कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के लिए मतदाताओं का जो निर्णय आया है उसमें केन्द्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक स्थान प्राप्त हुए हैं। इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार को दिया जा सकता है क्योंकि उन्होंने ही अन्तिम दो सप्ताहों में इस राज्य में 21 चुनाव रैलियां करके मजबूत और लोकप्रिय कहे जाने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्री श्री सिद्धारमैया के चुनावी गणति को उलट-पुलट कर दिया। बेशक उनकी सरकार के खिलाफ सत्ताविरोधी भाव आम जनता में दिखाई नहीं दे रहा था मगर श्री मोदी ने जिस प्रकार से चुनावी मुद्दों को पलट कर पूरे राजनीतिक विमर्श का रुख बदला उससे उनके चातुर्य का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसके साथ ही चुनाव प्रचार के अन्तिम दौर में जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने अनावश्यक रूप से अपने भावी प्रधानमंत्री बनने के सवाल को खड़ा किया उसे भी कर्नाटक की जनता ने अच्छा नहीं समझा क्योंकि चुनाव राज्य विधानसभा के लिए हो रहे थे। केन्द्रीय मन्त्री श्री रविशंकर प्रसाद के इस मत से सहमत होने में किसी को कोई भी दिक्कत इसलिए नहीं होनी चाहिए क्योंकि राज्य के चुनावी मैदान में श्री सिद्धारमैया श्री मोदी को सीधी चुनौती दे रहे थे मगर भाजपा की यह राह आसान नहीं रही है क्योंकि इसके पास राज्य स्तर पर कोई एेसा नेता नहीं था जिसे आगे रखकर यह कांग्रेस का मुकाबला कर सकती हालांकि इसके पास तीन-तीन पूर्व मुख्यमन्त्री थे।

बेशक इसने श्री बी.एस. येदियुरप्पा को मुख्यमन्त्री के प्रत्याशी के तौर पर पेश किया था मगर प्रधानमंत्री के साथ चुनाव प्रचार के मंच पर वह एक या दो रैलियों में ही नजर आए। भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी रणनीति यह रही कि उसने भ्रष्टाचार को मुद्दा नहीं बनने दिया दूसरी तरफ कांग्रेस की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि वह श्री मोदी के कर्नाटक में प्रवेश करते ही प्रतिरोधी एजैंडा खड़ा नहीं कर पाई। बिना शक राज्य में चुनाव प्रचार के स्तर में गिरावट दर्ज हुई मगर कोई भी पार्टी भाजपा के जातिगत गणित व हिन्दुत्व के एजैंडे की काट नहीं ढूंढ सकी।

चुनाव प्रचार के अन्तिम दौर में जिस तरह घटनाएं घटीं उनसे लोगों में यह भावना भी घर करती गई कि जीतने के लिए धन का प्रयोग खुलकर हो रहा है। इसके साथ लिंगायत सम्प्रदाय के लोगों को गैर-हिन्दू बता कर अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिद्धारमैया की रणनीति पूरी तरह आत्मघाती साबित हुई और इससे हिन्दू सम्प्रदाय की गोलबन्दी का रास्ता ही प्रशस्त हुआ। इसके बावजूद भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का इतना अन्तर नहीं बन पाया कि भाजपा अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत लाने में सफल हो पाती मगर सबसे बड़ी पार्टी उभरने के लिए वह बधाई की पात्र इसलिए है क्योंकि भंग विधानसभा में उसके केवल 40 सदस्य ही थे।

अतः श्री मोदी की कड़ी मेहनत का ही यह असर कहा जा सकता है कि उन्होंने अंत में कांग्रेस के पिछले शासन के प्रति सत्ता विरोधी भाव पनपा दिया। दूसरी तरफ बादामी सीट से खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं के बहुत नजदीक माने जाने वाले श्रीरामालू को सिद्धारमैया ने हराकर यह सिद्ध कर दिया कि आम मतदाता जमीनी हकीकत से नावाकिफ नहीं हैं मगर त्रिशंकु विधानसभा के गठित होने से नई सरकार के गठन में कई पेंच खड़े हो सकते हैं जिन्हें सुलझाने की जिम्मेदारी राज्यपाल वज्जूभाईवाला की होगी। खंडित जनादेश आने पर सबसे कड़ी परीक्षा राज्यपाल की ही होती है और उन्हें संविधान के अनुसार काम करना पड़ता है।

कई राज्यों में खंडित जनादेश आने पर यह परंपरा तोड़ दी गई है कि सबसे बड़े दल को ही सबसे पहले सरकार बनाने की दावत दी जानी चाहिए और उससे विधानसभा के पटल पर सीमित समयावधि में अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा जाना चाहिए मगर राज्यपाल का यह संवैधानिक कर्तव्य होता है कि वह किसी भी स्तर पर विधानसभा को विधायकों की मंडी न बनने दें अर्थात खरीद-फरोख्त का बाजार गर्म न होने दें। वह अपने विवेक से स्थिर सरकार गठित करने के सारे प्रयास इस प्रकार करते हैं कि संवैधानिक शुचिता बनी रहे मगर राज्यपाल का सबसे बड़ा दायित्व यह होता है कि हर हालत में जनमत का सम्मान हो।

त्रिशंकु विधानसभा के आने पर यह विश्लेषण करना सबसे कठिन कार्य होता है इसीलिए राज्यपाल सरकार की स्थिरता को भी संज्ञान में लेते हैं मगर नई सरकार के बारे में अब कुछ समय लग सकता है हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर भाजपा ने दक्षिण भारत के दरवाजे में अपने वजूद के पुख्ता सबूत दे दिये हैं। क्योंकि 2008 में भी वह यहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और उसने अपनी सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की थी। इस सरकार का कार्यकलाप जनापेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा था जिसकी वजह से 2013 में कांग्रेस की सरकार गठित हुई थी मगर श्री मोदी के प्रचार ने पूरी बाजी को इस तरह पलटा कि मतदाताओं ने फिर से इसी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया। हालांकि उनकी राह में भी कांटे बहुत थे अतः जीत की बधाई।