मणिपुर : डगर नहीं आसान

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मणिपुर में एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली पहली भाजपा सरकार ने ध्वनिमत से विश्वासमत साबित कर दिया है लेकिन उसके सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं। भाजपा को ऐसे समय पर मणिपुर में सत्ता मिली है, जबकि राज्य लम्बे समय से जातीय तनाव की मार झेल रहा था। यह राहत की बात है कि सरकार को विश्वासमत प्राप्त करने से पहले ही राज्य में लगभग 5 माह से चल रही आर्थिक नाकेबंदी खत्म हो गई। केन्द्र, राज्य सरकार और नगा समूहों में हुई त्रिपक्षीय वार्ता के बाद आर्थिक नाकेबंदी खत्म करने की घोषणा की गई। बीरेन सरकार ने यूएनसी नेताओं को बिना शर्त रिहा करने, नगा जनजातीय नेताओं और छात्र नेताओं के खिलाफ चल रहे मामलों को खत्म करने की मांग स्वीकार कर ली है। आर्थिक नाकेबंदी से आम मणिपुरियों को काफी दिक्कत हो रही थी। पैट्रोल पम्पों पर लम्बी कतारें लगती थीं और एलपीजी का सिलेंडर 2000 रुपए में बिक रहा था और दालों और सब्जियों के भाव दुगुने हो गए थे। 1981 से 1988 के बीच राज्य सरकार ने यू.एन.सी. और आल नगा स्टूडैंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर जैसे नगा संगठनों के साथ चार एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे। इनमें कहा गया था कि सभी हितधारकों से सलाह-मशविरा किए बगैर नगाओं की पैतृक जमीन पर कोई भी प्रशासनिक बदलाव नहीं किया जाएगा। फिर 2011 में केन्द्र सरकार ने भी इस बारे में आश्वासन दिए थे। इंफाल घाटी में मणिपुर की कुल आबादी के 59 फीसदी लोग रहते हैं और इनमें मुख्य रूप से मेतई समुदाय के हैं। पहाडिय़ों में 18 फीसदी नगा और 8 फीसदी कुकी लोग रहते हैं। राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से 40 घाटी में हैं। विधानसभा चुनावों पर निगाहें रखते हुए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने 7 नए जिले बनाने का ऐलान कर दिया।
इबोबी सिंह कहते रहे कि 7 नए जिलों का गठन प्रशासनिक सुविधाओं के लिए है और उन्होंने वह कर दिखाया जो पिछली कोई भी सरकार नहीं कर पाई लेकिन प्रतिक्रिया काफी विपरीत हुई। यूनाइटेड नगा कौंसिल ने राज्य में आर्थिक नाकेबंदी शुरू कर दी। यूएनसी को लगा कि यह फैसला नगा इलाकों को विभाजित करने की कोशिश है। भाजपा की नई सरकार के सामने इस मसले को हल करने का भारी दबाव था। इसकी वजह थी कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक चुनावी रैली में आर्थिक नाकेबंदी खत्म करने का वादा कर चुके थे। वैसे इस मसले को हल करने का तरीका यह है नगा इलाकों में बनाए गए जिलों का फैसला वापस लेना लेकिन ऐसा करने से मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग एनसीसीएन (आईएम) के दबाव के आगे झुकने के तौर पर देख सकते हैं। मणिपुर में नगाओं की मांग है कि नगा बहुल जिलों को मिलाकर वृहद नगालैंड बनाया जाए। पहले वह अलग राज्य की मांग करते रहे और अपनी बात मनवाने के लिए आर्थिक नाकेबंदी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। मणिपुर को देश से जोडऩे वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों एनएच-2 और एनएच-37 पर कई बार नाकेबंदी की गई जिससे मणिपुर का जनजीवन बदहाल हुआ। राज्य में आवश्यक वस्तुओं जैसे ईंधन, दवाइयों, सब्जी, दूध, राशन की भारी कमी हो गई। 7 नए जिलों की घोषणा पर नगाओं की दलील है कि यह जमीन उनकी पैतृक सम्पत्ति है। ऐसे में इबोबी सरकार उनसे सलाह-मशविरा किए बिना अलग जिलों का गठन नहीं कर सकती। ऐसा करने से उनके हित प्रभावित हो सकते हैं। नगालैंड को राज्य का दर्जा मिलने के बाद से ही नगाओं का एक गुट अलग होने की मांग करता रहा है। असल में मणिपुर में तीन जनजातियों का प्रभुत्व है। इनमें से एक मैतेई है जो राज्य के मैदानी इलाकों में रहती है। दूसरी कुकी जनजाति है जो पहाड़ी क्षेत्रों में रहती है। तीसरी नगा जनजाति है लेकिन उसका राज्य सरकार पर हमेशा दबाव बना रहता है। बीरेन सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस राज्य के सभी समुदायों के लिए आपसी स्वीकार्य रास्ता तलाशने की है। क्योंकि यूनाइटेड कौंसिल ऑफ मणिपुर ने सरकार को चेतावनी दे रखी है कि वह नए जिले बनाने के फैसले को वापस न ले। भाजपा लम्बे समय से मैतेई पहचान की सरक्षा की मांग की राजनीति करती रही है। पार्टी यह भी कहती रही है कि वह राज्य के मैदानी इलाकों में रहने वाले प्रवासियों की बढ़ती आबादी से चिंतित है। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 या किसी अन्य एक्ट को बढ़ाने की जरूरत है ताकि मणिपुर में बाहर से आने वाले प्रवासी श्रमिकों की संख्या को नियंत्रित रखा जा सके। मणिपुर की कांग्रेस सरकार ने 2016 में तीन विधेयक पेश किए थे। तब यह कहा गया था कि ये विधेयक लागू होने पर घाटियों में इनर लाइन परमिट सिस्टम की तरह प्रभावी होंगे, लेकिन बिलों का पहाड़ी क्षेत्रों पर रहने वाले लोगों ने विरोध किया, वे इसे अपने अधिकारों पर कुल्हाड़ी से वार मान रहे थे। इनर लाइन परमिट सिस्टम भी बड़ा मुद्दा रहा है।
केन्द्र की मोदी सरकार ने एनएससीएन (आईएम) के साथ शांति समझौता तो किया लेकिन भाजपा इस समझौते के कारण अपनी अंगुलियां जला चुकी है। कांग्रेस ने इस समझौते में बरती गई गोपनीयता को मुद्दा बना दिया था। कांग्रेस ने इस राज्य की अखंडता के साथ किए गए समझौते को षड्यंत्र के तौर पर पेश किया था। यही कारण रहा कि इसी मुद्दे ने भाजपा को मणिपुर में पूर्ण जीत से रोक दिया। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समझौते के बिन्दू सार्वजनिक होने पर क्या प्रतिक्रिया होती है। ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जिसमें सभी स्वीकार्य हल की ओर बढ़ें। नई सरकार और भाजपा को फूंक-फूंक कर चलना होगा।

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