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संपादकीय

चुनाव में अब जनता का अस्त्र चलेगा

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आज देश के दो प्रमुख राज्यों महाराष्ट्र व हरियाणा की विधानसभाओं के लिए मतदान हो रहा है। इन दोनों ही राज्यों में केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। पांच वर्ष बाद ये सरकारें आम जनता के समक्ष पुनः जनादेश पाने के लिए प्रस्तुत हैं। अब फैसला आम जनता को करना है कि वह उनके पिछले कार्यकाल से प्रसन्न होकर उन्हें सत्ता सौंपती है अथवा गद्दी से उतारने का फैसला करती है। लोकतन्त्र में सत्ता सौंपने का विशेषाधिकार केवल जनता के पास ही होता है अतः विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से जनता का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। 

महाराष्ट्र में जहां देवेन्द्र फड़णवीस और हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की सरकारें पिछले पांच सालों के दौरान जहां जनता की अपेक्षाओं पर कभी पास और कभी फेल होती हुई चली हैं, उसके मद्देनजर इन चुनावों में जोरदार संघर्ष होना चाहिए था, परन्तु चुनावी हालात इसकी गवाही नहीं दे रहे हैं। इसकी एक ही मुख्य वजह केन्द्र में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की ऐसी अजेय पराक्रमशाली छवि है जिसने भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को अपने आभामंडल से इस प्रकार ढक लिया है कि उनकी असफलताएं इसमें छिप गई हैं। 

यही वजह है कि इन राज्यों के चुनावों में स्थानीय मुद्दों पर चर्चा न होकर जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाये जाने के विषय पर चर्चा होती रही। जाहिर है कि इन विधानसभा चुनावों का एजेंडा किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं प्रधानमन्त्री ने ही तय किया और समूचा विपक्ष रक्षात्मक होकर इसका जबाव ढूंढने में ही मशगूल रहा। इसकी वजह क्या यह हो सकती है कि राज्यों की भाजपा सरकारें अपने पिछले पांच वर्ष के कार्य के आधार पर पुनः जनादेश मांगने में कमजोर पड़ रही थीं? वस्तुतः यह कमजोरी भाजपा की कम और विपक्षी दलों की ज्यादा है जो राज्यों के मुद्दों को केन्द्र में लाने में असफल रहीं। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की मिलीजुली सरकार विभिन्न अन्तर्विरोधाें के साथ चलती रही। 

इसके बावजूद चुनाव के अवसर पर इन दोनों दलों में सम्मानजनक सीट समझौता हो गया। अपने घर की कलह को भाजपा ने जिस तरह शान्त किया, उसने भी विपक्षी दलों के मनोबल को कमजोर करने में भूमिका अदा की। राज्य में कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच गठबन्धन बना और सीटों के समझौते पर ज्यादा ले-दे भी नहीं हुई, इसके बावजूद यह गठबन्धन जिसे ‘महाअगाढ़ी’ कहा गया, भाजपा व शिवसेना के गठबन्धन ‘महायुति’ से आगे निकलने का मार्ग नहीं खोज पाया। 

महाअगाढ़ी के पास शरद पवार जैसा क्षेत्रीय राजनीति का महारथी होने के बावजूद पूरे चुनावी प्रचार में वह विमर्श नहीं उभर सका जिससे सत्तारूढ़ भाजपा रक्षात्मक मुद्रा में आ पाये जबकि चुनावी रणनीति में विपक्ष का पहला हथियार सत्तारूढ़ दल को बचाव की मुद्रा में लाने का होता है। जहां तक हरियाणा का सवाल है तो इस राज्य में कांग्रेस पार्टी स्वाभाविक तौर पर सत्ता की पार्टी मानी जाती रही है मगर पिछले चुनावों में भाजपा ने अपने बूते पर राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 48 पर विजय प्राप्त करके यह रुतबा हासिल कर लिया था। 

भाजपा को यह रुतबा दिलाने का काम भी केवल श्री मोदी के प्रयासों से ही हुआ था क्योंकि उन्होंने इस राज्य की जातिमूलक राजनीति को ‘राष्ट्रमूलक’ राजनीति में तब्दील कर दिया था। दरअसल भाजपा में श्री मोदी के उदय के बाद राजनीति के समीकरण जिस तरह बदले हैं वे भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की क्षेत्रीय दलगत राजनीति को इस प्रकार असामयिक बनाते हैं कि उनकी उपयोगिता केवल निजी स्वार्थों के हित की पर्याय बनकर उभरती है। राज्यों की राजनीति में पारिवारिक मठाधीशों का वर्चस्व पिछले तीन दशकों में जो सिर चढ़कर बोला था अब वह बिना रुके नीचे इसीलिए रपट रहा है कि भाजपा ने नीतिगत तौर पर ऐसे क्षेत्रीय मठाधीशों की पारिवारिक राजनीति को निशाने पर रखा है। लोकतन्त्र के लिए इसे किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता। 

हो सकता है इसका लाभ आज भाजपा को मिल रहा हो मगर दीर्घकाल में इसका लाभ उन समर्पित राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ही मिलेगा जो अपनी प्रतिभा के बूते पर राजनीति के शिखर पर पहुंचना चाहते हैं फिर चाहे उनकी पार्टी कोई भी हो। अतः हरियाणा में विपक्षी पार्टी कांग्रेस जिस तरह अलग- अलग गुटों में बिखर कर भाजपा का मुकाबला कर रही है और स्व. देवीलाल की खानदानी पार्टी लोकदल विभिन्न गुटों में बंट कर ताल ठोक रही है, उसमें ‘अखाड़े’ की मिट्टी में लथपथ पहलवान नजर नहीं आ रहे हैं बल्कि ‘गिजा’ खा-पी कर शरीर बनाये दंगल में उतरे ‘पट्ठे’ नजर आ रहे हैं।  

इस सबके बावजूद भारत के मतदाताओं को जो लोग मूर्ख समझते हैं उनसे बड़ा मूर्ख कोई दूसरा नहीं होता। इसी देश में ऐसा भी हुआ है कि सत्ता की सारी कोशिशों के बावजूद जनता द्वारा सिर पर बैठाये गये प्रत्याशी चुनाव जीतते रहे हैं। खुद मुख्यमन्त्री तक चुनाव हार जाते हैं, परन्तु इसके पीछे तार्किक कारण रहे हैं। सबसे बड़ा तर्क विकल्प का रहा है। जनता कभी भी लोकतन्त्र में कोई स्थान खाली नहीं छोड़ती है। शरद पवार का यह विमर्श भारी पड़ा कि ‘महाराष्ट्र ने कभी दिल्ली के आगे माथा नहीं टेका है’। इसमें शिवाजी की विरासत को शिवसेना व भाजपा से छीनने का मराठा मन्त्र छिपा हुआ था। जाहिर है कि चुनावी रण में सारे अस्त्र प्रयोग हो चुके हैं, अब जनता को अपना शस्त्र चलाना है जिसे ‘वोट’ कहते हैं।