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त्रिपुरा में अभिव्यक्ति का अर्थ?

त्रिपुरा में हुए साम्प्रदायिक दंगों की तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने और फिर उसे जनता तक पहुंचाने व प्रशासन को जगाने के लिए जिस तरह इस राज्य की पुलिस ने पत्रकारों व वकीलों समेत सामाजिक संगठनों के कुछ सदस्यों के ​खिलाफ आतंक विरोधी कानून ‘यूएपीए’ के तहत मुकदमें दर्ज किये हैं, वे भारत के महान व उदार और खुले लोकतन्त्र की सुनिश्चित परंपराओं व नियमों के अनुकूल नहीं हैं और अनावश्यक रूप से पुलिस के अति क्रियाशील होने की गवाही देते हैं जबकि किसी भी दृष्टि से दंगों के बारे में राय रखने वालों ने भारत की एकता, अखंडता व संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने या चुनौती देने की कोशिश नहीं की है। सांप्रदायिक सौहार्द को बनाये रखने की दृष्टि से कानून-व्यवस्था को सुचारू व काबू में रखना पुलिस का कर्त्तव्य होता है परन्तु उसे संविधान के तहत ही यह दायित्व पूरा करना होता है। लोकतन्त्र में आलोचना का मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत प्रत्येक नागरिक को मिला होता है मगर इसमें एक ही प्रतिबन्ध है कि विचार के नाम पर हिंसा का प्रचार-प्रसार नहीं किया जा सकता। 

भारत में हिसंक विचारों को फैलाने पर सख्त प्रतिबन्ध है और इसके लिए दोषी व्यक्ति कानूनी कार्रवाई का तलबगार होता है। संविधान के अनुच्छेद 19( ए) में जिस अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार दिया गया है उसी के तहत प्रेस की स्वतन्त्रता भी आती है। यह स्वतन्त्रता लोकतन्त्र में इतनी महत्व रखती है कि प्रत्येक राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए इसी का उपयोग करके सत्ता की खामियों को उजागर करते हैं। वैसे यह भी संयोग ही कहा जायेगा कि अनुच्छेद 19 में संविधान लिखने वाले डा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के कानून मन्त्री रहते ही पहला संविधान संशोधन भारत की प्रथम लोकसभा के गठन से पूर्व ही किया गया था। यह संशोधन प्रस्ताव प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू लेकर आये थे जिसमें यह प्रावधान था कि हिंसा फैलाने के उपक्रम के विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के दायरे में नहीं रखा जायेगा। 

इस संशोधन पर उस समय डा. अम्बेडकर ने कहा था कि ‘अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त भारत के  लोकतन्त्र में विचार व्यक्त करने की छूट देते समय मैं हिंसा के मुद्दे को भूल ही बैठा था’  मगर पंडित नेहरू के उस समय के इस संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में किसी और ने नहीं बल्कि हिन्दू महासभा के नेता एन.सी. चटर्जी की अगुवाई में पीयूसीएल नागरिक संस्था ने ही चुनौती दी थी जिसे विद्वान न्यायाधीशों ने रद्द कर दिया था। अतः यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत में संविधानतः किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप में, चाहे वह दो समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने की गरज से हो अथवा क्षेत्रीय रंजिश पैदा करने की गरज से हो, हिंसक विचार व्यक्त करने की छूट नहीं है। मगर त्रिपुरा के मामले में चार वकीलों का एक दल साम्प्रदायिक दंगों की असलियत की तह में जाने की गरज से इस राज्य के दौरे पर गया था और उसने वहां जो जमीनी हकीकत देखी उसे एक प्रेस कान्फ्रेंस में बयान कर दिया और कहा कि दंगाइयों को सत्ता की ओर से खुली छूट मिलने व पुलिस द्वारा त्वरित आवश्यक कानूनी कार्रवाई न करने की वजह से त्रिपुरा में एक विशेष समुदाय के लोगों के खिलाफ हिंसा व आगजनी हुई और उनके धार्मिक स्थलों को भी फूंकने की घटनाएं हुईं। इससे भी ऊपर उनकी पवित्र धार्मिक पुस्तक को भी निशाना बनाया गया। एक पत्रकार ने यह ट्वीट कर दिया कि ‘त्रिपुरा जल रहा है’ तो उसके खिलाफ भी यूएपीए पुलिस ने लागू कर दिया। मगर पत्रकारों को साम्प्रदायिक दंगों की रिपोर्टिंग करते समय बहुत सावधानी और होशियारी से काम लेना होता है। 

इसी स्वतन्त्र भारत में तीन दशक पहले तक यह अलिखित नियम और आचार संहिता थी कि किसी भी फिरका परस्त दंगों के दौरान नागरिकों की पहचान उनके धर्म से नहीं की जायेगी बल्कि केवल उन्हें एक धार्मिक समूह के लोगों से सम्बोधित किया जायेगा। इसके साथ ही किसी भी धर्म के पवित्र स्थलों या पुस्तकों के अपमान को उसके नाम के साथ नहीं लिखा जायेगा। यह सब इसीलिए था जिससे लोग इनके बारे में पढ़-सुन कर भड़के नहीं और दंगा किसी दूसरे स्थान पर न फैले। मगर अब ये सब अवरोध समाप्त हो चुके हैं और नई पीढ़ी के पत्रकार एेेसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का खुल कर खुलासा और वर्णन करते हैं। पत्रकार की पहली और मूल जिम्मेदारी जनता या लोगों के प्रति होती है और वह जो भी लिखता या टीवी पर दिखाता है वह जनहित की दृष्टि से ही होता है। मगर त्रिपुरा रिपोर्टिंग करने पहुंची दो युवा टीवी पत्रकारों ने ट्वीट करके कह दिया कि त्रिपुरा में ‘कुरान शरीफ’ को आग की नजर किया गया। इसकी असली वजह यह है कि पत्रकारों ने अपनी दूरगामी जनहित व राष्ट्रीय हित की सोच को ताक पर रख दिया है। मगर इन दोनों महिला पत्रकारों के खिलाफ त्रिपुरा पुलिस का संगीन मामलों में मुकदमा दर्ज करना भी अनुचित है क्योंकि पूरे देश में पत्रकारों ने जब यह छूट ले रखी है तो इनका मामला अलहदगी में कैसे लिया जा सकता है। 

मगर असली सवाल यह है कि त्रिपुरा में दंगे फैलाने वालों और एक धर्म विशेष के लोगों के खिलाफ जहरीली नारेबाजी करके साम्प्रदायिक हिंसा का माहौल तैयार करने वालों के ​खिलाफ पुलिस ने अभी तक क्या कार्रवाई की? यह देश सभी हिन्दू-मुसलमानों का है और सभी के पास बराबरी के अधिकार हैं अतः पुलिस का कर्त्तव्य  बनता है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखते हुए संविधान के अनुसार काम करे और उसका यह कार्य राजनीति से ऊपर उठ कर इस तरह हो कि आम जनता को लगे कि पुलिस अपनी तरफ से कानून के शासन को हर हाल में रखना चाहती है। पुलिस केवल संविधान की गुलाम होती है क्योंकि संविधान की शपथ लेकर ही पुलिस अधिकारी अपने काम का आगाज करते हैं।