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तीन तलाक पर नया कानून ?

तीन महीने पहले जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार देते हुए इसे गैर इस्लामी बताया था और स्पष्ट किया था कि वह धार्मिक दायरे में दखलन्दाजी किये बिना इस प्रकार की रवायत को मजहबी कानून का हिस्सा नहीं मानती है तो स्पष्ट था कि एक ही बैठक में तीन बार तलाक कहकर अपनी पत्नी को घर से बाहर निकालने का अधिकार मुस्लिम समाज के पुरुष खो देंगे, किन्तु इसके बावजूद यह रवायत जारी है जिसकी वजह से सरकार इस बारे में एक कठोर कानून लाने पर विचार कर रही है।

केन्द्र की मोदी सरकार यह कानून संसद के शीतकालीन अधिवेशन के दौरान लाना चाहती है जो संभवतः दिसम्बर महीने के आखिरी पखवाड़े में गुजरात में मतदान होने के बाद बुलाया जा सकता है। जाहिर है सरकार द्वारा विधेयक लाने की घोषणा की मंशा से राजनीितक नफा-नुकसान भी जोड़कर देखा जाएगा। यही वजह है कि मुस्लिम संगठन भी इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं और कुछ इसे स्टंट तक करार देने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूखी ने तो यहां तक कह दिया कि न्यायालय के फैसले के बाद नया कानून लाने की कोई जरूरत ही नहीं है, जबकि कुछ दूसरे संगठनों ने इसका विरोध नहीं किया है।

अतः दीगर सवाल यह है कि क्या नया कानून लाने से तीन तलाक की शिकार महिलाओं को राहत मिलेगी? इसी से जुड़ा हुआ सवाल है कि यदि तीन तलाक कहकर अपनी पत्नी से छुटकारा पाने वाले पुरुष पति को जेल में डालने का प्रावधान ले आया जाये तो उससे क्या पत्नी को उसके ही घर में बाइज्जत तरीके से रहने में कोई कठिनाई पेश नहीं आयेगी? दरअसल तीन महीने पहले सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने दो के विरुद्ध तीन के बहुमत से तीन तलाक को गैर-कानूनी या असंवैधानिक बताया था और दो अल्पमत में रहे न्यायाधीशों ने इसे मजहबी मामला बताते हुए कहा था कि सरकार यदि इसे खत्म करना चाहती है तो वह संसद के माध्यम से नया कानून लाए।

जाहिर है कि किसी भी गैर-संवैधानिक कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए किसी न किसी दंड का प्रावधान होना चाहिए, किन्तु इसके साथ ही यह सवाल खड़ा होता है कि जब तीन तलाक को देश का कानून नहीं मानता तो उसे मानने की जिद करने वाले के साथ क्या किया जाये और एेसी सूरत में पत्नी या महिला को न्याय किस प्रकार दिलाया जाए? असल में मुस्लिम महिलाएं इस प्रथा के विरुद्ध अपने घरेलू व नागरिक अधिकारों की मांग कर रही हैं। उनकी यह दलील रही है कि एक ही बैठक या एक ही बार में तीन बार तलाक कह देने भर से शौहर उन्हें अपनी जिन्दगी से बेदखल किस तरह कर सकता है। इसे तलाक-ए-बिद्दत के दायरे में किस नुक्ते से डाला जा सकता है, जबकि धार्मिक कानून शरीया में इसका तरीका अलग बताया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय का दखल केवल यहीं तक है और इसने इसी आधार पर तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। अब इससे आगे यदि किसी प्रकार का नया कानून बनाया जाता है और केवल तीन तलाक को केन्द्रित करके ही बनाया जाता है तो वह संविधान के उस दायरे में प्रवेश करके ही बनाया जा सकता है जिसमें किसी भी व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार धर्म का अनुपालन करने की छूट है। इस तरफ अल्पमत में रहे दो विद्वान न्यायाधीशों ने भी तीन महीने पहले अपना फैसला देते हुए साफ किया था कि उनकी राय में एेसा करने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना होगा जिसे करने में केवल संसद ही सक्षम है।

यह बहुत पेचीदा मसला है। वैसे घरेलू हिंसा के ​िलए बने फौजदारी कानूनों के दायरे से मुस्लिम समाज भी बाहर नहीं है। तीन तलाक को मानने वाले शौहरों को इन कानूनों की गिरफ्त में भी मुस्लिम औरतें ला सकती हैं मगर इस मामले में सरकार से भी ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी खुद मुस्लिम समाज की है कि वह खुद अपने मजहबी कानूनों में यह संशोधन करें कि तीन तलाक की शिकायत करने वाली महिलाओं के साथ पूरा न्याय किया जायेगा और इस्लामी कानून के तहत जो भी काजी होते हैं वे इस रवायत को जड़ से खारिज करते हैं मगर यह मानना गलत होगा कि एेसी परिवार से खारिज की गई महिलाएं हिन्दू समाज में नहीं हैं। बेशक उन्हें तीन तलाक नहीं कहा जाता मगर किसी दूसरी वजहों से उन्हें बेघर कर दिया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दू समाज में बेघर हुई औरतों की संख्या मुस्लिम औरतों से ज्यादा थी मगर मुस्लिम समाज में तो तीन तलाक को तीन महीने पहले तक उनका समाज मान्यता देता था। अतः असली फर्क यहीं है।