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संपादकीय

कांग्रेस की नैया के नये खिवैया?

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देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के भीतर का यह घटनाक्रम स्वागत योग्य है कि पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह को पार्टी की रणनीतिक गतिविधियों के सेनापति के रूप में आगे करने की पहल की गई है। शर्त केवल यह है कि यह पहल पार्टी के ‘समकालीन सन्दर्भों’ तक सीमित न रहकर समग्र ‘स्वरूप मंथन’ के शिखर पर पहुंचनी चाहिए। डा. सिंह ने जिस तरह कल मुम्बई में वीर सावरकर से लेकर जम्मू-कश्मीर में धारा 370 समाप्त किये जाने के बारे में कांग्रेस पार्टी के पूर्व रुख से हट कर संशोधित मार्ग अपनाया और देश की आर्थिक स्थिति व डगमगाती अर्थव्यवस्था  पर वर्तमान मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है उससे यही ध्वनि निकलती है कि कांग्रेस पार्टी उस परिवारवाद के दायरे से मुक्ति की राह पर चलने के लिए विवश है जो इसके स्वरूप को लगातार सीमित करता जा रहा है। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी आज भी कांग्रेस ही है चाहे लोकसभा में इसकी सदस्य संख्या बेशक 54 ही हो परन्तु डा. मनमोहन सिंह को वैचारिक व रणनीतिक सिपहसालार के रूप में पार्टी द्वारा पेश किये जाने का गंभीर अर्थ भी है। 

1991 में आर्थिक उदारवाद की शुरूआत करने वाले डा. मनमोहन सिंह ने कांग्रेस का वह आधारभूत रास्ता बदल दिया था जिसे आजादी के बाद प. जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने पूरी निष्ठा के साथ अपनाते हुए भारत की विकास की आधारशिला रखी थी किन्तु 1991 की स्थिति के लिए निश्चित रूप से डा. मनमोहन सिंह जिम्मेदार नहीं थे। 1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद से लेकर 1991 में श्री राजीव गांधी की हत्या होने तक भारतीय राजनीति के जो तेवर बदले थे उनमें आर्थिक वरियताएं धरातल पर पहुंच गई थी और सामाजिक व धार्मिक कलह से कराहते भारत की अर्थव्यवस्था  वी. पी. सिंह की 11 महीने की सरकार के दौरान रुक-रुक कर सांसें लेने लगी थी और इसके बाद चन्द्रशेखर की छह महीने की सरकार के दौरान इसने इस तरह दम तोड़ा कि इस सरकार के वित्तमन्त्री ‘महामहोपदेशक’ श्रीमान यशवन्त सिन्हा  15 दिनों की आयात जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ करोड़ डालर लेकर आये थे। 

अतः 1991 के चुनावों के बाद जब नरसिम्हाराव प्रधानमन्त्री बने तो उन्हें वित्त सचिव व रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे डा. मनमोहन सिंह की याद आयी और उन्हें अपना वित्तमन्त्री बना कर उन्होंने नेहरू के रास्ते से अलग जाने का ढीकरा उनके सिर फोड़ते हुए तय किया कि भारत की आम जनता के बीच नया शगूफा बना ‘भुगतान सन्तुलन का संकट’ अब वे ही दूर करेंगे। राजनीति से दूर रहने वाले मनमोहन सिंह ने यह चुनौती इतनी सादगी से स्वीकार की कि लोग कहने लगे कि नरसिम्हाराव कैसा ‘निराला खऱा सिक्का’ निकाल कर लाये हैं कि उछालने पर वह ‘खनकता’ तक नहीं है। 

शायद यही डा. मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी खूबी थी कि उन्होंने देखते-देखते ही आर्थिक चुनौतियों को भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार हल करते हुए ऐसा नया रास्ता तैयार किया जिससे हटने का विकल्प किसी भी राजनीतिक दल की सरकार के लिए संभव नहीं था, अतः भारत की विकास वृद्धि दर की बातें विश्व मंचों तक पहुंचने लगीं और 2004 में जब पुनः कांग्रेस के हाथ में सत्ता आयी तो वह निर्विवाद रूप से प्रधानमन्त्री चुने गये और इस पद पर दस वर्ष तक रहे। हालांकि कांग्रेस पार्टी के 2014 के लोकसभा चुनावों में रसातल में जाने के लिए भी उन्हीं की सरकार में हुए विभिन्न वित्तीय घोटालों को जिम्मेदार बताया गया और उनकी छवि एक ऐसे कमजोर प्रधानमन्त्री की बनी जिसकी सदारत में जिस मन्त्री का जो मन करता था वह वैसा ही करता रहता था परन्तु स्वयं डा. सिंह सादगी की प्रतिमूर्ति ही समझे गये। 

अब कांग्रेस के सबसे बुरे दौर में यदि वह ‘संकट मोचक’ के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं तो मानना होगा कि उनका व्यक्तित्व इतना उजला है कि विपक्षी नेता के रूप में  उन्हें निशाने पर लेना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। हालांकि प्रधानमन्त्री के तौर पर उनकी आलोचना करना किसी भी विपक्षी पार्टी के लिए सबसे आसान काम इसलिए था क्योंकि वह कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की निजी पसन्द माने जाते थे परन्तु अब यही समीकरण विपक्ष के नेता के रूप में ठीक विपरीत चित्र प्रस्तुत करेगा। 

अतः डा. मनमोहन सिंह का यह कहना कि वर्तमान खराब होती अर्थ व्यवस्था और बैंकों की बिगड़ती हालत के लिए उनके कार्यकाल पर दोष मढ़ना ‘मात्र पुराने समय को कोस कर अपना दामन बचाना है', कई मायनों में महत्वपूर्ण है क्योंकि मनमोहन शासनकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के काम में हस्तक्षेप करने की इजाजत किसी संसद सदस्य तक को नहीं थी और लोकसभा में खड़े होकर तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने कुछ सांसदों की ऐसी शिकायत पर सीधा जवाब देते हुए कहा था कि “बैंकों के कामकाज से आपका कोई मतलब नहीं होना चाहिए। वे विशुद्ध वाणिज्यिक आधार पर प्रतियोगी माहौल में काम करते हैं और उनकी देख-रेख के लिए रिजर्ब बैंक है जिसकी हिदायतें उन्हें माननी पड़ती हैं। 

अतः आप बैंकों को अपना काम पूरे पेशेवर तरीके से करने दें, उनके काम में हस्तक्षेप करने का अधिकार हमें नहीं है।” इसके साथ ही वीर सावरकर को भारत रत्न दिये जाने सम्बन्धी मांग पर डा. सिंह का यह कथन महत्वपूर्ण है कि सावरकर जी का कांग्रेस पार्टी सम्मान करती है। इंदिरा जी ने 1970 में उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया था परन्तु उनकी हिन्दुत्व की राजनीति पर हमारा मतभेद है। इसी प्रकार 370 के बारे में डा. मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक रूप से पहली बार भाजपा अध्यक्ष और गृहमन्त्री अमित शाह के इस बयान पर मुहर लगाई कि यह प्रावधान संविधान में ‘अस्थाई’ तौर पर जोड़ा गया था। कांग्रेस सिद्धान्तः इसे समाप्त करने के खिलाफ नहीं है मगर इसे हटाने के तरीके पर इसके मतभेद जरूर रहे हैं। 

जाहिर है कि कांग्रेस अब एक बार फिर से डा. मनमोहन सिंह को ही आगे रख कर ‘विचारधारागत संशोधन’ करना चाहती है। वस्तुतः यह बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप सैद्धान्तिक परिमार्जन है और डा. सिंह इसके स्वाभाविक प्रणस्ता कहे जा सकते हैं। उनका परिवर्तनकारी मार्ग इतना ‘बेआवाज’ होता है कि पास बैठे ‘दिग्विजय सिंह’ जैसे नेता को भी पता नहीं चल पाता कि ‘आइना बिना बदले ही सूरते कैसे बदल गई।’