पूरे भारत में जिस तरह महिलाओं द्वारा अपने पूर्व कर्मियों पर शारीरिक यौन शोषण के आरोप लग रहे हैं, उनसे यह तो सिद्ध हो रहा है कि हमारे समाज में स्त्री को कमजोर मानने की मानसिकता प्रत्येक क्षेत्र में है और उसकी शारीरिक कमनीयता भी प्रत्येक वर्ग के लोगों को आकर्षित करती है परन्तु यह सिद्ध नहीं हो रहा है कि स्त्री वर्तमान समय में भी ‘अबला’ है। यह भाव तब ज्यादा उग्र हो जाता है जब पुरुष आदेशात्मक स्थिति में होता है और उसके नियन्त्रण में वे परिस्थितियां होती हैं जिनके भीतर स्त्री और पुरुष दोनों काम करते हैं। स्त्री की सुन्दरता प्राकृतिक देन होती है जिससे उसकी प्रतिभा का प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा लेना-देना नहीं होता है।

दिक्कत तब आती है जब स्त्री की इसी प्रकृति प्रदत्त विशेषता को प्रतिभा का पर्याय मान लिया जाता है। अभी तक फिल्म जगत से लेकर राजनितिक व संगीत क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं ने अपने उन पुराने सहयोगियों पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं जिनका सम्बद्ध क्षेत्रों में अपना भारी रुआब-दाब था परन्तु इस प्रकार की घटनाओं को उजागर करने को हम यदि कोई महिला आंदोलन समझने की भूल करते हैं तो यह प्रतिभाशाली महिलाओं के लिया ही अंततः नुक्सानदायक हो सकता है और समूचे कार्य क्षेत्रों में महिला कर्मियों के लिए अनावश्यक रूप से सन्देह पैदा कर सकता है। इसलिए हमें प्रत्येक आरोप को सख्त जांच से गुजारना होगा और तय करना होगा कि कहीं यह एेसी प्रवृत्ति का रूप न ले ले जिसमें अपनी कमजोरियों को छिपाने का ही किसी को बहाना मिल सके। जहां तक फिल्म जगत का सवाल है उसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पर इस प्रकार के आरोप बड़ी बेबाकी के साथ लगे हैं और कुछ नामचीन लोगों को सजा तक का सामना करना पड़ा है परन्तु भारत के सन्दर्भ में यह ध्यान रखना होगा कि चकाचौंध की इस दुनिया में परिस्थितियां तेजी के साथ बदली हैं।

खासकर टी.वी. सीरियलों की बाढ़ आने के बाद इस छोटे पर्दे पर चमकते सितारों की भी अलग पहचान बनने लगी है और इसके आर्थिक लाभ भी फिल्म के समानान्तर कम नहीं आंके जाते हैं। चकाचौंध की दुनिया की नैतिकता को प्रायः अलग श्रेणी में रखकर देखा जाता है मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस उद्योग में काम करने वाली महिलाओं को उपभोक्ता वस्तु समझ लिया जाए। बेशक बहुत से अंतरंग दृश्य कहानी और पटकथा की मांग होते हैं परन्तु यह सब पर्दे तक ही सीमित रहता है। जब इसमें विकृत भाव पैदा होता है तो वैसी घटनाएं बढ़ने का अन्देशा बढ़ जाता है जैसा आरोप एक जमाने की फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर लगाया अथवा ​िवन्ता नन्दा ने कलाकार आलोक नाथ पर लगाया परन्तु केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी मान लेना भी उचित नहीं होगा क्योंकि जिस भी क्षेत्र में आरोपित व्यक्ति कार्यरत है उसे केवल बदनाम करके उसके जीवन जीने के अधिकार को काटा या छांटा नहीं जा सकता है। यह उसके आजीविका के आधार से जुड़ा हुआ प्रश्न है जिससे उसके जीवनयापन के अधिकार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है परन्तु राजनीति के क्षेत्र में यह नियम लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें कार्यरत लोग पूरी तरह सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं से बंधे रहते हैं और उनका कोई भी गलत आचरण समूची व्यवस्था व सामाजिक संरचना पर प्रभाव डालता है।

राजनीति में केवल उसी व्यक्ति को आने का आधार है जिसका जीवन एक खुली किताब की तरह हो और उसका दिन-रात केवल जनता की सेवा के लिए हो। क्योंकि उसकी जिम्मेदारी की सीमाएं किसी अन्य पेशे के ताकतवर इंसान से बहुत ज्यादा होती हैं और उसका जीवन जनसेवा के प्रति समर्पित इस प्रकार होता है कि वह संविधान की शपथ लेकर अपने काम को अंजाम देता है। यदि उसके वर्तमान पर भूत की काली छाया इस प्रकार पड़ती है कि उसकी छवि दागी लगने लगे तो उसकी विश्सनीयता समाप्त हो जाती है। इस सन्दर्भ में विदेश राज्यमन्त्री पर उनकी छह पूर्व पत्रकार सहयोगियों ने जो आरोप लगाए हैं, वे संजीदा माने जाएंगे जिससे उनका पूरा पत्रकारिता जीवन आशिक मिजाजी की गवाही दे रहा है।

बेशक ये केवल आरोप ही हैं जिनकी बाकायदा जांच होनी चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति जितने बड़े पद पर होता है उसकी जिम्मेदारियां भी उतनी ही बड़ी होती हैं। राजनीतिज्ञों का कोई निजी जीवन लोकतन्त्र में नहीं होता। एेसा मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था और स्पस्ट किया था कि केवल उन्हीं व्यक्तियों को इस क्षेत्र में आना चाहिए जिनका पूरा जीवन सदाचार का रहा हो और जो अपने निजीपन को भी जनता के नाम करने के लिए तैयार हों। वैसे भी एक पत्रकार का धर्म सच को पाताल से भी ढूंढ कर लाने का होता है अतः मंत्री अपने ऊपर लगे आरोपों की तह में इसी आधार पर जाना चाहिए इसके बावजूद यह दो व्यक्तियों के बीच घटे मामले हैं जिनकी गवाही स्वयं वे ही दे सकते हैं। कुछ मामलों में अपवाद भी हो सकता है अतः एेसे मामलों को कोई आन्दोलन मान लेना मूलतः गलत होगा और स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों के बीच अविश्वास पैदा करने वाला माना जाएगा।