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ममता दी का कांग्रेस पर वार ?

ममता दी ने कांग्रेस पार्टी पर यह आरोप लगा कर कि यह पार्टी अकर्मण्यता के दौर में जी रही है जिसकी विपक्षी धर्म का पालन नहीं हो पा रहा है, वास्तव में विपक्ष की समग्र एकता को ही सन्देह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। ममता दी भूल रही हैं कि 1996 में कांग्रेस पार्टी से अलग होकर ही उन्होंने अपनी तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन तब किया था जब कोलकोता में स्व. सीताराम केसरी की सदारत में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासम्मेलन हो रहा था। बेशक ममता दी गोवा राज्य में अकेले ही अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं परन्तु इस राज्य में भी उनकी असली ताकत मूल कांग्रेस के जमीनी व शिखर कार्यकर्ता व नेता ही हैं। ऐसा भी हो सकता है कि गोवा में कांग्रेस की विचारधारा औऱ नीतियों में यकीन रखने वाले लोगों को फिलहाल यह नजर आ रहा हो कि राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा का मुकाबला जिस हौंसले और हिम्मत के साथ ममता दी कर सकती हैं उसकी कांग्रेस के नेताओं में कमी है मगर वह इस नियम को नहीं भूल सकती कि यह राजनीतिक आवागमन वक्त के बदलने पर दिवआयामी भी हो सकता है लेकिन ममता दी को यह याद रखना होगा कि अखिल भारतीय स्तर पर विपक्ष की मजबूत एकता का रास्ता केवल कांग्रेस की छत्रछाया में ही संभव है क्योंकि इस पार्टी के निशान आज भी देश के हर छोटे–बड़े राज्य में मौजूद हैं और इसकी विचारधारा को मानने वालों की तादाद भी कम नहीं है। पिछले 2019 के चुनावों में हालांकि कांग्रेस ने 54 सीटें ही जीती थीं मगर इसे कुल पड़े लगभग 78 करोड़ वोटों में से 12 करोड़ वोट मिले थे। इसकी वजह यही थी कि कांग्रेस का सिकुड़ता हुआ जनाधार अभी भी इतना व्यापक है कि इसकी गिनती व पहचान एकमात्र राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी के रूप में होती है। फिर ममता दी ने क्षेत्रीय दलों से एकजुट होने की जो अपील की है उसका असर राष्ट्रीय स्तर पर तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय दल मिल कर कांग्रेस को आगे रख कर समन्वित प्रयास करें। यह तथ्य शीशे की तरह साफ है कि ममता दी समेत किसी भी क्षेत्रीय दल के नेता की पहचान राष्ट्रीय या अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस नेता श्री राहुल गांधी की तरह एक समान स्वीकार्य नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि 80 लोकसभा सीटों वाले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी 1985 के चुनावों के बाद से कभी भी सत्ता में नहीं आयी और लगातार गिरावट पर रही परन्तु आज जबकि राज्य में भाजपा की तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार है और अगले वर्ष के मार्च में चुनाव होने हैं तो कांग्रेस पार्टी की श्रीमती प्रियंका गांधी ही मुख्यमन्त्री के घर (गोरखपुर) में उन्हें चुनौती देती हुई दिख रही हैं। ममता दी अपने राज्य प. बंगाल में भाजपा को करारी शिकस्त देने में सफल रही हैं मगर वैसी ही सफलता वह उत्तर भारत के किसी अन्य राज्य में देने की सामर्थ्य नहीं रखती हैं। तर्क दिया जा सकता है कि कांग्रेस की स्थिति बिहार व उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में हाशिये पर होने की वजह से इसके नेतृत्व में विपक्षी एकता का सपना कैसे देखा जा सकता है?  हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन राज्यों के जितने भी क्षेत्रीय दल हैं वे सभी कांग्रेस का जनाधार खिसका कर ही ताकतवर बने हैं। मगर इन दोनों राज्यों में जिस प्रकार राजनीति का जातिकरण और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है उससे  राज्य के आम नागरिक आजिज आ चुके हैं और खुली हवा में सांस लेने को तरस रहे हैं। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी काे उत्तर प्रदेश से 20 सीटों पर सफलता मिली थी, इसकी वजह एक ही थी कि उस चुनाव में  संकीर्णता की दीवारें ढही थीं और राष्ट्रीय मुद्दे जैसे अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार पर आम जनता के बीच बातचीत हुई थी। ममता दी स्वयं विचार करें कि इन चुनावों में उनके कितने प्रत्याशी प. बंगाल में जीते थे? अतः क्षेत्रीय दलों की एकता का राष्ट्रीय स्तर पर तभी असर हो सकता है जबकि भाजपा जैसे मजबूत व इसके नरेन्द्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता के सामने कोई ठोस विकल्प हो और जनता का जिस पर भरोसा जम सके। ममता दी केवल क्षेत्रीय दलों की एकता अपने नेतृत्व में करके क्या हासिल कर सकती हैं? वह राज्यों की आंतरिक नीतियों का विस्तार राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक नहीं कर सकतीं। उसके लिए कांग्रेस के वैचारिक आधार की जरूरत होगी जिसके आधार पर उसने इस देश को साठ वर्ष तक चलाया है। किसी भी क्षेत्रीय दल के पास समग्र राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों से जूझने की कूव्वत कैसे हो सकती है जबकि उनकी राजनीति ही संकीर्ण जातिगत व समुदायगत व क्षेत्रीय मसलों तक सीमित रही है। अतः ममता दी को फिलहाल गोवा की राजनीति को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस को कोसना जरूरी लग रहा हो मगर इस हकीकत से वह कैसे मुह मोड़ सकती हैं कि प. बंगाल में भी उनका जो जनाधार है वह मूल रूप से कांग्रेस का ही जनाधार है।