महबूबाःआतंक का राग क्यों?


जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमन्त्री महबूबा मुफ्ती के इस बयान को कोई कश्मीरी तक गंभीरता के साथ नहीं लेगा कि यदि उनकी पार्टी पीडीपी में नई दिल्ली की शह पर तोड़-फोड़ की गई तो राज्य में सैयद सलाहुद्दीन जैसे नये आतंकवादी पैदा हो जायेंगे और कश्मीर की आजादी की मुहिम छेड़ने वाले यासीन मलिक जैसे नेता उभर जायेंगे। उनकी पार्टी का इतिहास बहुत पुराना नहीं है जिसे उनके पिता स्व. मुफ्ती मुहम्मद सईद ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर बनाया था और इसका सिद्धान्त स्वायत्तता (आटोनामी) की जगह स्वराज (सेल्फ रूल) तय किया गया था मगर कुछ दिनों पहले ही उनकी भाजपा के साथ साझा सरकार के गिर जाने के बाद जिस प्रकार की प्रतिक्रिया उन्होंने व्यक्त की है उससे साफ लगता है कि राज्य में आतंकवादी तत्वों को पालने-पोसने में कहीं न कहीं उनकी पार्टी की भूमिका भी रही है। पीडीपी में विघटन से आतंकवाद का क्या लेना-देना हो सकता है? जब​िक यह एक चुनाव आयोग में पंजीकृत पार्टी है।

राजनैतिक दलों में विघटन तो होते रहते हैं, यह राजनीति की एक सामान्य प्रक्रिया है जिसमें खुद पार्टी के लोगों की ही अहम भूमिका होती है। अगर पीडीपी के कुल 28 विधायकों में से कुछ विधायक अपना गुट अलग बनाना चाहते हैं तो उसमें भाजपा क्या कर सकती है? लेकिन क्या सितम है कि जिस पार्टी का गठन ही दिल्ली में बैठकर कश्मीरियों के वोट बांटने की गरज से किया गया हो वह आज कह रही है कि अगर उसमें विघटन हुआ तो आतंकवादी तैयार हो जायेंगे। जम्मू-कश्मीर के लोग इतने नादान नहीं हैं कि उन्हें इस बात का इल्म ही न हो कि जिस पार्टी ने भाजपा के साथ मिलकर चार साल तक सूबे की हुकूमत चलाई है उसकी असली मंशा क्या है? दुनिया जानती है कि कश्मीर में हुर्रियत कांग्रेस का गठन भी दिल्ली के इशारे पर ही नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान हुआ था। 1987 के जिस वाकये का जिक्र महबूबा ने किया है उस समय दिल्ली में स्व. राजीव गांधी की सरकार थी।

उनसे यह गलती हुई थी कि उन्होंने प्रधानमन्त्री की गद्दी पर बैठने के कुछ महीने बाद ही श्रीनगर में काबिज डा. फारूक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस में दो-फाड़ करा कर उनके बहनोई गुलाम मुहम्मद शाह की सरकार बनवा दी थी जो पूरे दो साल भी नहीं चली थी और बाद में फिर फारूक अब्दुल्ला ही मुख्यमन्त्री बने थे। उस समय मुस्लिम संयुक्त मोर्चा बना जिसकी वजह से राज्य की राजनीति में लगातार मजहबी फिरकापरस्ती रंग में आने लगी थी मगर ध्यान रखा जाना चाहिए कि केन्द्र में 1989 में स्व. वीपी सिंह की सरकार आने के बाद और इसमें स्व. मुफ्ती सईद के गृहमन्त्री होने के बावजूद उनकी बेटी रुबैया सईद का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था जिसकी एवज में कई दुर्दान्त आतंकवादियों को छोड़ा गया था मगर उन्हीं मुफ्ती साहब की पार्टी के साथ भाजपा ने मिलकर उन्हीं के नेतृत्व में चार साल पहले सरकार का गठन करके यह साबित करने की कोशिश की कि जम्मू-कश्मीर जैसे संजीदा राज्य को चलाने में भाजपा अपनी पूर्व सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस से पीछे नहीं रहना चाहती जबकि इन दोनों पार्टियों के सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर था, फिर भी इसे एक प्रयोग के रूप में देखा गया मगर इन चार सालों में घाटी में जिस तरह के हालात बने उससे आम भारतवासी को भारी निराशा हुई और वह सोचने पर मजबूर होने लगा कि कश्मीर की राजनैतिक दिशा को रास्ते पर लाना इस सरकार के बस की बात नहीं है।

बड़ा खतरा यह पैदा होने लगा था कि जम्मू-कश्मीर के तीन अंचलों जम्मू, कश्मीर व लद्दाख के लोगों के बीच ही कहीं दूरियां न बढ़ने लगें। इसकी मुख्य वजह सम्प्रदाय के आधार पर अविश्वास पैदा होना माना गया। महबूबा की सरकार ने इस दिशा में स्थितियों को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये। यह तो इस राज्य की महान संस्कृति का ही प्रभाव है कि यहां के लोगों ने एक-दूसरे के साथ अपनी पहचान को समाहित करके मजबूती से कस कर पकड़े रखा लेकिन सरकार तो इस मोर्चे पर कहीं सक्रिय नजर नहीं आयी उलटे इसमें बैठे हुए लोग ही इस दूरी को बढ़ाने का काम करते रहे। इतना ही नहीं इस राज्य में फौज के सम्मान को आहत करने में भी काेई कसर नहीं छोड़ी गई। जो काम राज्य सरकार को करना चाहिए वह काम फौज के जिम्मे सौंपकर सोच लिया गया कि बरगलाये हुए लोग रास्ते पर आ जायेंगे। इसी से पता चलता है कि आम कश्मीरी में महबूबा मुफ्ती की पार्टी का कितना इकबाल बचा है।

इसमें भाजपा को कुछ भी करने की क्या जरूरत है क्योंकि पीडीपी में तो खुद ही लोग महबूबा के खिलाफ बोल रहे हैं। यह इस बात का सबूत भी है कि महबूबा के हाथ से वह जमीन खिसक रही है जिसके भरोसे पर वह अपनी राजनीति चला रही थीं। याद रखा जाना चाहिए कि 1974 में स्व. शेख अब्दुल्ला और इन्दिरा गांधी के बीच समझौता हो जाने पर दक्षिण कश्मीर मंे जमाते इस्लामी की जो जमीन थी उसी पर स्व. मुफ्ती साहब ने कांग्रेस पार्टी को छोड़कर अपनी इमारत खड़ी की थी। क्योंकि शेख साहब के पुनः सत्ता में आने के बाद उनका विरोध करना आसान काम नहीं था क्योंकि भारत विरोध की राजनीति का घाटी में यह अन्त था जबकि शेख अब्दुल्ला के साथी स्व. मिर्जा अफजल बेग ने उनके नजरबन्द रहते इसी क्षेत्र में सबसे पुख्ता जमीन तैयार की थी। इसलिए महबूबा को पुराना नजरिया छोड़ना होगा।