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ओलिम्पिक खेल : मानव के जज्बे को सलाम

कोरोना महामारी के भय के माहौल के बीच टोक्यो में खेलों के महाकुम्भ ओलिम्पिक 2021 का उद्घाटन हो गया। यूं तो इस ओलिम्पिक का आयोजन 2020 में ही होना था लेकिन वैश्विक महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। सालभर की देरी से इसका आयोजन हो रहा है। उद्घाटन समारोह आम जनता के लिए वर्चुअल रहा। इटली के मशहूर क्रिएटिव डायरैक्टर मार्क बलीव के निर्देशन में होने वाले इस समारोह में महामारी के मानवता के असर को अपने तरीके से जाहिर किया। इस वर्चुअल समारोह में नए सवेरे का संदेश दिया है। इससे दुनिया में ऊर्जा का संचार होगा, उमंग जागेगी। इस समारोह ने दिखाया कि मानव प्रजाति महामारी से जूझने का हौंसला रखने के साथ-साथ इससे उबरने में भी सक्षम है। जीवन के प्रति सकारात्मक रवैये को भी ये ओलिम्पिक खेल नया आयम देंगे। कोरोना के खतरे के बीच इनके आयोजन ने दिखा दिया है कि मानव किसी भी मुसीबत से एकजुट होकर लड़ सकता है।

कोरोना काल के अंधकार के बीच ओलिम्पिक का आयोजन वास्तव में हमारी नेगेटिविटी को पाजिटिविटी में बदलने में मददगार होगी। जो नकारात्मकता हमारे जीवन में आ चुकी है उसे सकारात्मकता में बदलने के लिए ऐसे आयोजनों की जरूरत है। यद्यपि कोरोना काल में ओलिम्पिक के आयोजन के औचित्य पर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। यह पहला ओलिम्पिक है, जिसे सिर्फ दस हजार लोग स्टेडियम में आकर देख सकेंगे, स्टेडियम में आम लोग नहीं बल्कि राजनयिक, आयोजन समिति से जुड़े सदस्य, अन्तर्राष्ट्रीय ओलिम्पिक समिति के सदस्य और कुछ प्रायोजक मौजूद रहेंगे।

जापान का टोक्यो शहर 1964 में ओलिम्पिक का आयोजन कर चुका है। जापान में विभिन्न संगठनों ने 1930 में वहां ओलिम्पिक कराए जाने की मांग की थी। 1936 में अन्तर्राष्ट्रीय ओलिम्पिक संघ ने टोक्यो में आयोजन की हरी झंडी दी थी लेकिन चीन के साथ युद्ध और विश्व युद्ध की वजह से टोक्यो 1940 में ओलिम्पिक खेलों की मेजबानी नहीं कर पाया था। आखिरकार 1964 में जब टोक्यो में ओलिम्पिक का आयोजन हुआ था 1940 के मिसिंग ओलिम्पिक को भुला दिया गया। खेलों के इस महाकुम्भ में न दर्शक होंगे और न ही खिलाड़ियों में पहले जैसा उत्साह रहेगा। 

एथलीटों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की प्रेरणा तभी ​मिलती है, जब माहौल उत्साहपूर्ण हो। ऐसे माहौल में किसी का प्रदर्शन कमजोर भी हो सकता है और किसी का प्रदर्शन बेहतर भी हो सकता है। हो सकता है चोटी के खिलाडी पिछड़ जाएं और चौथी और पांचवीं रैंक वाले आगे निकल जाएं। ओलिम्पिक शुरू होने से पहले ओलिम्पिक से जुड़े 80 से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। यद्यपि टोक्यो प्रशासन ने ओलिम्पिक को सुरक्षित बनाए रखने के बहुत सारे उपाय किए हैं। टोक्यो में आपातकाल लागू है। लेकिन शहर में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल है कि टोक्यो ओलिम्पिक में भारत की झोली में कितने पदक आएंगे। इस बार हमारे देश के खिलाड़िओ ने ओलिम्पिक के लिए क्वालीफाई किया है और उनकी तैयारी भी अच्छी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत लंदन ओलिम्पिक में लाए गए पदों की न केवल बराबरी करेगा बल्कि उससे ज्यादा भी हासिल कर लेगा। हमारे खिलाड़िओ ने कड़ी मेहनत की है लेकिन लॉकडाउन के कारण खिलाड़ियों का प्रशिक्षण काफी प्रभावित हुआ है। जिन एथलीटों से हम पदक लाने की उम्मीद कर रहंे हैं उनमें विनेश फौगाट, नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधू ​दीपिका कुमारी, मेरीकॉम, बजरंग पूनिया, अमित फंगाल, सौरभ चौधरी, मीरा बाई चानू और मनुभाकर आदि शामिल हैं। हमारे देश में एथलीट अपने बूते पर थोड़े सरकारी सहयोग के बल पर पदक लाते हैं। पदक जीतने के बाद उन्हें हर तरफ से प्रोत्साहन और समर्थन मिलता है। दरअसल यह प्रोत्साहन उन्हें क्वालीफाई होने से चार-पांच साल पहले मिलना चाहिए। वर्ष 2008 बीजिंग ओलिम्पिक में अभिनव बिन्द्रा व्यक्तिगत तौर पर गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बने थे। लंदन ओलिम्पिक में भारत की ओर से गगन नारंग और विजय कुमार ने मेडल जीता। अब तो भारत की ओर से निशानेबाजों की एक नई पौध तैयार है। सौरभ चौधरी और मनुभाकर के नेतृत्व में ये पौध झंडे गाड़ने के लिए तैयार हैं। तीरंदाज ​दीपिका कुमारी और अतानु राय जबर्दस्त फार्म में है। पीवी सिंधू  और मेरीकॉम  को नजरंदाज किया ही नहीं जा सकता। अगर हम लंदन ओलिम्पिक से आगे निकल गए तो यह भारत के लिए नई शुरूआत होगी। एथलीटों का अपना मनोबल ही काम करता है। जापान गए एथलीटों का मनोबल कमजोर न हो इसके लिए कोच, मैनेजर और अन्य को बहुत ध्यान देना होगा। 

हो सकता है कि कोरोना का भय उन्हें सताए तो उन्हें मनोवैज्ञानिक समर्थन की जरूरत पड़ेगी। आमतौर पर ओलिम्पिक में खिलाडी सिर्फ अपने प्रदर्शन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं लेकिन इस बार खिलाड़िओ के मन में कोरोना संक्रमण का भी भय होगा।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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