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संपादकीय

मध्य प्रदेश कर्नाटक नहीं है!

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कर्नाटक में जिस तरह पिछले वर्ष अप्रैल-मई महीने में हुए चुनावों के बाद गठित कांग्रेस व जनता दल (सै.) की गठबन्धन सांझा सरकार का पतन केवल 13 महीने बाद हुआ है उससे अन्य राज्यों की उन सरकारों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है जिनका गठन पिछले वर्ष ही नवम्बर महीने में हुए चुनावों के बाद हुआ था। ऐसे तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान थे, जहां केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा था और इनमें प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की सरकारें गठित हुई थीं। 

इनमें से भी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में लगातार 15 वर्ष तक शासन करने के बाद भाजपा को कांग्रेस ने परास्त किया था। हालांकि राजस्थान व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत आने में सफल रही थी मगर मध्य प्रदेश में यह स्पष्ट बहुमत से केवल दो सीटें कम रहकर सबसे बड़ी पार्टी बन पाई थी। इसके बावजूद 231 सदस्यीय (एक मनोनीत सदस्य को मिलाकर) विधानसभा में 114 सीटें अपने बूते पर जीतने के साथ चार निर्दलीय विधायक ऐसे चुनकर आये थे जो कांग्रेस के ही बागी प्रत्याशी थे जबकि भाजपा 108 सीटें जीतने में सफल रही थी। साथ ही दो सीटें बसपा व एक सपा पार्टी ने जीती थी। 

राज्य में कांग्रेस को अपना विधानमंडल दल का नेता चुनने में किसी परेशानी या कशमकश का सामना भी नहीं करना पड़ा था क्योंकि इसकी राज्य इकाई की बागडोर चुनावों से लगभग छह महीने पहले पार्टी के कद्दावर नेता और मध्य प्रदेश के दिग्गज माने जाने वाले श्री कमलनाथ के हाथ में दे दी गई थी। उन्हीं के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़े गये थे। 

गुटों और आंचलिक महन्तों के जमघटों में सिमटी कांग्रेस को इन चुनावों में एकीकृत ताकत के रूप में खड़ा करके श्री कमलनाथ ने यह चुनाव ‘जय-जय भोले नाथ, घर-घर कमलनाथ’ के सावन के महीने से शुरू हुए चुनावी विमर्श से जीतने में सफलता प्राप्त की थी और भाजपा के शेर कहे जाने वाले तत्कालीन मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान को उनकी ही मांद में समेट कर भोपाल में अपना राजतिलक कराया था। 

विधानसभा में पूर्ण बहुमत के लिए कमलनाथ को किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि बसपा के दो व सपा के एक विधायक ने अपना समर्थन खुलकर दिया और चारों निर्दलीय विधायकों ने बिना किसी देरी के उनके नेतृत्व में अपना विश्वास प्रकट कर दिया। इस प्रकार 230 सदस्यों में से 121 सदस्यों का समर्थन कमलनाथ सरकार को प्राप्त हो गया और नई विधानसभा के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पदों पर भी कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों का चुनाव हुआ। हालांकि अध्यक्ष के चुनाव के समय भी बहुत विरोधी दावे किये गये थे मगर ऐन मौके पर कांग्रेस के प्रत्याशी को अपेक्षा से अधिक मत मिले। 

अब कर्नाटक की घटना से प्रेरित होकर यदि राज्य भाजपा के नेता अति उत्साहित हो रहे हैं तो वे राजनैतिक अपरिपक्वता का परिचय दे रहे हैं और अपने आला कमान के लिए दुविधापूर्ण वातावरण बना रहे हैं। मध्य प्रदेश किसी भी सूरत में कर्नाटक नहीं है क्योंकि इस राज्य में कोई साझा सरकार न होकर खालिस कांग्रेस की सरकार है। 

यह बात और है कि इस सरकार को शुरू से ही दो इंजन वाली विरोधी दिशाओं में दोड़ने वाली सरकार बनाने में कांग्रेस के ग्वालियर संभाग के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी परन्तु सिन्धिया भूल गये थे कि वह इस राज्य के उस इलाके भर के नेता हैं जो कभी उनके पुरखों की रियासत कहलाता था जबकि कमलनाथ उस राजनीति के वारिस हैं जिसके तहत 1980 के उनके पहले लोकसभा चुनाव के दौरान स्व. इन्दिरा गांधी ने उन्हें अपना ‘तीसरा बेटा’ कहा था। 

इस बुनियादी फर्क को श्री सिंधिया अभी तक नहीं समझ सके हैं जिसके चलते वह गफलत के शिकार हो जाते हैं।  2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी अपने ही घर में जिस तरह पराजय हुई है उससे उनकी गलतफहमी दूर होने में जरूर मदद मिलेगी और उन्हें नये जमाने की रोशनी का इल्म होगा मगर असली सवाल मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार का है जिसके बारे में शिवराज सिंह चौहान से लेकर विधानसभा में भाजपा के विपक्ष के नेता श्री गोपाल भार्गव भविष्यवाणियां करते हुए कह रहे हैं कि इसका हश्र भी कर्नाटक जैसा ही होगा।  

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि शिवराज शासन के दौरान मध्य प्रदेश में एक से बढ़कर एक घोटाले हुए और राज्य के किसानों से लेकर युवाओं के साथ धोखाधड़ी  का बाजार गर्म रहा। सबसे बड़ा कांड व्यापम घोटाला हुआ जिसमें 44 से अधिक निरपराध लोगों की मृत्यु रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में हुई और इसकी आंच तत्कालीन राज्यपाल के आवास तक पहुंची। नर्मदा बचाओ के नाम पर दोस्तों की मौज आ गई। सरकारी नौकरियों में जिस तरह ठेके पर भाई-भतीजावाद को शिष्टाचार बनाया गया उससे मध्य प्रदेश का युवा वर्ग कुलबुला गया। 

अतः नई कमलनाथ सरकार के लिये चुनौतियों का अम्बार लगा हुआ था मगर छह महीने बाद ही लोकसभा चुनावों में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की अपार लोकप्रियता ने राज्य की केवल एक छिन्दवाड़ा सीट छोड़ कर शेष सभी पर शानदार विजय प्राप्त करके प्रदेश के भाजपा नेताओं का मनोबल बढ़ा दिया। 

कमलनाथ की राजनैतिक दृष्टि परिपक्व है जिसकी वजह से उनकी सरकार की नीतियों में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने की विभिन्न योजनाएं शामिल हैं और बेरोजगार युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार सुलभ कराने के उपाय हैं लेकिन इनका राजनैतिक समीकरणों से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए  शिवराज सिंह या विधानसभा में विपक्ष के भाजपा नेता गोपाल भार्गव यदि यह सोचते हैं कि कर्नाटक की तरह मध्य प्रदेश में भी उनके दिन बदल सकते हैं तो यकीनन बिल्ली के भागों छींका टूटने वाला नहीं है क्योंकि पूरे 15 साल बाद कांग्रेस के हाथ में राज्य की सत्ता  आयी है। 

भाजपा के प्रादेशिक नेता ऐसा कहकर अपने केन्द्रीय नेतृत्व के लिए ही परेशानियां खड़ा करने का काम कर रहे हैं। भाजपा कभी यह नहीं चाहेगी कि मध्य प्रदेश जैसे उसके  शुरूआती मजबूती के राज्य में उसकी छवि छल-बल से सरकार गिराने और बनाने वाली पार्टी की बने। क्योंकि जनसंघ (भाजपा) के बुरे वक्त में मध्य प्रदेश ही सबसे ज्यादा काम आने वाला राज्य रहा है। अतः इस राज्य में अपने संगठन को साफ-सुथरा रखना उसकी पहली जिम्मेदारी है।