाहिए। कुछ कथाकथित बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग तर्क दे रहे हैं कि प्रतिबन्ध लगाने से बचा जाना चाहिए। कुछ कह रहे हैं कि आतिशबाजी के रोजगार में लगे लोगों के बारे में भी सोचा जाना चाहिए मगर यह कोई नहीं कह रहा है कि जितना धन आतिशबाजी पर एक रात में फूंक दिया जाता है वह समाज के गरीब तबकों के घरों में उन लोगों द्वारा खुशहाली लाने के लिए खर्च किया जाना चाहिए जो पटाखेबाजी पर दिल खोलकर धन खर्च करते हैं।

ये अक्सर वे ही लोग होते हैं जो किसी रिक्शा वाले द्वारा दीपावली पर कुछ ज्यादा मजदूरी मांगे जाने पर उस पर भौंहें तरेरते हैं या किसी कुम्हार द्वारा दीपावली पर मिट्टी के तैयार किये गये दीये या अन्य सामान पर भाव-तोल करके पैसे बचाने की फिराक में रहते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि दीपावली केवल हिन्दुओं का त्यौहार है वे भी गलती पर हैं। यह पर्व भारत का वही त्यौहार है जिस प्रकार बसन्त के आगमन का, दीपावली का इंतजार जितना मुसलमान कारीगर और शिल्पकार करते हैं वह स्वयं में भारत को एक महान देश बनाता है मगर बदलते समय के साथ इनकी कला मर रही है। जरूरत इस बात की ज्यादा है कि इस कला को किसी भी सूरत में मरने न दिया जाये और दीपावली के मूल स्वरूप को जीवित रखा जाये।

असल में पर्यावरण के प्रति हमारे पुरखे जितने संवेदनशील थे उतना आज का आधुनिक समाज भी नहीं है इसीलिए दीपावली पर सरसों या मीठे तेल के दीये जलाने का प्रचलन था जिससे वातावरण में शुद्धि होती है मगर इनकी जगह पटाखों ने ले ली जो वातावरण को दूषित करने के अलावा दूसरा काम नहीं करते। जो लोग तम्बाकू या शराब पर प्रतिबन्ध लगाने से पटाखों की तुलना कर रहे हैं वे भूल रहे हैं कि ये दोनों वस्तुएं कुछ लोगों की जीवन शैली से सम्बन्धित हैं जबकि आतिशबाजी का हमारे दैनिक जीवन से कोई लेना–देना नहीं है। इसका सम्बन्ध ऐसे खतरनाक रोमांच से है, जो हमारी संस्कृति को ही दूषित करता है। दीपावली पूजन के दिन कही जाने वाली एक गरीब गृहिणी के परिवार की कहानी केवल इतनी है कि वह पूरे परिवार के प्रत्येक सदस्य को कर्मशील बने रहने का नियम लागू करके अपनी बुद्धिमत्ता से सुख-सम्पन्नता लाती है और गृहलक्ष्मी बन जाती है मगर कयामत यह है कि आज नेता खुद इस हकीकत को नहीं जानते।