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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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नीतीश ने चल दिया दाव

इस वर्ष बिहार में चुनाव होने वाले हैं। सभी दल अपनी-अपनी रणनीतियां बनाने में लगे हैं। चुनावी रणनीितकार प्रशांत किशोर और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार में तीखी बयानबाजी देखने को मिली थी और नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जनता दल (यू) से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। पार्टी से निष्कासित प्रशांत किशोर ने पहले ही यह कह दिया था कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा और एनपीआर पुुराने प्रावधानों के साथ लागू होगा। प्रशांत किशोर की बात सच निकली। बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार ने अपना दाव खेल दिया है। विधानसभा में एनआरसी लागू नहीं किये जाने और एनपीआर में संशोधन को लेकर एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया। 

सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होने का अ​र्थ यही है कि प्रस्ताव को जनता दल (यू) भाजपा, लोक जनशक्ति पार्टी, राजद, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन मिला। जिस नागरिकता संशोधन कानून, एनसीआर आैर एनपीआर को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। हिंदू मुस्लिमों में विभाजन की दरार आैर बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। दंगों के हालात पैदा किये जा रहे हैं, ऐसी ​स्थिति में बिहार में भाजपा ने प्रस्ताव को समर्थन दिया तो क्यों? भाजपा जदयू के साथ गठबंधन सरकार की भागीदार है। इसके साथ ही बिहार भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार वाला पहला राज्य बन गया है, जहां एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया है। विपक्षी राजद के नेता तेजस्वी यादव ने इस पर तंज कसा है कि सरकार में होने के बावजूद बिहार भाजपा ने घुटने टेक दिये हैं। भाजपा वाले माथा पकड़े टुकुर-टुकुर देखते रहे।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विपक्ष लगातार इसे वापस लेने की मांग कर रहा है। नीतीश कुमार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि नागरिकता संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्णय देगा, वह उन्हें मान्य होगा। नीतीश कुमार 2013 में सीएए को लेकर बनी संसदीय कमेटी का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व वाली इस कमेटी में कपिल सिब्बल और लालू प्रसाद यादव भी इसके सदस्य थे। जब बिहार विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया गया तो भाजपा विधायक चुप रहे। अब भाजपा विधायक कह रहे हैं कि जनता दल (यू) ने उन्हें पहले बताया ही नहीं कि प्रस्ताव लाया जा रहा है। प्रस्ताव लाना बिहार सरकार का अधिकार है लेकिन भाजपा केंद्र के साथ है। भाजपा विधायक इसे आनन-फानन में लिया फैसला बता रहे हैं। विपक्ष कह रहा है कि यदि भाजपा को लगता है कि नीतीश कुमार ने उसे धोखा दिया है तो फिर  भाजपा को सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। 

बिहार में भाजपा की ​स्थिति  काफी हास्यास्पद हो गई है। एनआरसी के विरोध में 7 पार्टियां खड़ी हैं, जो इस समय देश के 11 राज्यों में सत्ता में हैं। देशकी 52 फीसद आवादी इन राज्यों में रहती है। कई राज्य नागरिक संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध में प्रस्ताव पारित कर चुके हैं। बम्बई हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि जिनके पास मतदाता पहचान पत्र है वही नागरिकता की सबसे बड़ी पहचान है। मतदाता पहचान पत्र देश के नागरिकों का ही बनता है, भले ही उसके पास आधार कार्ड न हो। कई लोग एनआरसी के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं। एनआरसी का उद्देश्य देश में रहने वाले नागरिकों की जानकारी हासिल की जाती है। दुनिया के लगभग हर देश में ऐसी व्यवस्था है। भारत में 1951 के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए पूरे देश में एनआरसी लागू की थी। इतने वर्षों बाद उसे अपडेट करना तो बनता ही है। अगर कागज मांगे जाएंगे तो वह सभी से मांगे जाएंगे तो फिर इस पर तूफान क्यों खड़ा किया जा रहा है। 

दरअसल सीएए, एनआरसी और एनपीआर में इतना घालमेल हो गया कि पूरी तरह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी। हड़बड़ी में गड़बड़ी हो चुकी है। नीतीश कुमार की विवशता यह भी है कि अगर वे भाजपा नीतियों का खुलकर समर्थन करते हैं तो विधानसभा चुनाव में उनके मुस्लिम वोट बैंक के छिटकने का खतरा है क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो वो सरकार बनाने लायक आंकड़े लाने में विफल हो सकते हैं। निश्चित रूप से उन्हें भाजपा विरोधी ऐसे तेवर दिखाने होंगे जिससे उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे। 17 फीसदी मुस्लिम वोट किसी भी पार्टी के लिए अहम होता है। इसके अलावा महादलितों के वोट भी जनता दल यू की झोली में जाते रहे हैं।

 भाजपा को यह भी देखना होगा कि उसके सहयोगी दल ही नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी सवाल उठाते रहे हैं। केंद्र की सरकार को शुरू के बिंदुओं पर चर्चा करनी चाहिए और शुरू का वातावरण खत्म करना चाहिए। नीतीश कुमार सरकार के राजस्व मंत्रालय ने भी एनपीआर के कुछ बिंदुओं पर केंद्र को पत्र लिख दुविधा दूर करने का आग्रह किया है। बिहार सरकार में राजस्व मंत्रालय भाजपा के पास है। एनपीआर का काम 2010 की तर्ज पर किये जाने की मांग भी की है। फिलहाल नीतीश कुमार ने अपना तीर छोड़ दिया है। देखना होगा कि भाजपा इससे कितनी घायल होती है। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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