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संपादकीय

राजनीतिज्ञों की घटती साख

राजनीति समाज सेवा का सबसे बड़ा माध्यम रही है। हमारे अनेक राजनीतिज्ञ मनसा, वाचा, कर्मणा पर खरे उतर कर मिसाल बने हैं। आज भी सक्रिय राजनीति कर रहे तमाम लोगों के बायोडाटा में पेशे के कॉलम में समाज सेवा ही लिखी जाती है लेकिन अधिकांश नेता इसे अब तेज आर्थिक विकास का आसान माध्यम मानने लगे हैं। लोकतन्त्र लोकलज्जा से चलता है अगर यह लोकलज्जा ही खत्म हो गई तो फिर बचेगा क्या? जब सांसद और विधायक निर्वाचित होकर आते हैं तो पार्टी के बड़े नेता उनकी क्लास लेकर उन्हें जमकर अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। 

उन्हें जनता से ठीक व्यवहार करने और विकास व सुशासन के लिये आदर्श व्यवहार की नसीहत दी जाती है। उन्हें यह भी समझाया जाता है कि वे खुद अपने परिवार वालों को भी समझा दें कि वे सत्ता की हनक के चक्कर में न पड़ें ताकि लोगों के बीच गलत संदेश न जाये। जनप्रतिनिधियों को जितना चाहे पाठ पढ़ाया जाये, उन पर कोई असर नहीं होता। आज के नेताओं के वाणी-व्यवहार में कोई संयम नहीं देखा जाता। बिना नेता के समाज नहीं होता और नेता के लिये समाज का होना आवश्यक है। देश तथा समाज का उत्थान नेता पर निर्भर करता है। अगर नेता शालीन, वाणी, व्यवहार में कुशल, ईमानदार होगा तो समाज भी ऐसा ही बनेगा। 

वैसे तो देश बड़े-बड़े बाहुबली नेताओं के शर्मनाक कृत्यों का गवाह रहा है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले बाहुबली धनबल से संसद और राज्य विधानसभाओं में पहुंचते रहे हैं। यही कारण है कि राजनीति का चरित्र गिर गया और साख घटती जा रही है। मुझे एक गांव के लोगों ने एक किस्सा सुनाया था- चुनाव के दिनों में कुछ नेता वोट मांगते घूम रहे थे। एक घर के सामने पहुंचे तो देखा, एक युवती अपने घर के बाहर एक गाय का दूध निकाल रही थी। इतने सारे लोगों को देखकर घबरा गई और जितना दूध निकाला था उसे लेकर घर में चली गई। घर के अन्दर मां ने उससे पूछा तो उसने बताया कि कुछ नेता किस्म के लोग लगते है तो मैं डरकर चली आई। 

उस युवती की मां ने कहा कि डरने की जरूरत नहीं, जाकर पूछ वह कौन हैं और क्या बात है। मां ने यह भी हिदायत दी कि बाहर खाट पड़ी है उसे भी अन्दर ले आये। लड़की बाहर गई, थोड़ी देर बाद खाट लेकर लौटी और मां से बोली- ‘‘वह लोग नेता हैं और वोट मांगने आये हैं। कहते हैं चुनाव चिन्ह देख ले।’’ इस पर मां ने कहा-बेटी जल्दी कर खाट तो तू ले आई है, गाय भी खोल कर अन्दर ले आ और बाहर का दरवाजा भी बंद कर देना, इन पर क्या भरोसा? एक आम आदमी की राजनेताओं के बारे में क्या सोच है, कमोबेश भारत में यही है। अहमदाबाद शहर में नरोदा से भाजपा विधायक बलराम थवानी का वायरल हुआ वीडियो तो देशवासियों ने देखा होगा जिसमें वह एक महिला को लात-घूसों से पीट रहे हैं। उन्हें अनुमान ही नहीं होगा कि वायरल वीडियो उनके राजनीतिक जीवन पर संकट पैदा कर देगा। 

जब कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई तो विधायक महोदय घबरा गये। पहले तो उन्होंने सफाई दी कि उन्होंने तो आत्मरक्षा के लिये महिला को लात मारी थी लेकिन जब उन पर दबाव बढ़ा तो उन्होंने पूरी तरह रंग ही बदल लिया। महिला विधायक महोदय से पानी की व्यवस्था करने की गुहार लगाने आई थी। विधायक महोदय आक्रोषित हो गये थे। उन्होंने महिला से मारपीट कर डाली लेकिन बाद में उन्होंने न केवल महिला से माफी मांगी बल्कि उससे राखी भी बंधवाई। कैसे जनप्रति​निधि हैं जो पहले वोट मांगते हैं, फिर जीत के बाद लोगों को लात मारते हैं। क्या एक विधायक से ऐसे व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है? अगर राजनीतिज्ञ मर्यािदत आचरण छोड़कर ऐसी शर्मनाक हरकतें करने लगे तो एक दिन ऐसी नाैबत आ जायेगी-दर्द का हद से गुजरना, दवा हो जाना। 

आगे-आगे एक राजनेता और पीछे-पीछे लाठी-डंडे, चप्पल उठाये सारा अवाम। यह भी एक प्रजातन्त्र का नजारा होगा। राजनीति का यह दौर वैचारिक और सैद्धांतिक रूप से संक्रमण का है। वैचारिकता की जमीन सैद्धांतिक रूप से बंजर हो चली है। सत्ता का नशा लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। कोई प्रजाधर्म नहीं अपना रहा। राजनीति जनसेवा नहीं, वह तो सौदा बन चुकी है। क्या खिलाड़ी, अभिनेता, पत्रकार, साहित्यकार, अफसर बनकर देश की सेवा नहीं की जा सकती? जनसेवा का रास्ता क्यों राजनीति की गलियों से होकर गुजरता है। राजनीतिज्ञ अपना भरोसा खोते जा रहे हैं। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे बड़ा संकट है।