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संपादकीय

मोदी मिशन और जल संकट

भारत में जल को लेकर एक तरफ ‘जल संकट’ और दूसरी तरफ ‘जलमग्न’ होने की विरोधाभासी स्थिति बनती रहती है। उसके मूल में ‘जल-प्रबन्धन’ है। इसका प्रमाण यह है कि नव स्वतन्त्र भारत में 1951 में देश की कुल 33 करोड़ आबादी के ​लिए प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष जहां 5177 घन मीटर जल की उपलब्धता थी वहीं  2025 तक यह घटकर 1371 घन मीटर रह जायेगी जबकि तब तक भारत की आबादी 130 करोड़ से ऊपर निकल चुकी होगी। पानी संकट पर संसद से लेकर सड़क तक चिन्ता स्वाभाविक है और इसी समस्या को पहचानते हुए प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी नई सरकार में पृथक जल शक्ति मन्त्रालय का गठन भी किया है किन्तु यह भी हकीकत है कि भारत में प्यासे को पानी पिलाना बहुत पुण्य का काम समझा जाता है। 

जिस प्रकार समूची सृष्टि में तीन भाग जल और एक भाग पृथ्वी है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में भी 70 प्रतिशत जल और 30 प्रतिशत अन्य पदार्थ होते हैं। पंचतत्वी शरीर का यह वैज्ञानिक भाव है जो पूर्णतः प्रकृति के व्यवहार पर टिका हुआ है। अतः हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वरुण देवता की आराधना का क्रम गणेश वन्दना के बाद आता है। इस्लाम में भी जल के व्यय को बहुत सावधानीपूर्वक करने की हिदायत है। इसके साथ ही भारत भूमि के मरुस्थल कहे जाने वाले राजस्थान को हिन्दू मान्यता के अनुसार वरदान प्राप्त है कि इसमें कभी भी जल की कमी नहीं होगी। आखिरकार इन सभी धार्मिक मान्यताओं का आधार क्या है? 

इन सभी का आधार पूर्णतः वैज्ञानिक है जिसकी जड़ में ‘जल प्रबन्धन’ है। संसद में इस विषय पर चली बहस में पर्यावरण पर चिन्ता करने वाले श्री अनुपम मिश्र की जल संचय सम्बन्धी पुस्तक का जिक्र कई सांसदों ने किया और जल शक्ति मन्त्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि उन्होंने यह पुस्तक भी पढ़ी है। इसमें जल प्रबन्धन की जो भी जनप्रचलित विधियां बताई गई हैं वे प्रायः सभी राजस्थान के सम्बन्ध में ही हैं। बाड़मेर-जैसलमेर के मरू स्थानों में पोखरों के जरिये वर्षा के पानी के जल संचयन से लेकर शेखावटी इलाके में घरों की छत पर वर्षा जल का संचयन करके लोग साल भर की जल व्यवस्था करते थे। 

ये परिपाटियां समाज के सुसंस्कृत होने के साथ ही पनपी हैं। भारतीय संस्कृति में कई राज्यों में किसी भी शुभ कार्य के अवसर पर पोखर पूजने का प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। किसी भी परिवार में नवविवाहिता के गर्भवती होने पर उसके द्वारा कुआं पूजने की परंपरा जल के महत्व को ही रेखांकित करती है। इन्हें हम आधुनिकता के जोश में रूढि़वादी परंपराएं कह सकते हैं मगर इनका वैज्ञानिक मनोरथ है। सभ्यताओं के विकास का जल से गहरा सम्बन्ध बताता है कि जल प्रबन्धन का महत्व आदिकाल से रहा है। यह सब लिखने का मन्तव्य केवल यह है कि वैज्ञानिकता के दौर में भी प्रकृति पर निर्भरता को निर्मूल नहीं किया जा सकता। 

जिस प्रकार गुजरात में नर्मदा का पानी घर-घर पहुंचाने में मुख्यमन्त्री रहते हुए श्री नरेन्द्र मोदी ने सफलता प्राप्त की थी उसका अनुसरण करने में अन्य राज्यों को क्या तकलीफ हो सकती है, बशर्तें उनके पास अविरल जल स्रोत मौजूद हों। भारत का मध्यकालीन इतिहास गवाह है कि किस तरह मध्यप्रदेश के बरहामपुर से लेकर दक्षिण भारत के किलों में जलापूर्ति के साधन निर्मित किये गये थे परन्तु समय बहुत बदल चुका है और हमें अब नई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल जल प्रबन्धन में करना होगा किन्तु इस तरह नहीं जिस तरह मुम्बई महानगर पालिका करती है। पूरे भारत में यदि किसी महानगर पालिका में खुली लूटपाट और डाकेजनी का नजारा देखना है तो बरसात के मौसम में मुम्बई की सैर कर आइये, खुद ही पता चला जायेगा कि खुदा छप्पर फाड़कर किस तरह देता है।

पिछले एक साल में इस महानगरपालिका ने मुम्बई की सड़कों से जल भराव समाप्त करने के लिए 1600 करोड़ रु. खर्च किये जो केवल दो दिन की बरसात में सड़कें ही निगल गईं और मुम्बई वासी जल विहार करने को मजबूर हो गये लेकिन भारत के लगभग हर राज्य की नगरपालिका की हालत कमोबेश ऐसी ही है। जिस देश में हजार के लगभग छोटी-बड़ी नदियां बहती हों और बरसात में उफान मारकर जल-थल एक कर देती हों अगर उस देश में पानी की कमी रहती है तो इसे हम क्या कहेंगे? जाहिर है बढ़ती आबादी के हिसाब से हमने जल प्रबन्धन को बहुत हल्के में लिया है और गांव-गांव में पैदा हुई ‘प्रापर्टी डीलरों’ की नई नस्ल ने राजनैतिक भ्रष्टाचार में प्रभावी शिरकत करके उन जल संग्रह स्थलों को बरबाद कर दिया है जो कुदरत की कृपा से समाज के समझदार लोगों ने बनाये थे। 

इसके साथ ही विकास का जो ढांचा हमने अंगीकार किया है वह लगातार प्रकृतिजन्य स्रोतों को मुफ्त में मिली खैरात की तरह खर्च कर रहा है। जिस तरह भूजल स्तर पूरे भारत में तेजी से गिर रहा है वह इसी का प्रमाण है। यह बेवजह नहीं है कि महात्मा गांधी ने आदमी की लालसा को देखते हुए ही कहा था कि ‘प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएं तो पूरी कर सकती है मगर उसके लालच की वह भरपाई नहीं कर सकती’  लेकिन अब सवाल यह है कि हम जल संकट से कैसे मुक्ति पायें? एक योजना नदियों को जोड़ने की भी है परन्तु इससे जल मार्गों की नैसर्गिक प्राकृतिक सम्पदा के समाप्त होने का भारी खतरा है। हमने नहरों और बान्धों का निर्माण भी खासी संख्या में किया है परन्तु इसके समानान्तर जल संचयन को नजरन्दाज किया है और वृक्षों को काटने में तीव्रता दिखाते हुए बागों और जंगलों को बस्तियों में बदल डाला है जिससे जमीन की जल ग्राह्य क्षमता कम होती गई है। 

इस मामले में भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमन्त्री का यह कहना कि प्रत्येक चुनाव क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर पांच पेड़ लगाने का काम उनकी पार्टी के कार्यकर्ता लें, अच्छी शुरूआत हो सकती है और राजनीति में समाज की चिन्ता को स्थापित कर सकता है परन्तु यह कार्य सिर्फ अखबारों में फोटो छपवाने के लिए नहीं होना चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि जल संचयन और प्रबन्धन की योजना पंचायत स्तर से शुरू करके महापालिका स्तर तक लागू की जाये और प्रत्येक पंचायत व पालिका को वर्षा का जल संचय करने की सुविधाएं जुटाने का ढांचा खड़ा करने के साथ ही सौर ऊर्जा उत्पादन का तन्त्र खड़ा करने की पहल भी राज्य सरकारों की मदद से करनी चाहिए। ये दोनों ही ढांचे ग्रामीण रोजगार गारंटी नियम के तहत लागू करने पर जोर दिया जाना चाहिए और ग्रामीण विकास, पंचायत व जल शक्ति मन्त्रालय का इस सन्दर्भ में एकीकृत प्रयास होना चाहिए।