लोकतंत्र में जब-जब लोगों को दबाने की कोशिश की जाती है तो लोग इसका करारा जवाब देते हैं। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में गणतंत्र पर ‘गनतंत्र’ ने हावी होने की कोशिश की। देश में चुनावी उत्सव चल रहा है। लोगों को वोटिंग के लिए खुद चुनाव आयोग प्रेरित कर रहा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में जब माओवादी एक भाजपा विधायक की हत्या कर डालने के साथ-साथ चार पुलिस जवानों को शहीद कर देते हैं तो इससे यही पता लगता है कि लाल सलाम का खात्मा करना जरूरी हो गया है। सवाल पैदा होता है कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्र, महाराष्ट्र या उड़ीसा और फिर पश्चिमी बंगाल में यह माओवाद आखिरकार कब तक अपना आतंक मचाता रहेगा और खून खराबा करता रहेगा। देश के लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और इसकी जितनी निंदा की जानी चाहिए वह कम है।

कभी इसी छत्तीसगढ़ के झीरम क्षेत्र में माओवादियों ने पूरे राजनीतिक नेतृत्व को खत्म करने की कोशिश करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वी.सी. शुक्ला सहित पैंतीस से ज्यादा लोगों को मार दिया था। यह हिंसा अभी तक जारी है तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी तो सच है कि मौजूदा सरकार ने माओवादियों पर पिछले दो वर्षों से नियंत्रण तो किया ही है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस सारे मामले में गंभीरता पूर्वक लगे रहे हैं लेकिन फिर भी दिक्कत उस समय आती है जब कोई बड़ी घटना घट जाती है। दंतेवाड़ा में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या का मतलब सीधा है कि बस्तर इलाके में चुनावी प्रक्रिया को बाधित किया जाये लेकिन इसी बस्तर के लोगों ने पहले चरण के मतदान में जमकर वोट किया और माओवादियों को करारा जवाब दिया कि मतदान में हिस्सा न लेने की उनकी धमकियों की हम परवाह नहीं करते।

मंडावी पर जो हमला हुआ है वह एक गहरा संदेश यह भी दे रहा है कि किस प्रकार इस हमले की भनक किसी को नहीं लग सकी हालांकि ऊपरी तौर पर यह भी बताया गया है कि भाजपा विधायक को माओवादियों से सावधान रहने की चेतावनी दे दी गई थी क्योंकि माओवादी इस हमले की फिराक में थे और जब उन्हें मौका मिला तो उन्होंने काम कर दिया। एक बात पक्की है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार माओवाद को खत्म करने के लिए गंभीर है लेकिन यह भी तो मानना पड़ेगा कि अनेक इलाकों में आज भी माओवादी अपनी पूरी ताकत के साथ खासतौर पर गहरे जंगली इलाकों में डटे हुए हैं। यहां तक कि उन्होंने खुद शहरों में अपना नेटवर्क बढ़ाते हुए राजनीतिक कामों के बारे में पूरे हिसाब-किताब बनाए हुए हैं। यह भी कड़वा सच है कि माओवादियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ इसी छत्तीसगढ़ में लगभग समानांतर सरकार चला रखी है।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों सीआरपीएफ को अनेक अधिकार देकर माओवादियों के खिलाफ जबर्दस्त अभियान चलाए और कई इनामी माओवादी मारे भी गए। यकीनन यह हमला माओवादियों की बौखलाहट है। क्योंकि रिकार्ड गवाह है कि इसे दंतेवाड़ा में माओवादियों की हिंसा में भारी कमी आई  है। इसके बावजूद माओवादी बारूदी सुरंग, विस्फोट तथा अन्य हमलों की फिराक में रहते हैं। पिछले दिनों हमने खुद देखा कि अनेक स्थानों पर माओवादियों ने हथियार डाल दिये लेकिन जब कोई बड़ा हमला होता है तो फिर हथियार डालने के पीछे का हिसाब किताब समझ से बाहर चला जाता है।

हमारा मानना है कि अब माओवादियों पर कड़ा प्रहार करना ही होगा हालंकि 11 तारीख को लोकसभा के पहले चरण की जिन 91 सीटों पर वोटिंग हुई उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका भी था जहां एक गांव ऐसा है कि लोगों ने 1947 के बाद कभी वोट नहीं डाला था लेकिन पहली बार लोगों ने यहां जमकर वोट डाला। सरकार की नीति और नियत माओवादियों पर नियंत्रण को लेकर एक लगती है इसमें तालमेल भी है लेकिन फिर भी कुछ न कुछ तो ऐसा है कि मौका मिलते ही माओवादी सिर उठाकर कांड कर जाते हैं। इसलिए माओवादी प्रभावित इलाकों में सरकार को अपनी गतिविधियां और माओवादियों की जानकारियां जैसे भी मिले उन्हें रोकने के लिए सबकुछ निरंतर रूप से करना होगा। वोटिंग न होने देने का जवाब लोगों ने दे दिया है लेकिन यह हमला कई ओर संदेश भी दे रहा है।

वो यह है कि हमें अलर्ट रहना होगा। आनेवाले दिनों में बौखलाए हुए माओवादी कुछ भी कर सकते हैं। हमारी कोशिश सुरक्षा की होनी चाहिए। माओवादी अगर अपना नेटवर्क बढ़ा रहे हैं तो केंद्र सरकार को भी इन्हें कड़ा जवाब देना होगा। पिछले दो दशकों में माओवादी हिंसा में देश में चौदह हजार लोग मारे जा चुके हैं। इनमें से बत्तीस सौ तो सुरक्षा बल और पुलिस के जवान हैं। माओवादियों के इस लाल सलाम पर प्रहार करने का समय आ गया है हालांकि सरकार इन्हें निपटाने के लिए कृतसंकल्प है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इन पर नियंत्रण के लिए सरकार के प्रयास पहले की तरह गंभीर रहेंगे।