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महाराष्ट्र की राजनीतिक ‘माया’

सियासत कितनी दिलफरेब हो सकती है, इसका जीता-जागता नजारा महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। रातभर में राजनीति का रंग किस तरह बदलता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ‘मायानगरी’ के नाम से प्रसिद्ध मुम्बई नगरी ने दे दिया है मगर इसे जो लोग अचम्भा मान रहे हैं वे सियासत की असल ‘शह’ से नावाकिफ कहे जा सकते हैं क्योंकि शिवसेना और कांग्रेस का मिलना इनके लिए अगर अचम्भा नहीं था तो राष्ट्रवादी कांग्रेस व भाजपा का मिलना अचम्भा कैसे हो गया? गत शाम तक जिस कांग्रेस, राकांपा व शिवसेना के मेल को संभावनाओं का खेल कहा जा रहा था तो अगली सुबह राजभवन में देवेन्द्र फडणवीस के मुख्यमन्त्री पद और राकांपा के अजीत पवार का उपमुख्यमन्त्री पद पर बैठना भी संभावनाओं के खेल के अलावा और क्या कहा जायेगा? 

दोनों ही मामलों में सिद्धान्तों की राजनीति का क्या लेना-देना था? मगर जो सिद्धान्त व नीति की बात महाराष्ट्र की जनता ने विधानसभा चुनावों के परिणाम के जरिये बोली थी उसमें भाजपा को ही पुनः सत्तारूढ़ होने का जनादेश था। बेशक यह जनादेश इसकी साथी शिवसेना पार्टी के सहयोग से बनी ‘महायुति’ को था परन्तु स्पष्ट जनादेश तो था। इस तर्क को कुछ राजनैतिक आलोचक आसानी से हजम नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करते ही मौजूदा राजनैतिक समीकरणों के दबाव से वे निहत्थे हो जायेंगे। 

सवाल यह है कि भाजपा ने क्या रात के अंधेरे में राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का दावा करके भोर होते ही सरकार गठित करके क्या अनैतिकता बरतने या संविधान के विपरीत जाने का कार्य किया है? इन दोनों ही पैमानों पर भाजपा का रुख पूरी तरह राजनैतिक मानदंडों के उस दायरे में आता है जिसे उसके विरोधी दल अपनी सरकार काबिज करने का आधार बना रहे थे। अतः भाजपा का यह कार्य पूरी तरह नैतिकता के दायरे में ही कहा जायेगा। 

पहला राजनैतिक बहुमत के लिए बेमेल विचारों का समागम और दूसरा विधानसभा के भीतर संख्या बल के आधार पर स्पष्ट बहुमत भाजपा के 105 और राकांपा के 54 विधायकों की संख्या मिलकर 288 के सदन में 159 बैठती है। यह संख्या राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी को पुख्ता दस्तावेजी सबूतों के आधार पर दिखाई गई जिसे उन्होंने बिना किसी संवैधानिक अड़चन और अपने विवेक के सामर्थ्य पर स्वीकार किया। राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक श्री अजीत पवार को इस पार्टी के विधानमंडलीय दल की बैठक में ही विधि अनुसार नेता चुना गया था और उन्हें सरकार बनाने के लिए अन्य दलों के साथ सहयोग करने को अधिकृत किया गया था। 

अपने इस जायज और विधि सम्मत अधिकार का प्रयोग उन्होंने भाजपा के साथ सहयोग करके स्थायी सरकार बनाने की गरज से किया तो राज्यपाल को किस तरह आपत्ति और आशंका हो सकती थी? बेशक यह तर्क मान्य हो सकता है कि राज्यपाल को राज्य में चल रही राजनैतिक गतिविधियों का जायजा लेते हुए अपने विवेक की व्यावहारिकता को भी जागृत रखना चाहिए था परन्तु संवैधानिक दस्तावेजी प्राधिकार के चलते वह व्यावहारिकता को किसी भी सूरत में तरजीह नहीं दे सकते थे क्योंकि भाजपा नेता फडणवीस ने उनके समक्ष कुल 159 विधायकों का वह सबूती कागज पेश कर दिया था जिसमें 105 उनकी पार्टी के विधायकों ने उन्हें खुद को और 54 राकांपा के विधायकों ने अपने नेता अजीत पवार के माध्यम से उन्हें अपना नेता स्वीकार किया था। 

संविधान के नुक्त-ए-नजर से किसी भी कानून के तहत राज्यपाल की इस कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती। हालांकि यह हकीकत अपनी जगह है कि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन हटाने की औपचारिकता के बिना ही चुनी हुई सरकार का गठन किस प्रकार आनन-फानन में कर दिया गया? इस मुद्दे पर विरोधी दलों के विधि विशेषज्ञ जरूर दिमाग खपाई करेंगे, जिसका उन्हें पूरा हक है क्योंकि भारत में कोई भी कार्य संविधान के अनुसार ही होना चाहिए लेकिन अजीत पवार का अपने राजनैतिक गुरु और अपनी पार्टी के संस्थापक श्री शरद पवार के विरुद्ध जाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। अतः इसे हल्के में लेने की गलती  किसी को नहीं करनी चाहिए। 

यह भी कम हैरत में डालने वाली घटना नहीं है कि विगत 24 अक्टूबर को राज्य में जिन विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित हुए थे उनमें अजीत पवार ने पूरे राज्य में सर्वाधिक सवा लाख वोटों से भी ज्यादा अन्तर से विजय तब प्राप्त की थी जबकि उनके खिलाफ भाजपा ने ही व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार का भारी अभियान छेड़ा हुआ था। जाहिर है कि अजीत दादा के सर पर शरद पवार की जबर्दस्त लोक समर्थन की ताकत की छाया थी। अब इसी छाया से अजीत पवार ने खुद को बाहर करने का ऐलान भाजपा के साथ जाकर कर दिया है? क्या इसे शरद पवार की मजबूरी के तौर पर देखा जाना महाराष्ट्र की जनता पसन्द करेगी? 

नई फडणवीस सरकार को राज्यपाल ने 30 नवम्बर तक अपना बहुमत विधानसभा में सिद्ध करने का समय दिया है। विधानसभा का सत्र फिलहाल दो सदस्यीय मन्त्रिमंडल की अनुशंसा पर ही राज्यपाल इस बीच बुलायेंगे और इस दौरान ही शिवसेना, कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस सभी अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने का प्रयास करेंगे। राष्ट्रवादी कांग्रेस के कुल 54 विधायक क्या रुख अपनाते हैं? यह सबसे महत्वपूर्ण होगा। सदन के भीतर ही किसी भी सरकार का शक्ति परीक्षण संवैधानिक तौर पर मान्य होता है। 

अतः 30 नवम्बर तक का इन्तजार कोई बहुत ज्यादा समय नहीं है लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि अजीत पवार क्यों पिछले एक सप्ताह से अनमने चल रहे थे और जब उनके नेता शरद पवार ने शिवसेना व कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की तजवीज को ठोस शक्ल देनी शुरू की तो क्यों वह अपने चुनावी जिले बारामती की तरफ कूच कर जाना चाहते थे? जाहिर है कहीं ‘फांस’ तो गड़ी हुई थी। क्या हवा को सूंघ कर सियासत का नक्शा खींचने वाले शरद पवार को इसका इल्म नहीं था? क्या पर्दे के पीछे से भाजपा अपनी सरकार बनाने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने के प्रयासों में नहीं लगी हुई थी और उसके सम्पर्क में विपक्षी पार्टियों के ही बीसियों विधायक नहीं थे? 

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका सम्बन्ध प्रधानमन्त्री व श्री शरद पवार के बीच गत मंगलवार को हुई  बैठक से भी जोड़ कर देखा जा रहा है मगर असल मुद्दा यह है कि विपक्ष अपनी विफलता को भाजपा के मत्थे किस प्रकार मढ़ सकता है। राष्ट्रवादी कांग्रेस व कांग्रेस ने तो चुनावों में भाजपा व शिवसेना को गला तर कर-करके कोसते हुए ही कुल 98 सीटें जीती थीं मगर क्या सितम हुआ कि खुद ही सरकार बनाने की विफलता अब राज्यपाल के मत्थे मढ़ने की कोशिश कर रही हैं!