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महबूबा का ‘खान’ मिथक

प्रख्यात सिने अभिनेता शाहरुख खान के पुत्र आर्यन खान की जमानत पर सुनवाई एक दिन के लिए और टल गई है। इस मामले में जो अदालती कार्यवाही हो रही है उसे शक की नजर से इसलिए नहीं देखा जा सकता क्योंकि आर्यन को गिरफ्तार करने वाली सरकारी एजेंसी नारकोटिक्स ब्यूरो और आर्यन के वकील अपने-अपने नजरिये से कानूनी पक्ष रख रहे हैं। बेशक अदालती कार्यवाही लम्बी हो रही है और आर्यन को अन्य आरोपियों के साथ हिरासत में अदालत के आदेश पर ही रखा गया है परन्तु जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमन्त्री व इस सूबे की प्रमुख राजनीतिक पार्टी पीडीपी की नेता श्रीमती महबूबा मुफ्ती का यह कहना पूर्णतः अनुचित व न्यायप्रक्रिया की तौहीन करने वाला है कि आर्यन को उसके नाम के साथ लगे ‘खान’ उपनाम की वजह से गिरफ्तार किया गया है। निसन्देह यह कथन नारकोटिक्स ब्यूरो की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाता है और सन्देश देता है कि देश में सरकारी एजेंसियां नागरिकों का धर्म देख कर मुकदमे दर्ज करती हैं जो कि भारत के लोकतन्त्र के तहत काम रही स्वतन्त्र न्यायप्रणाली को चुनौती देने वाला जैसा है। श्रीमती मुफ्ती जम्मू-कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण राज्य की मुख्यमन्त्री रह चुकी हैं और बखूबी जानती हैं कि भारत का शासन संविधान से ही चलता है।  संविधान से बाहर जाकर देश की किसी एजेंसी की मजाल तो क्या कोई चुनी हुई सरकार भी काम नहीं कर सकती। आर्यन खान को नशीले पदार्थओं के सेवन और इन पदार्थों का व्यापार करने वाले लोगों के साथ सम्पर्क रखने के आरोप में नारकोटिक्स ब्यूरो ने गिरफ्तार किया है। हालांकि आर्यन के पास से किसी नशीले पदार्थ को जब्त नहीं किया गया है मगर उसे नशे के व्यापार में संलिप्त लोगों के सम्पर्क में रहने की वजह से बन्दी बनाया गया है। यह पूरी तरह कानून के विशेषज्ञों के अधिकार क्षेत्र में आता है कि वे आर्यन को इस अपराध के लिए किस तरह का खतावार मानते हैं मगर उसके मुस्लिम पिता व हिन्दू मां के पुत्र होने से उसके कथित अपराध का किसी प्रकार का लेना-देना कैसे हो सकता है। भारत तो वह महान लोकतान्त्रिक देश हैं जिसमें मुस्लिम नागरिकों के आरोपी या अपराधी होने पर आधी रात को भी सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खुलवा कर न्याय की गुहार लगाई गई है।

 न्याय के मामले में हिन्दू-मुसलमान का भेद करना सर्वथा देश की संवैधानिक व्यवस्था के भीतर स्वतन्त्र न्याय प्रणाली को निशाने पर लेना है जिसकी इजाजत किसी भी व्यक्ति को नहीं दी जा सकती। यदि नारकोटिक्स ब्यूरो ने इस नजरिये से आर्यन खान को गिरफ्तार किया है तो अदालत में सबूतों और कानूनी तर्कों के आधार पर उसके परखचे उड़ना स्वाभाविक है क्योंकि उसकी कार्रवाई द्वेष या रंजिश पर आधारित रही है। अतः महबूबा साहिबा को अदालत के फैसले का इन्तजार करना चाहिए था जहां कानून अपना काम सूरत देख कर नहीं बल्कि सबूतों की असलियत और दफाओं को देख कर करेगा। श्रीमती महबूबा को मालूम ही होगा कि फौजदारी कानून भारत के सभी धर्मों के नागरिकों पर एक समान रूप से लागू होता है। हमारे दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने यह फैसला इस हकीकत के बावजूद लिया था कि संविधान में मुस्लिम नागरिकों के लिए अपनी नागरिक आचार संहिता (मुस्लिम पर्सनल ला) है। भारत की जितनी भी कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियां हैं सभी में भर्ती की प्रणाली भी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है। फिर भी यदि कहीं कोई गड़बड़ी करने की कोशिश करता है तो उसकी तसदीक अदालत में हो जाती है क्योंकि किसी भी एजेंसी के पास पूर्ण न्यायिक अधिकार नहीं है और अंततः किसी आरोपी पर लगाये गये आरोपों की जांच अदालत में ही होती है जहां आरोपी पक्ष को अपने हक में कानून के जानकार वकीलों को खड़ा करने की खुली इजाजत होती है। महबूबा जी को यह बताने की जरूरत नहीं है कि पुलिस द्वारा कथित आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में पकड़े गये कितने ही मुस्लिम नागरिक अदालतों से बाइज्जत बरी होकर आये हैं, हां यह बात दीगर है कि उन पर आतंकवाद के आरोप लगने के बाद उनकी जिन्दगी दोजख में बदल गई जिसकी भरपाई कोई भी एजेंसी नहीं कर सकती। अतः आर्यन के मामले में भी सब्र से काम लेते हुए न्यायप्रणाली पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। बेशक इससे आर्यन के पिता शाहरुख खान की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचा है और उनकी छवि खराब हुई है जिसकी भरपाई किसी कानूनी नुक्ते की मोहताज हो सकती है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि आर्यन केवल 23 वर्ष का युवा है और वह उम्र की रौ में बुरी संगत में पड़ सकता है। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि नशा हिन्दू या मुसलमान देख कर नहीं चढ़ता है और बुरी संगत धर्म देख कर नहीं बनती है। हो सकता है कि आर्यन की आयु बहुत कम होने की वजह से सामान्य भारतीय नागरिकों की सहानुभूति उसके साथ हो मगर सत्य तो यही है कि वह बुरी संगत में पकड़ा गया है। अतः न्यायप्रणाली  को सभी आयामों पर विचार करके अपना फैसला देने का इन्तजार किया जाना चाहिए।