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न्याय की हत्या

झारखंड के धनबाद में आटो से टक्कर मार कर जिला एवं सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद की हत्या से एक ओर पूरा देश स्तब्ध है वहीं न्यायपालिका से जुड़े लोग भी आक्रोश में हैं और दुखी भी हैं। लोकतांत्रिक देश भारत में अपराधों को सहन नहीं ​किया जा सकता। जो सीसीटीवी फुटेज में दिखाई दिया उससे स्पष्ट है-

-यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार है।

-यह न्यायपालिका को कमजोर बनाने की साजिश है।

-यह हत्या देश में बढ़ते अपराधीकरण का प्रमाण है।

-यह न्यायपालिका को आतंकित करने और दबाव बनाने का षड्यंत्र है।

अपराधियों को सजा देने और लोगों को न्याय देने के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और दबाव मुक्त होना बहुुत जरूरी है। अगर अपराधी ऐसे ही जजों की हत्या करेंगे तो फिर कोई न्याय कैसे कर पाएगा।

एडीजे उत्तम आनंद की हत्या से दो दिन पहले राजधानी रांची के रड़गांव में अधिवक्ता मनोज झा की हत्या की गई थी। राज्य में कानून व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति नागालैंड से भी बदतर हो गई है। अपराधियों पर कोई लगाम नहीं है। उनके अन्दर कानून का डर नहीं। जज उत्तम आनंद की हत्या के मामले में मौखिक रूप से कहा कि सीसीटीवी फुटेज देखते हुए कोई भी बच्चा भी देखेगा तो बता सकता है कि पीछे से धक्का लगेगा तो आगे के बल गिरेगा लेकिन जज आनंद बाईं तरफ कैसे गिरे जरूर कोई आटो में बैठा हुआ था जिसने जज पर हमला किया। पोस्टमार्टम से यह तथ्य भी सामने आया है कि जज के सिर पर चोट की गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि धनबाद के एमपी का बंगला घटनास्थल से मात्र 150 मीटर की दूरी पर है। धनबाद सदर थाना उस स्थान से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। खुद न्यायाधीश उत्तम आनंद का आवास भी घटनास्थल से कुछ ही कदमों की दूरी पर है, लेकिन लहूलुहान जज सड़क के किनारे दो घंटे पड़े रहे। चोरी के आटो से जज को टक्कर मारने वाले ड्राइवर लखन वर्मा और राहुल वर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया है, उन्होंने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया है, लेकिन वारदात का मास्टरमाइंड कौन है, इसका पता लगाना बहुत जरूरी है। मामला बहुत गम्भीर है, अगर किसी अपराधी को जमानत नहीं देने या किसी अपराधी को सजा सुनाने की वजह से जज को निशाना बनाया गया है तो इससे कानून के शासन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर सीसीटीवी फुटेज नहीं मिलती तो पुलिस इसे सामान्य दुर्घटना ही मान लेती।

यदि इसी तरह जजों की हत्या होती रही तो फिर न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है। अपराधियों का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि वे अपने हिसाब से फैसले चाहते हैं। न्यायपालिका किसी भी तरह से खौफ और दबाव में न हो यह सुनिश्चित करना स्वयं न्यायपालिका के साथ-साथ कार्यपालिका और विधायिका का भी है। आटो से टक्कर मारने वाला पहले भी कई बार जेल जा चुका है, वहीं दूसरी ओर इस घटना को एक नेता रंजय सिंह की हत्या और उस केस की सुनवाई से जोड़ कर देखा जा रहा है। रंजय सिंह धनबाद के बाहुबली परिवार सिंह मेशन के करीबी थे। जनवरी 2017 में रंजय सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या के बाद ही मार्च 2017 में धनबाद के ही पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या कर दी गई थी। जज उत्तम आनंद ने बीते दिनों सुनवाई के दौरान आरोपी अमन सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अमन सिंह की जमानत याचिका खारिज होने के चंद दिनों बाद इस घटना से शक की सुई अमन सिंह गैंग की ओर मुड़ गई है। फिर भी अंतिम सच क्या है इसका पता तो ईमानदारी से की गई जांच से पता चलेगा।

जज उत्तम आनंद गैंगस्टरों समेत कई महत्वपूर्ण केसों की सुनवाई कर रहे थे। हत्या के तार किस-किस से जुड़े हैं यह पता लगाना अब जांच के लिए गठित एसआईटी की जिम्मेदारी है। जज की हत्या कराने वाले अपराधी जांच में हर तरह से रोड़े अटकाने का काम भी कर सकते हैं। यह सवाल भी लोग उठा रहे हैं कि क्या इस देश में जज भी सुरक्षित नहीं हैं? अगर वे सुरक्षित नहीं हैं तो फिर आम लोगों की क्या बिसात। 

भारत में न्याय को एक देवी के रूप में चित्रित किया जाता है, जिसकी दोनों आंखों में काली पट्टी बंधी है और हाथ में तराजू है, जो सत्य और असत्य के दो पलड़ों का द्योतक है। आंखों में पट्टी इसलिए है कि उसे बड़े और छोटे शक्तिशाली, प्रभावशाली और कमजोर तथा गरीब से कोई मतलब नहीं। न्याय बस न्याय है। जज उत्तम आनंद के परिवार को इंसाफ दिलाना सबका दायित्व होना चाहिए। अगर जज ही सुरक्षित नहीं फिर न्यायपालिका की गरिमा का क्या होगा? अगर न्यायपालिका की साख नहीं बची तो फिर प्रजातंत्र भी नहीं बच सकेगा।