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संपादकीय

माननीयों की निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधियों की सम्पत्ति में बेतहाशा बढ़ौतरी पर अपने आदेश का पालन नहीं किए जाने को लेकर केन्द्र सरकार को फटकार लगाई है। साथ ही उसने एक वर्ष पहले के इस आदेश पर कानून मंत्रालय के विधायी सचिव से दो हफ्ते के भीतर जवाब भी मांगा है। याचिकादाता एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले वर्ष 16 फरवरी के आदेश का पालन नहीं करने का आरोप लगाया था। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि सांसदों और विधायकों की सम्पत्ति में बेतहाशा बढ़ौतरी पर निगाह रखने के लिए सरकार को एक स्थायी निगरानी तंत्र बनाना चाहिए लेकिन सरकार ने आज तक इस पर कुछ नहीं किया। जब भी चुनाव आते हैं, ऐसे मुद्दे उठने शुरू हो जाते हैं और चुनावों के बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। सियासत अब तिजारत बन गई है।

संवैधानिक आदर्शों के अनुसार भले ही जनप्रतिनिधि लोकसेवक होते हैं परन्तु इस सच्चाई से सब परिचित हैं कि सांसद, विधायक या मंत्री बनकर कई नेता अपनी सम्पत्ति बढ़ाने के सारे संसाधन जुटा लेते हैं। ऐसे आंकड़े अब चौंकाने वाले नहीं रहे कि जनप्रतिनिधि बन किसने अपनी सम्पत्ति में बढ़ौतरी की। बहुत से पार्टी कार्यकर्ता समाज के सामने उदाहरण हैं जिन्होंने निगम पार्षद बनने के बाद महलनुमा सम्पत्ति खरीद ली, मंत्रियों की तो बात छोड़ दें। पिछले वर्ष आदेश देते समय देश की सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की थी कि ‘‘जनता द्वारा निर्वाचित विधायिका के सदस्यों द्वारा बेतहाशा सम्पत्ति जमा करना लोकतंत्र के असफल होने का सूचक है और अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो हमारा लोकतंत्र तबाह हो जाएगा और माफिया शासन के लिए रास्ता खुल जाएगा।’’

चुनावों के दिनों में ऐसी खबरें हवाओं में तैरने लगती हैं कि राजनीतिक दल टिकटों की बिक्री करते हैं। कभी सुनने में आता है कि फलां आदमी दो करोड़ में टिकट लाया तो कोई पांच करोड़ में। कभी-कभी तो यह राशि कई करोड़ बताई जाती है। राष्ट्रीय दल की टिकटों के लिए भी पार्टी फंड में चंदा देना पड़ता है। इस लिहाज से चुनाव इतने महंगे हो गए हैं कि गरीब आदमी की तो कोई पूछ ही नहीं रह गई। यहीं से होती है लोकतंत्र के भ्रष्ट होने की शुरूआत। जो चुनावों में करोड़ों लगाएगा, आखिर उसे पूरा कैसे किया जाए? यही प्राथमिकता निर्वाचित प्रतिनिधियों की होती है। इसके लिए अनैतिक हथकंडों का इस्तेमाल किया जाता है।

चुनाव समेत विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में धन और बल का इस्तेमाल तथा इस अवैध खर्च की भरपाई के लिए विधायिका और कार्यपालिका में मिले पद का दुरुपयोग ऐसी चुनौतियां हैं कि इससे छुटकारा पाए बिना स्वस्थ लोकतंत्र की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इस अहम मसले पर भी संसद और चुनाव आयोग ने कोई ध्यान ही नहीं दिया। आयकर विभाग की सर्वोच्च संस्था केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने भी एक बार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर माना था कि कई लोकसभा सांसदों और अनेक विधायकों की सम्पत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है। तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता को ज्ञात संसाधनों से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने पर सजा हुई थी और उन्हें मुख्यमंत्री पद गंवाना पड़ा था। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यदि 10 जुलाई 2013 को दिए ऐतिहासिक फैसले में यह व्यवस्था न दी होती कि दागी व्यक्ति जनप्रतिनिधि नहीं हो सकता तो शायद जयललिता सजा के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन रहतीं।

न्यायालय के इस फैसले के मुताबिक यदि किसी जनप्रतिनिधि को आपराधिक मामले में दोषी करार देते हुए दो वर्ष से अधिक की सजा सुनाई गई हो तो वह व्यक्ति सांसद या विधायक बना नहीं रह सकता और आने वाले 10 वर्ष तक चुनाव भी नहीं लड़ सकता। इस फैसले की गाज लालू प्रसाद यादव, कांग्रेस नेता रशीद मसूद और राजद सांसद जगदीश शर्मा पर गिर चुकी है। चुनाव में नामांकन के समय भी उम्मीदवार सम्पत्ति का आधा-अधूरा ब्यौरा ही देते हैं। हमारे देश की काफी आबादी गरीबी में और कम आमदनी में गुजारा करती है।

सामाजिक और आर्थिक विषमता को पाटने और सर्वांगीण विकास की आशा को पूरा करने के लिए प्रयास करने और नेतृत्व देने का उत्तरदायित्व विधायिका और कार्यपालिका पर है। यदि राजनीतिक भ्रष्टाचार की अनदेखी की गई तो फिर कोई उपाय ही नहीं रह जाएगा। चुनाव आयोग को और शक्तिशाली बनाने और चुनाव सुधार के लिए कानून बनाने के विधि आयोग के सुझाव लम्बे समय से सरकार के पास पड़े हुए हैं। जनप्रतिनिधि कानून के उल्लंघन करने के अनेक मामले कोर्ट में जाते हैं तो निपटारे में बहुत समय लगता है, तब तक जनप्रतिनिधि अपना कार्यकाल पूरा कर लेते हैं। देश में बनने वाली नई सरकार को माननीयों पर निगरानी के लिए तंत्र बनाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।