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जोखिम भरा है स्कूल खोलना

कोरोना काल में महामारी का गहन प्रभाव देश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है। महामारी के चलते स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से तात्कालिक कदम के रूप में शैक्षिक संस्थानों को प्रत्यक्ष भौतिक संचालन से मना कर दिया, फिर कक्षा की पढ़ाई और परीक्षाएं जहां भी सम्भव थीं, आभासी (वर्चुअल) माध्यम से शुरू की गईं।

दसवीं-बारहवीं की कक्षाओं के परिणाम की दूसरी पद्धति अपनाई गई। कोरोना की दूसरी लहर के शांत होते ही कई राज्यों ने आठवीं से बारहवीं तक के छात्रों के लिए स्कूल खोल दिए हैं। इसके​ लिए भी जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन इन दिशा-निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन नहीं किया जा रहा। स्कूलों में जाते और आते वक्त बच्चों के चेहरे से मास्क गायब ही नजर आते हैं। अब छोटी कक्षाओं के लिए भी स्कूल खोलने का सिलसिला शुरू हो चुका है। कर्नाटक में पहली से पांचवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए स्कूल 25 अक्तूबर से खुल चुके हैं। कहा तो यही जा रहा है कि इस दौरान कोविड-19 से संबंधित गाइड लाइन का कड़ाई से पालन किया जाएगा। कोविड-19 के नियमों के तहत बच्चों के स्कूल आने के लिए उनके माता-पिता की लिखित सहमति अनिवार्य होगी। 

अब दिल्ली में सभी कक्षाओं के लिए स्कूल एक नवम्बर से खोलने का ऐलान कर दिया गया। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष  सिसोदिया ने ऐलान करते वक्त राजधानी में कोरोना का कहर कम होने का हवाला दिया है। विशेषज्ञों के सुझाव के अनुसार किसी भी माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के​ लिए मजबूर नहीं किया जाएगा और सभी स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा की कक्षाओं में अधिकतम 50 फीसदी क्षमता की मौजूदगी हो। स्कूलों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पढ़ाई ऑफ लाइन और ऑनलाइन चले। 

अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अभिभावक छोटे बच्चों को स्कूल भेजने का जोखिम उठाएंगे? सच बात तो यह है कि कोरोना वायरस अभी शांत जरूर हुआ है लेकिन खत्म नहीं हुआ है। उपचाराधीन रोगियों की संख्या भले ही कम हो रही है लेकिन मरने वालों का आंकड़ा अभी भी चौंकाने वाला है। भारत में अभी तक दो वर्ष के बच्चों से लेकर 18 वर्ष तक किशोरों के लिए अभी कोई वैक्सीन नहीं आई है। बच्चों के को​विड वैक्सीनेशन को लेकर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का कहना है कि देश में कुल 44 करोड़ बच्चे हैं, जिनमें से 12 साल कम उम्र के बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। वहीं 12 से 17 साल के कुल 12 करोड़ बच्चे हैं। फिलहाल भारत में जायकोव डी को इसी आयु वर्ग के बच्चों के टीकाकरण के लिए मंजूरी मिली है। यानि भारत की 44 करोड़ आबादी वैक्सीनेट नहीं हुई है। दूसरी ओर अभी तक 23 फीसदी आबादी को ही वैक्सीन की दोनों डोज लगी हैं। ऐसी स्थिति में अभि​भावक बच्चों के लिए जोखिम उठाने को तैयार नहीं। अभिभावक अपने लिए तो कोई भी जोखिम उठा कर परिवार का पालन-पोषण करने के लिए संघर्ष कर ही रहे हैं लेकिन वह बच्चों की जान को खतरे में डालने के लिए तैयार नहीं। केरल समेत 5 राज्यों में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। चीन में फिर कोरोना वायरस नए वैरिएंट में लौट आया है, रूस में भी कोरोना के केस बढ़ रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए छोटे बच्चों के​ लिए स्कूल खोलना खतरे से खाली नहीं।

अभिभावकों का कहना है कि जब आनलाइन क्लासें चल रही हैं और स्कूल फीस भी ले रहे हैं तो फिर स्कूल खोलने के फैसले का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा। अभिभावक चाहते हैं कि पहले बच्चों को वैक्सीनेट किया जाए ताकि वे स्कूलों में सुरक्षित रह सकें। अगर बच्चों में कोरोना फैल गया तो क्या राज्य सरकारें अपने लापरवाहीपूर्ण फैसले की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा देंगी? अभिभावक चाहते हैं कि राज्य सरकारें और प्रशासन कोरोना वायरस से बच्चों का सुरक्षित रखने की गारंटी दे या फिर महामारी से बच्चों की जान को जोखिम में डालने के लिए इस्तीफा देने के लिए तैयार रहें। इसमें कोई संदेह नहीं है की बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के​ लिए शिक्षा केन्द्रों यानी स्कूलों, कक्षाओं में भौतिक उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है, परन्तु महामारी के कारण विद्यालय की अवधारणा ही बदल गई। सभी छात्र आनलाइन प्रवेश, आनलाइन शिक्षा और आनलाइन परीक्षा को बाध्य हुए। छात्र और शिक्षक भौतिक रूप से दूर हो गए। उनके ​विकल्प में मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन लगातार घंटों बैठने से परेशानियां भी होने लगीं। वास्तविकता यह है की शिक्षा पाने का प्रेरणादायी अनुभव ऊबाऊ होने लगा है। युवाओं के लिए स्कूल-कालेज तो खोले जा रहे हैं क्योंकि वह अपनी देखभाल स्वयं कर सकते हैं, लेकिन बच्चों के मामले में ऐसा सम्भव नहीं है। इसके लिए राज्य सरकारों को सोच-समझ कर ही निर्णय लेना चाहिए। छोटी कक्षाओं के लिए स्कूल खोलने में जल्दबाजी से निर्णय लेना एक बड़ी आबादी को खतरे में डाल सकता है।