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संपादकीय

नगा शांति वार्ता : क्या समाधान होगा

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जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद नागालैंड में फिर अलग झंडे और संविधान की मांग उठने लगी है। केन्द्र सरकार का स्टैंड स्पष्ट है वह नागालैंड के लिए अलग झंडे या संविधान की मांग को कतई स्वीकार नहीं करेगी। केन्द्र सरकार 31 अक्तूबर तक नगा शांति प्रक्रिया को पूरा कर लेना चाहती है। शांति वार्ता से उम्मीद लगाए बैठे नगा लोग उपवास रख रहे हैं। इस बात काे लेकर संशय है कि क्या शांति वार्ता बिना किसी बाधा के पूरी हो जाएगी क्योंकि शांति प्रक्रिया में शामिल उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड इसाक-मुइबा गुट ने राज्य के लिए अलग झंडे और अलग संविधान की मांग उठाकर केन्द्र के लिए समस्या खड़ी कर दी है। 

नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता सम्भालने के बाद ही अगस्त 2015 में मुख्य वार्ताकार आर.एन. रवि की मध्यस्थता में आतंकी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के प्रमुख थुईगलेंग मुइबा के साथ समझौता कर लिया था। समझौते का कोई ब्यौरा सामने नहीं लाया गया। सवाल यह भी है कि कश्मीर के अलगाववादी राष्ट्रवादी नहीं हैं तो क्या नागालैंड के उग्रवादी राष्ट्रवादी हैं? पूर्वोत्तर के राज्य नागालैंड की समस्या को लेकर शांति प्रक्रिया पिछले 22 वर्षों से चल रही है। सबसे बड़ा मुद्दा पूर्वोत्तर के नगा बहुल इलाकों का एकीकरण करने का है। देश की आजादी के बाद से यह राज्य उग्रवाद की चपेट में रहा है। 

राज्य की जनजातियों ने कभी भारत में विलय को स्वीकार ही नहीं ​ि​कया। नागालैंड के ज्यादातर लोग खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते। उनका तर्क यह है कि ब्रिटिश कब्जे से पहले यह एक स्वतंत्र इलाका था। अंग्रेजों के भारत छोड़ देने के बावजूद इस राज्य ने खुद को स्वाधीन घोषित कर दिया था। एक दिसम्बर 1963 को नागालैंड भारत का 16वां राज्य बना। नागालैंड पूर्व में म्यांमार, पश्चिम में असम, उत्तर में अरुणाचल और दक्षिण में मणिपुर से सटा है। महाभारत में भी इस राज्य का उल्लेख मिलता है। 

देश के आजाद होने पर नगा कबीलों ने संप्रभुता की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। इस दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिससे निपटने के लिए उपद्रवग्रस्त इलाकों में सेना तैनात की गई। उसके बाद से 1957 में केन्द्र सरकार और नगा गुटों के बीच शांति बहाली या आम राय बनी। इस सहमति के आधार पर असम के पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले तमाम समुदायों को एक साथ लाया गया। इसके बावजूद इस इलाके में उग्रवादी गतिविधियां जारी रही हैं। 1963 में पहली बार इस राज्य में चुनाव कराए गए। 1975 में उग्रवादी नेताओं ने हथियार डाल कर भारतीय संविधान के प्रति आस्था जताई थी लेकिन यह शांति कछ दिनों की रही। 

1980 में राज्य के सबसे बड़े उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड का गठन किया गया। यह संगठन शुरू से ही असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा बहुल इलाकों को मिलाकर नगालिम यानी ग्रेटर नागालैंड के गठन की मांग करता रहा है। यह संगठन अब भी कह रहा है कि केन्द्र ने समझौते में यह बात स्वीकार कर ली है कि नगा बहुल इलाकों का एकीकरण नगाओं का वैध अधिकार है। यदि एकीकरण नहीं हुआ तो शांति वार्ता का मकसद ही विफल हो जाएगा। मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने भी नगा बहुल इलाकों का मुद्दा उठा दिया है। दरअसल असम, अरुणाचल और मणिपुर की सरकारें इसका विरोध कर रही हैं। इन राज्यों की आशंकाएं गहराने लगी हैं। 

इस मुद्दे पर पहले ही काफी हिंसा हो चुकी है।  इन राज्यों के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार किसी भी कीमत पर राज्य का नक्शा नहीं बदलने देगी। शांति प्रक्रिया में मध्यस्थता कर रहे आर.एन. रवि नागालैंड के राज्यपाल बन चुके हैं। वह जल्द से जल्द नागालैंड समस्या के समाधान के इच्छुक हैं। एनएससीएन के अध्यक्ष मुइबा भी जानते हैं कि भारत सरकार एक प्रभुसत्ता सम्पन्न नगालिम की घोषणा कर देगी। केन्द्र सरकार जो कश्मीर में आतंकवादियों से बातचीत करने को तैयार नहीं हुई, वह संविधान के दायरे से बाहर जाकर प्रभुसत्ता की बात को कैसे स्वीकार करेगी। 

मोदी सरकार नागालैंड के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कई कदम उठा सकती है। इस बात की आशंका है कि नागालैंड समस्या के समाधान के लिए कई वर्षों से चली आ रही शांति प्रक्रिया का कोई हल निकलेगा। एनएससीएन ने आरोप लगाया है कि केन्द्र शांति प्रक्रिया में शामिल 7 अन्य दलों को ज्यादा तरजीह दे रहा है। जब तक समझौते के प्रावधानों का ब्यौरा सामने नहीं आता तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता। अटकलों और अफवाहों का बाजार गर्म है लेकिन नागालैंड समस्या ज्यों के त्यों बनी हुई है।