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नीतीश बाबू का अन्तिम चुनाव

बिहार के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार ने राज्य विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों के प्रचार के अन्तिम दिन यह कह कर सभी को आश्चर्य में डाल दिया है कि ये चुनाव उनके अन्तिम चुनाव होंगे। नीतीश बाबू के इन तेवरों से लगता है कि वह बिहार की जनता से अपने इस अन्तिम चुनाव में दया-दृष्टि बनाये रखने की फरियाद कर रहे हैं। वैसे चुनावों में प्रत्येक नेता जनता या मतदाताओं से एेसी ही फरियाद करता है, परन्तु नीतीश बाबू सत्तारूढ़ एनडीए गठबन्धन की तरफ से चुनावों के बाद भी मुख्यमन्त्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किये जा रहे हैं, इसलिए उनका यह कथन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। विरोधी पक्ष महागठबन्धन के नेता उनके इस कथन को उनकी कमजोरी बता रहे हैं और कह रहे हैं कि नीतीश बाबू अपनी जीत अपने काम के बूते पर नहीं बल्कि दया के बूते पर करना चाहते हैं। राजनीति में एेसे बयान अनपेक्षित नहीं होते हैं। इसी तरह का बयान चुनावी अखाड़े में घुमा-फिरा कर राजद के नेता श्रीमान लालू प्रसाद ने भी 2000 के विधानसभा चुनावों में दिया था। हालांकि उन्होंने मतदाताओं से यह नहीं कहा था कि यह उनका अन्तिम चुनाव होगा मगर इसी भाव से मतदाताओं से अपनी पार्टी को जिताने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि बिहार के लोगों का हमसे समझौता है कि वे 15 साल तक हमको सत्ता में बनाये रखेंगे। अतः हम उनसे अपना वादा निभाने की फरियाद कर रहे हैं, लेकिन नीतीश बाबू और लालू जी के कथनों में स्वबोध का महीन अन्तर है। नीतीश बाबू याचना कर रहे हैं जबकि लालू जी सम्बन्ध समीक्षा कर रहे थे। हालांकि लक्ष्य दोनों का एक ही विजयी होना रहा है, परन्तु यह भी तय है कि मतदाताओं के सामने चुनावी मुद्दे कुछ ऐसे होते हैं जिन पर उन्हें अपना निर्णय देना होता है। अभी तक के पिछले दो चरणों में बिहार में मतदान का प्रतिशत सन्तोषजनक रहा है और माहौल में कमोबेश शान्ति बनी रही है।

 बिहार में चुनाव शान्तिपूर्ण माहौल में हो रहे हैं और कोरोना काल के चलते हो रहे हैं। पहले यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कोरोना संक्रमण की वजह से मतदान पर फर्क पड़ सकता है मगर बिहार की प्रबुद्ध जनता ने इस आशंका को मतदान केन्द्रों पर लम्बी-लम्बी लाइने लगा कर दूर कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इसकी वजह इस बार चुनावों में जमीनी मुद्दों का मुखर होना माना जा रहा है जो रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य के हैं।

 लोकतन्त्र के लिए इससे बढ़कर गौरव की बात कोई और नहीं हो सकती कि बिहार में इस बार शिक्षा भी एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। भारत के चुनावी इतिहास को अगर हम उठा कर देखें तो अभी तक किसी भी चुनाव में शिक्षा मुद्दा नहीं रहा है। भारत में शिक्षा पर खर्च सकल उत्पाद का ढाई प्रतिशत से भी कम है। सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली  की कमर टूट चुकी है क्योंकि इसमें निजी क्षेत्र के प्रमुख हो जाने की वजह से पूरी प्रणाली ही बाजार मूलक हो चुकी है और स्कूल व महाविद्यालय शिक्षा की दुकानें बन चुके हैं। यह स्वयं में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि स्वयं प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी बिहार के चुनावों में नई शिक्षा नीति को आम जनता को समझाने का प्रयास चुनावी रैलियों में किया है और इसके जवाब में महागठबन्धन के नेताओं ने वैकल्पिक सुझाव दिये हैं। इसी प्रकार रोजगार के मुद्दे पर भी दोनों पक्ष जम कर उलझे रहे हैं।

 जाहिर तौर पर साफ-सुथरा प्रशासन भी चुनावों में एेसा मुद्दा रहता है जिसकी तरफ आम मतदाता का ध्यान रहता है। अतः इस विषय पर भी इन चुनावों में खुल कर बहस हुई है। इन चुनावों की सबसे बड़ी विशेषता यह कही जायेगी कि ये व्यक्ति मूलक न रह कर नीति मूलक रहे हैं। जब लोकतन्त्र नीतिपरख होकर बहस करने लगता है तो उसके केन्द्र में आम आदमी और वंचित व गरीब-गुर्बा स्वयं आ जाता है, इसलिए प्रधानमन्त्री की रैलियों से लेकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी व तेजस्वी यादव की रैलियों में ये विषय स्वयं ही केन्द्र में आ गये। इसके साथ ही बिहार  का स्वास्थ्य व चिकित्सा तन्त्र भी नेताओं के वक्तव्यों में गड़गड़ाता रहा। इसका सीधा मतलब यही है कि राजनीति जनता की सरकार काबिज करने के लिए हो रही है।

 लोकतन्त्र में जनता की सरकार वही कहलाती है जो जनता के लिए काम करे। मगर इन मुद्दों को सतह पर लाने का श्रेय बिहार की सजग जनता को ही देना होगा क्योंकि उसने अपने राजनीतिक विमर्श में केवल इन्हीं विषयों पर बात करना उचित समझा वरना चुनावी वातावरण में तो सब कुछ हवा में तैरने लगता है। इससे  बिहार के मतदाताओं ने यह सिद्ध करने का हर संभव प्रयास किया है कि वे माली हालत में गरीब जरूर हो सकते हैं मगर बौद्धिक स्तर पर बहुत अमीर हैं। चुनाव परिणाम चाहे जिस भी गठबन्धन के पक्ष में जाये मगर मतदाताओं ने अपनी जीत सुनिश्चित करने का इन्तजाम बखूबी किया है।