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कर्नाटक के नाटक का अगला चरण!

कर्नाटक में येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही भाजपा की सरकार बन गई यानि राज्य में कमल फिर खिल गया है। राज्य की एक साल सवा महीने पुरानी कांग्रेस-जनता दल (सै.) की मिलीजुली एच.डी. कुमारस्वामी सरकार सत्ता से हट चुकी है मगर सबसे मजेदार तथ्य यह है कि राज्य विधानसभा के उन 13 कांग्रेसी सदस्यों के भविष्य का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष ने अभी तक नहीं किया है जो मूल रूप से इस नाटक के सूत्रधार थे विधानसभा अध्यक्ष ने केवल तीन विधायकों को अयोग्य ठहराया है। 

इन विधायकों के इस्तीफा देने की वजह से ही कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ गई थी। दरअसल बहुमत को अल्पमत में बदलने की जिस ‘इस्तीफा टैक्नोलोजी’ का इस्तेमाल कर्नाटक में सीना ठोक कर हुआ है उससे लोकतन्त्र ही लहूलुहान हुआ है और कर्नाटक का वह मतदाता बुरी तरह ठगा गया है जिसने एक वर्ष पहले ही चुनावों में अपना जनादेश दिया था। यह जनादेश किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं था जिसकी वजह से यहां दो दलों की सांझा सरकार गठित हुई थी। लोकतन्त्र में गठबन्धन सरकारों का गठन असामान्य नहीं होता है परन्तु जब वैचारिक स्तर पर बेमेल गठबन्धन होता है तो उसका परिणाम सुखद नहीं होता है। 

इसका उदाहरण स्वयं भारतीय जनता पार्टी भी है जिसका जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबन्धन अन्ततः टिकाऊ साबित नहीं हुआ था। कर्नाटक में स्वयं बड़ी पार्टी होते हुए भी कांग्रेस ने सरकार की बागडोर उस जनता दल (सै.) के नेता कुमारस्वामी के हाथ में दे दी थी जिनकी पार्टी के उससे आधे से भी कम विधायक चुने गये थे। जाहिर है कि राजनीति में यह मजबूरी का गठबन्धन था क्योंकि चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर विधानसभा में आयी थी परन्तु यह पार्टी भी पिछले वर्ष सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी होने के फितूर में राजनैतिक रूप से गच्चा खा गई थी और केवल छह दिन के लिए अपने नेता ई.एस. येदियुरप्पा को मुख्यमन्त्री बनवा कर विपक्ष में बैठने को इसलिए मजबूर हो गई थी कि इसका सदन में बहुमत नहीं जुट सका था। 

वर्तमान में सदन में भाजपा के पक्ष में 105 सदस्य और कांग्रेस-जद गठबन्धन के 99 सदस्य हैं जबकि 13 सदस्यों की किस्मत अध्यक्ष श्री के.आर. रमेश अपनी मुट्ठी में बन्द किये बैठे हैं। यदि गौर से देखा जाये तो सदन के भीतर भाजपा की स्थिति अचानक मजबूत हो गई है। दो निर्दलीय विधायक भी हालांकि शक्ति परीक्षण के समय सदन में नहीं आये थे और उन्होंने पहले ही भाजपा को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी। जाहिर है कि 224 सदस्यीय विधानसभा में 17 स्थान खाली ही रहेंगे क्योंकि एक सदस्य के निधन से जगह खाली है।

अतः 16 विधायकों के इस्तीफा मंजूर होने या दलबदल विरोधी कानून के तहत इनकी सदस्यता समाप्त करते हुए इनके छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगाने के विकल्प खुले हुए हैं परन्तु राजनीति के धुरंधर घाघ माने जाने वाले अध्यक्ष श्री रमेश अब सरकार गिर जाने के बाद इनका इस्तीफा स्वीकार करना ज्यादा पसन्द करेंगे जिससे भाजपा की रणनीति में शुरुआत में ही सेंध लग जाये और नई भाजपा सरकार में इन सभी को मन्त्री बनाने का भार उसके कंधों पर आ पड़े। ऐसा होते ही भाजपा के भीतर भी वही अंतर्द्वन्द शुरू हो जायेगा जिसकी वजह से कुमारस्वामी सरकार गिरी है। 

भाजपा के टिकट पर जीत कर आये विधायकों की मन्त्री बनने की आकांक्षा को दबाया नहीं जा सकता है और 17 स्थानों के लिए जब भी उपचुनाव होंगे तभी पार्टी के भीतर गुटबाजी के पैंतरे शुरू हो जायेंगे। गुटबाजी पर अब केवल कांग्रेस का ही एकाधिकार नहीं रह गया है बल्कि सत्ता के साथ ही यह गुण सत्ताधारी पार्टी में आ जाता है। बेशक श्री येदयुरप्पा कर्नाटक में भाजपा के कद्दावर नेता हैं मगर उन्हीं की पार्टी में उनके कद को चुनौती देने वाले भी मौजूद हैं लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू बहुत दिलचस्प है, यदि अध्यक्ष रमेश बागी विधायकों को दलबदल के लपेटे में ले लेते हैं तो राज्य में कांग्रेस पार्टी की साख को जबर्दस्त बट्टा लगेगा और मतदाताओं का विश्वास चुनाव में खड़े होने वाले इसके प्रत्याशियों से उठ जायेगा। 

इस्तीफा स्वीकार होने की सूरत में भाजपा की संभावित सरकार में इनके शामिल किये जाने पर भाजपा की साख मतदाताओं के सामने ढीली पड़ जायेगी जबकि दूसरी तरफ यदि राज्य में मध्यावधि चुनाव होते हैं तो भाजपा के पक्ष में मतदाताओं की सहानुभूति होगी क्योंकि कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने उनके साथ धोखा किया है। अतः कर्नाटक का नाटक अभी खत्म नहीं हुआ है। यह एकांकी नाटक नहीं है बल्कि इसके कई चरण हैं, अब दूसरा चरण शुरू हो रहा है जिसमें राज्यपाल की भूमिका केन्द्र में रहने वाली है। 

राज्यपाल दूध के जले हैं जो अब छाछ भी फूंक-फूंक कर पियेंगे क्योंकि पिछले साल श्री येदियुरप्पा को कुर्सी पर बिठा कर वह देख चुके हैं कि उनकी क्या छीछालेदर हुई थी। इतना ही नहीं नई सरकार बनने पर नये अध्यक्ष का चुनाव भी होगा अतः अभी और इंतजार करना पड़ेगा कि अगले चरण के नाटक का प्रथम दृश्य कैसा होगा ? राज्यपाल को यह तो देखना ही होगा कि जो भी सरकार बने वह स्थायी हो।